जहाँ चाह वहाँ राह
जहाँ चाह वहाँ राह
वह लड़की चार भाइयों की एकलौती बहिन थी। लेकिन उसकी किस्मत में दुःख और दर्द की लक़ीरों के सिवा कुछ नहीं था। जब से होश संभाला माँ बाप ने लोगों के घर काम करने लगा दिया। पहले माँ के साथ जाती थी, बाद में २४ घंटे के लिए उसे सेठ सेठानी के यहाँ भेज दिया। उसके माँ बाप २४ घंटे घरेलू सहायिका की नौकरी देने वालों को सेठ सेठानी ही कहते थे।
खेलने कूदने की उम्र में उसने पूरे घर की ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाना शुरू कर दिया। कई अलग-अलग प्रकार के लोगों के यहाँ काम करते-करते वह लड़की मेरे घर भी मेरी घरेलू सहायिका बनकर आई। लड़की ने अपनी उम्र १४ साल बताई, लेकिन देखने में मुझे वह छोटी लगी। जब उसका जन्मपत्र देखा, तो मुझे तसल्ली हुई। खाने पीने के ढंग और सही देखभाल न होने के कारण वह शायद अपनी उम्र से छोटी लगती थी।
लड़की ने अपना नाम कुसुम बताया। कुसुम मुझे काफी होशियार लगी। उसके बातचीत के तरीके से मुझे वो पढ़ी लिखी भी लगी। लेकिन मुझे बाद में पता चला कि वह तो निरक्षर है। लोगों की बातें सुन सुन कर उसने अंग्रेजी शब्द सीख लिए थे। मैं समझ गयी कि उसमें सीखने की क्षमता और चाह दोनों ही हैं मैंने कुसुम को पढ़ाने का निश्चय किया। लेकिन कुसुम ने स्कूल जाने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि छोटे -छोटे बच्चों के साथ बैठकर पढ़ने में उसे शर्म आएगी।
तब मैंने कुसुम को घर पर रहकर खुद ही पढ़ाना तय किया। कुसुम को अक्षर ज्ञान हो गया और उसने हिंदी के छोटे छोटे वाक्य पढ़ना शुरू कर दिया। मैं अपनी उपलब्धि पर बड़ी खुश हो रही थी। तब एक दिन कुसुम ने मुझसे पूछा ,"दीदी क्या पढ़ने से मेरा झाड़ू पोंछा छूट जाएगा??"
कुसुम के इस सवाल से मेरे सामने देश में मौजूद पढ़े लिखे बेरोज़गार लोगों के आंकड़े उपस्थित हो गए मैं उसके सवाल का तब कोई जवाब नहीं दे सकी। मैं यह सोचने पर मजबूर हो गयी कि इस लड़की ने अगर कोई ऐसे सपने देखने शुरू कर दिए ,जो पूरे होना संभव न हो तो यह लड़की टूट जाएगी। इसकी जिम्मेदार मैं ही हूँगी।
बात आई गई हो गयी। तभी एक दिन मुझे किसी शादी में जाना था। मैं अपनी हेयर स्टाइल बना नहीं पा रही थी। कुसुम ने कहा ,"दीदी मैं आपकी हेयर स्टाइल बना देती हूँ। "उसने मेरी काफी अच्छी सी हेयर स्टाइल बनाई। उसके बाद कुसुम ने मेरी कई बार पार्टीज में जाने के लिए तैयार होने में मदद की।
कुसुम द्वारा उस दिन पूछे गए सवाल का जवाब मुझे मिल गया था। मैंने कुसुम को कहा कि ," कुसुम पढ़ने से तुम्हें सही गलत का फर्क समझ आएगा। तुम स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जी सकोगी। अभी अपने बाहर के छोटे मोटे काम जैसे बैंक जाना आदि खुद से कर सकोगी। रही झाड़ू पोंछे की बात तो ,उसको छोड़ने के लिए तुम अपने हुनर का इस्तेमाल कर सकती हो। पढ़ाई लिखाई के साथ -साथ तुम ब्यूटी पार्लर कोर्स भी कर लो। "
कुसुम ने कहा ,"लेकिन दीदी ,घर का काम और कोर्स की फीस??"
मैंने कहा ,"कुसुम फीस अभी तो मैं दे दूँगी। धीरे -धीरे तुम्हारे वेतन से काट लूंगी। रही घर के काम की बात तो उसमें मैं तुम्हारी थोड़ी मदद दूँगी। अगर कभी इमरजेंसी हुई तो ,हम बाहर से खाना मँगा लेंगे। "
कुसुम मेरी बात सहमत हो गयी। मैं चाहती तो कुसुम की फीस खुद भर सकती थी। लेकिन मैं कुसुम के स्वाभिमान को चोट पहुँचाना नहीं चाहती थी और अपने दम पर आगे बढ़ने के उसके आत्म विश्वास को समाप्त नहीं करना चाहती थी, जिसकी उसे आगे अच्छी ज़िन्दगी जीने के लिए ज़रूरत थी।
जैसी कि मुझे उम्मीद थी ,कुसुम ने बहुत जल्द ही ब्यूटी पारलर का काम अच्छे से सीख लिया। अब वह झाड़ू पोंछा नहीं करती है ,उसने अपना पारलर खोल लिया है। अब उसके माता पिता बड़े फख्र से कहते हैं, उनके बेटे नहीं कर पाए ,बेटी ने कर दिखाया। सही कहा है किसी ने जहाँ चाह वहाँ राह।
