Dipesh Kumar

Inspirational


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जब सब थम सा गया(दिन 22)

जब सब थम सा गया(दिन 22)

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लॉक डाउन दिन 22

15.04.2020


प्रिय डायरी,

पहले लॉक डाउन 21 दिन का था। लेकिन कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के चलते इस लॉक डाउन को फिर से बढ़ाना पड़ गया, क्योंकि अन्य और कोई उपाय नहीं था। वैसे तो 21 दिन के लॉक डाउन में बहुत हद तक कोरोना संक्रमण को रोका गया। यदि कुछ मूर्खो की मूर्खता न होती तो शायद जो संख्या अब बढ़ रही हैं वो भी न बढ़ती। वो क्या हैं न मेरा देश कोरोना से नहीं कुछ मूर्खो की वजह से परेशान हैं। सुबह उठने के बाद अपनी रोजाना के नियमों का पालन करते हुए। नाश्ते के बाद टीवी देखने लगा। कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या तो अब आम बात हो गयी थी, और जगह जगह पर इसको रोकने के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा अपील भी की जा रही थी।

प्रधानमंत्री जी द्वारा 3 मई तक लॉक डाउन बढ़ाने के आदेश के बाद जनता से सशर्त नियमों के पालन करने पर ढील देने का भी आश्वासन दिया गया। एक चीज़ तो तय थी की लड़ाई अभी जारी हैं। पर जनता बस सब चीज़ के सही होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी। टीवी देखने के बाद में मैने कार को साफ़ करने का निर्णय लिया। कार बहुत दिन से घर पर पड़ी हैं और बैटरी ख़राब होनी की सम्भावना अधिक हो जाती हैं। इसलिए मैंने कार के कवर को हटा कर कार को चालू किया और गाना बजाते हुए सफाई चालू कर दी। लॉक डाउन कुछ दिन के लिए और बढ़ गया था और घर पर रहना और कठिन हो गया था। वास्तविकता बताऊँ तो मैं भी अब ऊब गया था। लेकिन घर पर रहने के अलावा कुछ किया भी नहीं जा सकता था। अब समय का उपयोग अन्य कार्यो में और लगाना पड़ेगा। कार की सफाई के बाद में अपने कमरे में आ गया। पढ़ाई के पाठ्यक्रम में और विषयों को बढ़ाकर 3 मई तक के लिए अध्ययन सामग्री पढ़ने के लिए तैयार की और पढ़ाई में जुट गया। दोपहर के भोजन का समय हो गया था। भोजन के बाद मेरे मन में एक सिनेमा देखने का मन किया। तो मैं कंप्यूटर पर सिनेमा खोजने लगा। बहुत देर बाद "कमांडो 3" देखने का मन हुआ और मैंने पूरी सिनेमा देखी। वास्तव में सिनेमा देखकर लगा की देश में किस तरह आतंकवाद और युवकों को भ्रह्मित किया जाता है, लेकिन अच्छाई की बुराई पर हमेशा से जीत होती रही हैं। इस सिनेमा में भी यही होता हैं। सिनेमा देखने के बाद में कुछ देर के लिए सो गया। शाम को 5 बजे नींद खुली तो आँगन में रोजाना की तरह बच्चों के खेलने की आवाज़ और मस्ती चल रही थी। हाथ मुँह धोकर में नीचे गया। पेड़ पौधों में पानी डालकर बच्चों के साथ खेलने लगा। उसी बीच स्कूल से सन्देश आता हैं कि बच्चों के लिए और अध्ययन सामग्री तैयार करिये क्योंकि लॉक डाउन बढ़ गया हैं।

आरती के बाद मैं अपने कमरे में गया और कंप्यूटर पर बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री बनाना चालू कर दिया। रात के भोजन का समय हो गया था और में भी बहुत देर तक कंप्यूटर चलाने के चलते थक गया था। रात्रि भोजन में चर्चा का विषय लॉक डाउन का बढ़ना था। वैसे तो हम सभी लोगो का यही विचार था। बातें खत्म और रात्रि भोजन के बाद में कुछ देर के लिए टहलने चला गया। दिन की गर्मी के बाद रात की हलकी ठंडी हवा बहुत अच्छी लग रही थी।इसी बीच जीवन संगिनी जी का फ़ोन आया और बातें चालू हो गयी। दरअसल लॉक डाउन से पूर्व ही 30 अप्रैल का उनका वापसी का टिकट था। लेकिन अब लॉक डाउन के बढ़ने के कारण अभी उनका मायके से आना संभव नहीं था। बातें खत्म होने के बाद में नीचे आ कर अपना कंप्यूटर पर काम करने लगा। काम करते करते रात के 12:30 बज गए पता ही नहीं चला। मैं सब बंद करके सोने के लिए जा ही रहा था कि रोड पर कदमों को तेज़ आहट मुझे खिड़की से देखने को मजबूर कर दी। मैंने देखा की लगभग 15 से 20 मज़दूर अपने सामान के साथ पैदल सड़को से अपने घर पर जा रहे थे। पर मुझे लगा की इन्हें कही जाने नहीं दिया जायेगा। कुछ देर बाद पुलिस उन्हें वापिस लेकर आ गयी और जहाँ से वे लोग आये थे अगले आदेश तक वही रहने को बोल गए। वास्तव में ये समय बहुत कष्ट दे रहा हैं। फिर भी हे ईश्वर सबको हौसला देना।


इस तरह लॉक डाउन का आज का दिन भी समाप्त हो गया। लेकिन अब ये कहानी जब तक लॉक डाउन रहेगा तब तक चलती रहेगी। कहानी अगले भाग में जारी रहेगी...



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