Charumati Ramdas

Classics


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Charumati Ramdas

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जब डैडी छोटे थे - 8

जब डैडी छोटे थे - 8

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जब डैडी बात-बात पे बुरा मान जाते थे

लेखक: अलेक्सान्द्र रास्किन ; अनुवाद : आ. चारुमति रामदास

 

जब डैडी छोटे थे, तो बात-बात में बुरा मान जाया करते थे। वो एक साथ सब से गुस्सा हो जाते और हरेक से अलग-अलग कारण से भी गुस्सा हो जाते थे। जब उनसे कोई कहता: "ये तू इतना कम क्यों खा रहा है?" – वो फ़ौरन बुरा मान जाते। जब उनसे कहते: "तू इतना ज़्यादा क्यों खा रहा है?" तब भी वो गुस्सा हो जाते।

वो दादी पे गुस्सा हो जाते, क्योंकि डैडी उनसे कुछ कहना चाह रहे होते, मगर दादी व्यस्त रहती और उनकी बात सुन नहीं पाती। वो दादाजी से इसलिए गुस्सा हो जाते कि दादाजी उनसे कुछ कहना चाहते, मगर डैडी ख़ुद ही किसी बात में व्यस्त रहते और उनकी बात न सुन पाते।

जब मम्मी-डैडी किसी से मिलने जा रहे होते या फिर थियेटर जा रहे होते, तो छोटे डैडी बुरा मान जाते और रोने लगते। वो ज़िद करते कि मम्मी-डैडी पूरे समय घर पर ही बैठे रहें। मगर, जब डैडी ख़ुद सर्कस जाना चाहते तो और भी ज़ोर-ज़ोर से रोते। उन्हें इस बात का बुरा लगता कि उन्हें घर में ही बैठे रहने को मजबूर किया जाता है।

अपने छोटे भाई वीत्या पर, जो उस समय बेहद छोटा था, डैडी इसलिए गुस्सा हो जाते क्योंकि वीत्या उनसे बात करना नहीं चाहता था। अंकल वीत्या सिर्फ मुस्कुराते रहते और अपने पैर का अंगूठा चूसा करते। वो इतने छोटे थे कि सिर्फ 'बा-बा।।।' ही कह पाते थे। मगर डैडी फिर भी अंकल वीत्या पे गुस्सा हो जाते।  

अगर आण्टी उनसे मिलने आती, तो वो आण्टी पे गुस्सा हो जाते। अगर अंकल मिलने आते, तो अंकल पे गुस्सा हो जाते। अगर अंकल और आण्टी साथ-साथ आते, तो वो दोनों पे गुस्सा हो जाते। कभी उन्हें लगता कि आण्टी उन पर हँस रही है। कभी ऐसा लगता कि अंकल उनसे बात करना नहीं चाहते। या फिर कोई और बहाना ढूँढ़ लेते। न जाने क्यों छोटे डैडी अपने आप को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति समझते थे।

अगर वो कुछ कहना चाहते हों, तो सबको चुप रहना चाहिए। अगर डैडी को चुप रहना हो, तो किसी को भी उनसे बात नहीं करनी चाहिए।

अगर वो बिल्ली की तरह म्याँऊ-म्याँऊ करना चाहते हों, या कुत्ते की तरह भौ-भौ करना चाहें, सुअर की तरह 'ख्रू-ख्रू' करना चाहें, मुर्गे की तरह कुकडू-कूँ करना चाहे या गाय की तरह रंभाना चाहें तो सबको अपना-अपना काम छोड़कर सुनना चाहिए कि वो कितनी अच्छी तरह से ये कर रहे हैं। छोटे डैडी इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचते थे कि दूसरे लोग, चाहे छोटे हों या बड़े, किसी भी बात में उनसे कम नहीं हैं। और अगर उनसे बहस की जाती, या उन पर कोई फ़िकरा कसा जाता, तो वो फ़ौरन बुरा मान जाते। ये सब बहुत घिनौना था। छोटे डैडी अपने होंठ फुला लेते, गुस्सैल नज़रों से देखते और वहाँ से चले जाते।

वो पूरे समय किसी न किसी पे मुँह फुलाए रहते, किसी न किसी से झगड़ते ही रहते, सब से गुस्सा ही रहते। सुबह से शाम तक उन्हें बस, मनाना ही पड़ता था, शांत करना पड़ता था, समझौता करवाना पड़ता था। जैसे ही वो सुबह आँखें खोलते, सूरज पे गुस्सा हो जाते क्योंकि उसने उन्हें उठा दिया था। फिर वो शाम तक सबसे रूठे रहते, और जब सो जाते, तो सपने में भी होंठ फुलाए रहते, किसी न किसी पर गुस्सा होते रहते।

मगर सबसे बुरी बात तब होती, जब डैडी दूसरे बच्चों के साथ खेल रहे होते थे। वो मांग करते कि सिर्फ उनकी पसन्द के खेल ही खेले जाएँ। वो कुछ बच्चों के साथ खेलना चाहते और कुछ के साथ नहीं खेलना चाहते। जब वो बहस करते, तो वो हमेशा ये दिखाने की कोशिश करते कि वो ही सही हैं। वो दूसरों पर हँस सकते थे, मगर उन पर कोई नहीं हँस सकता था। इससे सारे बच्चे 'बोर' हो गए। तो क्या हुआ: छोटे डैडी पर सब लोग हँसने लगे – घर में भी और बाहर भी। घर में उनसे पूछते:

"चाय पिएगा? बस, मुँह मत फ़ुलाना!"

"चल, घूमने चलते हैं, बस, मुँह मत फुलाना!"

"तू अभी गुस्सा हुआ या नहीं?"

"जल्दी से बुरा मान जा, वर्ना, हमारे पास टाईम नहीं है!"

ये सब सुनते ही छोटे डैडी फ़ौरन गुस्सा हो जाते।

बाहर तो सारे बच्चे बस, उन्हें चिढ़ाते ही रहते। वे कहते:

 "कोई आए, मुँह फुलाए?" और डैडी फ़ौरन मुँह फुला लेते।

"देखो, मैं अभी उसे उँगली दिखाऊँगा, और वो गुस्सा हो जाएगा!"

वे डैडी को उँगली दिखाते। वो फ़ौरन रूठ जाते। और सब हँसने लगते। डैडी को इस तरह चिढ़ाना लड़कों को बहुत अच्छा लगता था। वे तो उन्हें पूरी तरह परेशान ही कर देते, मगर एक बड़े लड़के को उन पर दया आ गई। उसने कहा: "सुन, तू बुरा मानना छोड़ दे। तो सब तुझसे दूर रहेंगे।"

डैडी ने उसकी बात मान ली। अब वो कम बुरा मानते, और बच्चे उन्हें कम चिढ़ाते। मगर फिर भी, उन्हें रूठने की इतनी आदत पड़ गई थी, कि सिर्फ स्कूल में ही उसे सुधारा गया। और वह भी पूरी तरह से नहीं। यह गन्दी आदत डैडी को पढ़ने में, काम करने में, दोस्त बनाने में परेशान करती थी। वो लोग जो डैडी को बचपन से जानते थे, अब तक डैडी को चिढ़ाते हैं। मगर अब डैडी उन पर बिल्कुल गुस्सा नहीं होते। ज़रा भी गुस्सा नहीं होते। अब तो डैडी पहले के मुक़ाबले में काफ़ी कम बुरा मानते हैं।

 



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