जाको राखे साईंयॉं
जाको राखे साईंयॉं
पहाड़ी जगह पर पोस्टिंग का अपना आकर्षण है, प्रकृति का साथ है, कोलाहल से दूर है। कुछ लोग पहाड़ की पोस्टिंग पसंद नहीं करते हैं क्योंकि वहाँ परिश्रम भरा जीवन है और शहर की चमक दमक से दूर है। पर मेरी बहिन के पति की पहाड़ पर पोस्टिंग हुई तो वे बहुत ख़ुश हुईं। वे कहने लगीं कि हर एक चीज़ के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं, जो देखोगे वही मिलेगा। उन्होंने सकारात्मक पहलू देखा।
वहॉं की पोस्टिंग होने से पहाड़ी रास्ते से तीर्थ स्थानों का भ्रमण हो गया। उन्होंने पहाड़ी रास्ते से जाकर अमरनाथ गुफा के दर्शन किए। कई बार पैदल चलना पड़ा, घोड़े पर भी चलना पड़ा, काफ़ी कष्ट भी उठाना पड़ा, पर दर्शन हो गए।
फिर उन्होंने कैलाश मानसरोवर के दर्शन करने का विचार किया और पहाड़ी रास्ते से वहाँ की यात्रा की। कुछ दूर जाने पर एक मिलिट्री टेंट में रुकना पड़ा। वहाँ से आगे की यात्रा बहुत कठिन थी। इस रास्ते से सिविलियन नहीं जाते थे और कोई महिला के जाने का तो सवाल ही नहीं था। पर बहिन में साहस बहुत था। मिलिट्री टेंट से घोड़े पर चढ़कर जाना था। उसके लिए वहाँ से बकायदा ड्रेस ली गई जो पेंट शर्ट आदि थी । उसे पहन कर वे घोड़े पर बैठीं। उनके पति घोड़े पर चढ़ने से डरते थे इसलिए वो पैदल ही गए। घोड़ा एक दम पगडंडी के किनारे चलता था जिसके एक तरफ़ ऊँचा पहाड़ था और एक तरफ़ गहरी खाई थी।
लोगों ने राय दी थी कि इतना कष्ट उठा कर वहाँ जाएंगे तो भी दर्शन नहीं होंगे यदि घटा छायी रही, इसलिए क्योंकि कष्ट उठा रहे हैं। पर उन्होंने कहा कि एक अवसर आया है जाने का, भगवान् की इच्छा होगी तो दर्शन भी हो जाएंगे।
उन्हें भारतीय सीमा से ही कैलाश पर्वत का तुंग हिममंडित श्रृंग दिखाई दिया। भगवान् की कृपा रही, घटा नहीं छायी थी। घटा छाने से दर्शन दुर्लभ हो जाते। स्पष्ट भोर के आलोक में उन्होंने कैलाश पर्वत के दर्शन किये। मन प्रसन्न हो उठा, मेहनत सफल हुई।
लौटते समय भी बहिन घोड़े पर चढ़कर लौटीं। पर तभी तो क्या उनके मन में आया कि थोड़ा पैदल चलेंगे। पर उतरने के एक मिनट बाद ही क्या देखा कि घोड़े का पैर फिसला और वह नीचे गहरी खाई में जा गिरा। हृदय काँप उठा। यदि उस समय घोड़े से उतरने की प्रेरणा नहीं होती तो क्या होता! भगवान की कृपा पर विश्वास हुआ। भगवान् ही कष्ट देते हैं तो भगवान ही बचाते हैं।
घोड़ा नीचे गहरी खाई में गिर गया, उसके बचने का तो कोई आसार नहीं था, फिर भी वहाँ के स्टाफ़ ने कहा कि नीचे जाकर देखेंगे और मालूम करेगें।
कैलाश के दर्शन करके लौट तो आए, लेकिन घोड़े का इस तरह फिसल कर खाई में गिरना कभी नहीं भूले। भगवान् ने हमें बाल बाल बचाया। हमारे साथ भी हादसा हो सकता था। बचाने वाले के लम्बे हाथ हैं, आजानुबाहु हैं, मंगलभवन अमंगलहारी हैं ,उनकी अहैतुकी कृपा पर विश्वास हुआ।
