Shailaja Bhattad

Inspirational


5.0  

Shailaja Bhattad

Inspirational


जागरूक नागरिक

जागरूक नागरिक

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जब हम यह पूछने लगते हैं कि, सफाई कौन करेगा बस उसी वक्त से गंदगी का सिलसिला शुरू हो जाता है।

 क्योंकि सफाई करना निम्न स्तर का कार्य समझा जाता है ।

जिसका नतीजा आज सामने हैं। त्योहार तो धूमधाम से मनाते हैं लेकिन अगर निगाहें उठाकर देखोगे तो चारों और कचरा ही पाओगे और उसी कचरे के आसपास हम पूजा करते हैं और पूजा के बाद कचरे में अभिवृद्धि कर देते हैं ।आलस्य की सीमा तो तब लांघ जाते हैं जब घर में कामवाली के न आने पर कई दिनों तक हम खुद का घर भी साफ नहीं करते हैं ।

कितनी शर्मनाक बात है कि हमें गंदगी में रहना पसंद है लेकिन हाथ पांव चलाना नहीं ।

इसी का नतीजा है कि आज लोग कई बीमारियों से ग्रसित है। जिसका कारण न सिर्फ गंदगी में रहना वरन शारीरिक गतिविधि न करना भी शामिल है ।अस्पतालों के चक्कर लगाना, लाखों रुपए खर्च करना मंजूर है लेकिन अपने आसपास की सफाई रखना नहीं। हम ज्यादा दूर क्यों जाते हैं खुद के शरीर के अंदर ही झांक लीजिए जिसमें व्यायाम न करने के कारण कितनी गंदगी जमा हो चुकी है जो आर्थराइटिस, डायबिटीज और भी न जाने कितनी बीमारियों का कारण बन चुकी है । वजन इतना बढा लेते हैं कि खुद की गर्दन ही नजर नहीं आती है और पेट इतना बढा लेते हैं कि डाइनिंग टेबल बन जाता है कहने का अर्थ है कि अपने आप को बेडौल बना लेते हैं I 

थोड़े से अधिक पैसे कमा लेने से व्यक्ति अमीर नहीं हो जाता ,सुखी नहीं हो जाता।

 ऐ.सी. कमरे में बैठ कर खुद को सुखी , सर्व संपन्न समझने वाला व्यक्ति यह जानता ही नहीं कि सर्व संपन्न तो वह मजदूर है जो दिन रात मेहनत कर अपने शरीर को स्वस्थ रखता है। और मृत्यु पर्यंत कभी बिस्तर नहीं पकड़ता लेकिन जैसे ही लोगों के पास पैसा आने लगता हैं वह अपना अतीत भूलकर ऐशो आराम की जीवन शैली अपना लेता है। आप कह सकते हैं कि पैसा ही सारी समस्याओं की जड़ है। ऐसा नहीं है , असल में सारी समस्याओं की जड़ हमारी मानसिकता है जो अपने इरादों पर दृढ़ नहीं हैं ।समझ बढ़ाने की आवश्यकता है। सुविधाओं का सही इस्तेमाल करने का हुनर सीखने की दरकार है । अभी हाल ही में 11,12 अक्टूबर को मामल्लापुरम में भारत और चीन के बीच हुई

द्वितीय अनौपचारिक वार्ता के दूसरे दिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने बीच पर प्लॉगिंग की। तो जब हमारे प्रधानमंत्री सार्वजनिक स्थल पर सफाई करने में हिचकिचाए नहीं तो फिर हम भारतवासियों को संकोच कैसा । भारत के कई जागरूक नागरिक, कई संस्थाएं इस कार्य में जी-जान से जुड़ी हैं । लेकिन कई क्यों? सब क्यों नहीं ? ज्यादा दूर तक नहीं तो खुद के आसपास तक तो सफाई बनाए रख ही सकते हैं।

चलती गाड़ी से बाहर थूकना, पर्यटन स्थलों पर खाली रेपर, प्लास्टिक बोतलें फेंकना,गंदगी फैलाने का कोई भी ऐसा तरीका बचा नहीं है जो अनछुआ है। मच्छरों को पनपने देने का हर स्त्रोत हमने खुद पैदा किया है। स्वयं को अस्पताल की ओर ले जाने वाले मार्ग को भी हमने ही खोला है। और बस यही बवाल मचाते रहते हैं कि , क्या बताएं हमारा तो हाल बेहाल है । इससे पहले कि आहें भरने के अलावा कुछ भी शेष ना रहे हमें अपने गलत दिशा में बढ़ते कदमों को रोकना ही उचित होगा। बाद में कहीं ऐसा न हो कि हम खुद से ही रूबरू ना हो पाए ।जब हम अपना जीवन इतना नापतोल कर जीते हैं कि, किसने हमें क्या दिया ? फिर हमने उसे क्या दिया ? यानी हमारे पास समय बहुत है तो थोड़ा समय हम अपनी और अपने आसपास की सफाई के लिए भी तो दे ही सकते हैं । अगर स्वयं की दशा व दिशा बदल लेंगे तो राष्ट्र की तो खुद ब खुद बदल ही जाएगी ।

और इसके लिए स्वच्छता की मुहिम तो घर से ही छेड़नी होगी। अब वो दिन बीत गए जब हम कहते थे सब चलता है। अब अगर हम यह कहेंगे तो हम खुद भी चलने की स्थिति में नहीं रहेंगे। सोचने बोलने और करने में तालमेल रखकर ही दिशा को बदला जा सकता है। 


न मिथ्या न कपट।

 बस सत्य पथ अब।

 न कश्मकश,न गुस्ताखियां।

 उजड़ी बगिया को गुलजार है बनाना अब।

 हमने ही बनाया जहन्नुम जिसे जन्नत इसे बनाना अब। 

 हौसलों को बढ़ाकर, फासले हैं घटाना अब ।


4 तरह के लोग होते हैं ।

प्रथम जो जागरुक नहीं है ।

द्वितीय जो जागरूक तो है पर फिर भी सक्रिय नहीं हैं ।

तृतीय जो जागरूक हैं और स्वयं के लिए करते हैं ।

चतुर्थ जो जागरूक है और दूसरों को जागरूक करने के लिए विभिन्न प्रयास करते हैं ।

इसमें कई तरह की संस्थाएं व एनजीओ शामिल है । जिनका लक्ष्य न सिर्फ गंदगी का उन्मूलन करना वरन जीव-जंतुओं का जीवन सुरक्षित करना भी है ।

एनडीटीवी डेटॉल बनेगा स्वच्छ इंडिया का क्लीनाॅथन अपने पांचवे साल में है जिसने भारत सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्यों को अपनाया है। जनशक्ति भागीदारी से इस दिशा में काफी अच्छे कार्य हो रहे हैं। कचरे को सैग्रीगेट करना, फिर रिसाइकल करना जैसे कई सफल कार्य किए जा रहे हैं ।

"बनेगा स्वस्थ इंडिया"। "स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत" जैसे कई कैंपेन पूरे भारतवर्ष में चलाए जा रहे हैं। नकारात्मक सोच में डूब कर अपना वक्त बर्बाद करने से अच्छा है कि हम कुछ अच्छा काम कर ले ताकि खुद का और समाज का भला कर सके।


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