" इज़्ज़त... "
" इज़्ज़त... "
प्यारेलाल जी सुबह-सुबह अपनी पत्नी के साथ चाय का लुत्फ़ ले रहे थें। मौसम बड़ा ही ख़ुशगवार था। दोनों बातचीत कर ही रहे थें कि तभी अचानक गली में कुत्तों के लड़ने की आवाज़ सुनाई दी। फिर क्या था...! प्यारेलाल जी ने आव देखा ना ताव, नंगे पैर ही पायजामे और छेददार बनियान में उन लड़ते हुए कुत्तों को छुड़ाने के लिए दौड़ पड़े। वहाँ पहुंचकर उन्होंने देखा कि कुत्तों के एक झुंड ने एक कमज़ोर कुत्ते पर हमला कर दिया है। किसी तरह से उन्होंने उस कमज़ोर कुत्ते को छुड़ाकर अन्य कुत्तों को वहाँ से भगा दिया। अगर उन्हें ज़रा भी देरी हो जाती तो शायद वे उसकी जान ले लेते..। खैर..! जब वे वापिस घर पहुँचते हैं तब उनकी पत्नी नाराजगी भरी मुद्रा में नज़र आती है। फिर उनके बीच बातचीत होती है :-
“ हे भगवान..!, थोड़ा बहुत तो इज्ज़त का ख़याल किया करों ..! ”
“ ऐसा क्या हो गया बाबा, जो तुम यह कह रही हो। ”
“ दौड़कर जाने से पहले कम से कम चप्पल और ढंग के कपड़े तो पहन लिए होते..! ”
“ अगर मैं ज़रा भी देरी से पहुँचता तो वो शायद उसे मार देते। ”
“ फिर भी बाबा, , आपको बगैर चप्पल पायजामे और डिजाईनर/छेददार बनियान में देखकर लोगों ने मन ही मन न जाने क्या सोचा होगा। आखिर अपना भी तो कुछ स्टेटस है..!
“ देखों..!, अगर कोई ऐसा सोचता है तो सोचे.. ! तुम ही बताओ, निरीह प्राणी की जान बचानी ज़्यादा ज़रूरी थी या खुद का स्टेटस ..!
ये सुनते ही दोनों को जोर की हँसी फूट पड़ी ..!! इसके बाद उनकी पत्नी उनकी इस सोच की प्रशंसा करते हुए गदगद हो उठी...!!“
