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Kanchan Hitesh jain

Drama


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Kanchan Hitesh jain

Drama


इंसान की सोच बड़ी होनी चाहिए

इंसान की सोच बड़ी होनी चाहिए

5 mins 326 5 mins 326

"बहू जल्दी से काम निपटाकर तैयार हो जाना, आज तो विरेन की बुआजी आने वाली है| और हाँ ढंग की साड़ी पहनना, बुआजी बहुत हाईफाई हैं| बड़ा रईस और नामचीन खानदान है उनका| "

नेहा ने हामी भरी और झट से भोजन की तैयारी कर| बुआजी के आने से पहले वह सजधज कर तैयार हो गई|

डोर बेल बजी...

"नेहा बेटा दरवाजा खोल लगता है बुआजी आ गये| " निर्मलाजी ने कहा|

निर्मलाजी की ननद उम्र में उनसे बड़ी थी| तो उन्होंने पैर दबाकर आशीर्वाद लिया| वैसे बुआजी बड़ी हाई फाई थी| लेकिन सोच आज भी पुराने जमाने की थी| निर्मलाजी को देख नेहा ने भी उनके पैर दबाये|

खुश रहो बहू...

तुम्हारी शादी में तो आ नहीं पाई| इसिलिए निर्मला के बर बार बुलाने पर आ गई| सोचा कुछ दिन भाई के यहाँ रहना भी हो जायेगा और बहू से मिलना भी|

निर्मला तेरी बहू तो सुन्दर होने के साथ साथ सुशील भी है सुना है खूब पढी लिखी भी है|

हाँ, हाँ, बाईसा वैसे भी मुझे तो अपने बेटे के लिए पढी लिखी बिवी ही चाहिए थी|

सही कह रही हो निर्मला..

अच्छा तो बाईसा अब आप हाथ मुहँ धो भोजन कर लिजिये| वैसे भी दो बजे है और आप लंबा सफर तय कर आई है तो भूख भी लगी होगी|

नेहा ने भोजन परोसा ..नेहा रसोई के काम में बहुत होशियार थी| विविध प्रकार के पकवान बनाये थे उसने और सब बुआजी के स्वाद हिसाब से|

'बहू सब घर पर बनाया है या बाहर से ऑडर किया है| "..बुआजी ने पूछा|

नहीं बाईसा मैं जानती हूँ आप बाहर का नहीं खाती बहू ने सब कुछ घर पर ही बनाया है|

हाँ ,पर आजकल की पढी लिखी बहुओ को खाना बनाना कहा आता है? 

बाईसा आप चख कर तो देखो..

भोजन इतना स्वादिष्ट था कि बस ऊंगलियां चाटते रहो| उन्होंने नेहा कि खूब तारीफ की और शगुन भी दिया|

"इतना स्वादिष्ट खाना खाकर मन तृप्त हो गया बहू तुमने तो मेरा दिल जीत लिया| "-बुआजी ने कहा

कुछ देर बाद 

सबके भोजन करने के बाद नेहा ज्यो ही खाना खाने बैठी| बुआजी ने टोका.. ये क्या बहू,खाना खाने से पहले सास के पैर दबाते है यह भी नहीं सिखाया क्या तेरी माँ ने? मेरी बहुए तो आज भी मैं कहती हूँ तब ही खाना खाने बैठती है| और पैर दबायें बिना तो कभी खाना नहीं खाती| तुम तो ज्यादा पढी लिखी हो इन सब बातो को कहा समझोगी|

सास के इशारा करने पर उसने पैर दबाये और खाना खाने बैठी|

एक दिन निर्मला जी बाहर गई हुई थी| उनके पीछे बुआजी नेहा के कान भरने लगी| बहू तुम तो पढी लिखी हो ये साड़ी वाडी क्यों पहनती हो| हमारे यहाँ तो बहुओ को पूरी आजादी है तुम कहो तो मैं बात करूँ निर्मला से| निर्मलाजी के सामने कुछ और और उनके पीठ पिछे कुछ और..नेहा को उनका यह गिरगिट जैसे रंग बदलना बिल्कुल पसंद नहीं आया| नेहा पढी लिखी और समझदार थी| वह समझ गई कि बुआजी उनके हँसते खेलते परिवार में फूट डालने का काम कर रही है...

उसने कहा नहीं बुआजी मम्मीजी ने मुझे मना नहीं किया| मुझे साड़ी पहनना पसंद है इसिलिए मैं पहनती हूँ|

दो तीन दिन तक उनका यह सब नाटक चलता रहा बात बात में टोकना गलतियां निकालना| हर बात पर गिरगिट की तरह रंग बदलना| नेहा को उनका दोहरा चरित्र समझ ही नहीं आ रहा था|

उसने विरेन से इस बारे में बात की ...

"नेहा, बुआजी तो उम्र में बड़ी है और चार दिन के लिये आई है| तो लेट गो करने में फायदा है| वरना बेमतलब घर में क्लेश होगा| वैसे भी मम्मी ने तो इतने दिनो से कभी कोई शिकायत नहीं की तो उनकी बातो का बुरा मत मानो| "..विरेन ने समझाया

ठीक है विरेन| आप सही कहते है पर बुआजी दिनभर मम्मीजी के कान भरती रहती है| 

नेहा बुआजी का तो स्वभाव ही ऐसा है पर तुम तो समझदार हो ना|

कुछ दिन ये सब चलता रहा..

एक दिन सुबह सुबह बुआजी निर्मलाजी से बात कर रही थी|

"देखो निर्मला तुम तो बड़ी भोली हो, बहू की लगाम जरा कसकर रखोगी तो अच्छा होगा| वरना भैया के जाने के बाद तुम तो बिल्कुल अकेली हो| पता नहीं कब बहला फुसलाकर विरेन को अपने बस में कर ले और तुझे वृद्धाश्रम छोड आये| वैसे भी ज्यादा पढी लिखी बहुएं ऐसी ही होती हैं| मैंने कई घरों में देखा है और तुम्हारी बहू के चेहरे पर तो चालाकी साफ नजर आती है|"

मुझे नहीं लगता उसको तुम्हारी कुछ पड़ी है| चार दिन से देख रही हूँ| कभी हमारे पास बैठकर क्षण भर के लिए बात तक नहीं की| रात हुई नहीं की कमरे में जाकर सो गई| कभी पैर तक नहीं दबाये ये क्या खाक सेवा करेगी|

नेहा चाय पूछने आई थी| लेकिन बुआजी की बात सुन वह बाहर ही खड़ी रही| इतने दिनों से वह चुप थी लेकिन आज उसे समझ आ गया कि अगर वह चुप रही तो उसके घर को बिखरते समय नहीं लगेगा|

उसने अंदर आकर कहा "मैं माफी चाहुँँगी कि मैंने छुपकर आप लोगों की बात सुनी| बुआजी आप घर की बड़ी हो हमारे हँसते खेलते परिवार को देख खुश होने की बजाय आप हमारे घर में फूट डालने का काम कर रही हैं| हाँ मम्मीजी भोली हैं लेकिन मैं तो चालाक हूँ, इसलिए एक बात कहना चाहती हूँ बुआजी माफ करना, लेकिन इंसान के कपड़े नहीं उसकी सोच स्टैण्डर्ड होनी चाहिए| छोटी सोच और पैर में मोच इंसान को जीवन में कभी आगे नहीं बढने देती|

तो दोस्तों, हमारे जीवन में हम भी बुआजी जैसे कई लोगों से मिलते हैं जिनका काम ही होता है लोगों के घर तोड़ना| यह हम पर निर्भर करता है कि हम नेहा की तरह समझदारी से काम लेते हैं या लोगों की बातों में आकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार देते हैं|

©®कंचन हितेश जैन



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