Dr Jogender Singh(jogi)

Tragedy


4.0  

Dr Jogender Singh(jogi)

Tragedy


हिलती पलकें ढुलकते आँसू

हिलती पलकें ढुलकते आँसू

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गोपाल का सुन्दर चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम गया। गोपाल का रंग सुर्खी लिए गोरा, नैन -नक़्श ऐसे, मानो मूर्ति बनाई गयी हो। उसका बात करने का लहजा उसको और भी सुन्दर बनाता। मेहनत करने में उसकी बराबरी करना असम्भव न हो, पर कठिन ज़रूर था। घर पर माँ, छोटा भाई मनोज, पत्नी और दो प्यारे बच्चे। बड़ी बेटी अनामिका और छोटा बेटा सूरज।  

“ भाई साहब ! आप का नाम दूर / दूर तक होना चाहिये ” जिस दर्जे के आप कलाकार हो, आपका इस छोटे से ऑफ़िस में बने रहना उचित नहीं। आप अपने पर फैला लीजिये, धरती नहीं आप आसमान में उड़ने के लिए बने हो। गोपाल मेरे ऑफिस में घुसते ही बोलता।  

चलो रहने दो। बैठो ! बहुत दिनों बाद आये? 

सुल्तानपुर गया था। मैं अब एक ऑफिस सुल्तानपुर में भी खोलूँगा, फिर देखना आप। गोपाल जोश से बोला। आप ने क्या बनाया नया ? 

बनाई है तीन पेंटिंग, साधारण सी। सुल्तानपुर से अच्छा तुम लखनऊ या उन्नाव में ऑफिस खोलते, कानपुर से पास पड़ता।

साधारण तो आप को लगती है अपनी पेंटिंग। होती सब मास्टरपीस है, आप एक चित्र प्रदर्शनी क्यों नहीं लगाते ? गोपाल की आदत थी मुझे उत्साहित करने की। भाई साहब उन्नाव के क्लाइयंट तो में कानपुर से कवर कर लेता हूँ आराम से, उस के लिए ऑफिस खोलने की ज़रूरत नहीं है। रहा लखनऊ, वहाँ कॉम्पटिशन बहुत ज़्यादा है। आप देखना मैं कैसे काम फैलाता हूँ सुल्तानपुर में।

सही है गोपाल, खूब तरक़्क़ी करो। दरअसल गोपाल जीवन बीमा एजेंट है। जीवन से भरपूर, मेहनतकश, किसी भी व्यसन से दूर।  

लो चाय पियो, मैंने कप उसकी तरफ़ सरकाया। दखो गोपाल अपनी सेहत का भी ध्यान रखा करो। काम करना अच्छी बात है। लेकिन हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है, एक पूरी होते ही दूसरी सिर उठाने लगती है। हमें अपनी ज़रूरतों को सीमित रखना चाहिए।  

आपकी यही बात मुझे ठीक नहीं लगती। अभी मनोज की शादी करनी है, अनामिका को डॉक्टर और सूरज को वकील बनाना है। तीनों के नाम कम से कम एक / एक करोड़ रुपये जमा कराने है। एक बड़ी गाड़ी कम से कम होण्डा सिटी हो और एक मकान पाँच बेड रूम का। उसके बाद आराम और ऐश। गोपाल मुस्कुराया हलके से।

भगवान तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करे। मैं भी धीरे से मुस्कुराया।

एक और भी इच्छा है। आपका नाम हो, सारी दुनिया जाने की आप कितने अच्छे चित्रकार हो। गोपाल कप सरकाते हुए बोला।

मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं गोपाल। मैं पेंटिंग बनाता हूँ, क्योंकि मुझे इसमें सुकून मिलता है। गुज़ारे के लिए बैंक की नौकरी है ना।  

देखते जाइए, आगे - आगे होता है क्या ? गोपाल ने मेरे पैर छुए। चलता हूँ।  

ध्यान रखना अपना।  

जी, गोपाल ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए कहा।

उसके बाद परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया, मेरा ट्रांसफ़र मुरादाबाद हो गया। गोपाल से फ़ोन पर बात होती रहती, पर मिलना नहीं हो पाया। उसकी कामयाबी के बारे में जानकर ख़ुशी होती।

दो साल पहले गोपाल का फ़ोन आया “ मनोज की शादी तय हो गयी, बीस जनवरी की बारात है, आप को सपरिवार आना है कम से कम एक हफ़्ते के लिए।  

ज़रूर आऊँगा, तुम्हें देखा नहीं चार साल से।  

माता जी का देहांत होने के कारण मैं मनोज की शादी में नहीं जा पाया।  

पंद्रह दिन बाद कई बार गोपाल का फ़ोन मिलाया, हर बार आउट ओफ़ नेटवर्क।

कई दिन तक कोशिश की। पर फ़ोन नहीं मिला। अपने ऊपर ग़ुस्सा भी आया कि उसका कोई और नम्बर क्यों नहीं लिया। कम से कम मनोज का नम्बर तो ले सकता था। फिर धीरे धीरे गोपाल का मोबाइल नम्बर सिर्फ़ कोनटैक्ट लिस्ट में रह गया।

दस दिन पहले जब कानपुर तबादले का आदेश मिला, तो सबसे पहले गोपाल की याद आयी।

अपना सामान सेट करके, मैं सीधा गोपाल के घर पहुँचा। दरवाज़ा अनामिका ने खोला। मुझे पहचान नहीं पायी।

“जी किससे मिलना है ? ”

गोपाल है बेटा। मैं दीपक खुल्लर।  

ओह दीपक अंकल, आपकी पेंटिंग लगी है पापा के रूम में, आइये बैठिये। माँ ! दीपक अंकल आयें है।  

नमस्कार भाई साहब।  

नमस्ते भाभी जी, गोपाल को बुलाइए। मैं अधीर हो रहा था।  

वो नहीं आ सकते, आप को चलना पड़ेगा। उनकी आँखों में आँसू थे।

क्या हुआ गोपाल को ? मैंने परेशान हो कर पूछा।

दो साल पहले, मनोज की शादी के हफ़्ते भर बाद सुल्तानपुर जाते हुए इनका ऐक्सिडेंट हो गया। बहुत इलाज कराया पर — वो हिचकियाँ भरने लगी। आइये।

मैं उनके पीछे गोपाल के बेडरूम में आया। सामने दीवार पर मेरी सूर्योदय दिखाती पेंटिंग लगी थी। कमरे के बीचोंबीच गोपाल छत की और देख रहा था। मैंने ऐन उसके सामने जाकर पुकारा “ गोपाल, यह क्या हो गया ? ”मेरी आँखों में आँसू थे।

फिर मैं न जाने क्या / क्या बोलता रहा, बिना यह ध्यान दिए की गोपाल कोई प्रतिक्रिया दे रहा है या नहीं।

बस करिए भाई साहब, वो न हाथ/ पाँव हिला सकते है, न सिर। न ही कुछ बोल सकते हैं।

मैंने चौंक कर गोपाल को देखा, उसके गालों पर आंसुओं की धार थी। और पलकें हिल रही थी।

पता नहीं क्या सोचते हैं पापा ? आँसू और हिलती पलकें, बस यही भाषा बची है इनकी। अनामिका ने आँसू भरी आँखों से मेरी तरफ़ देखा।



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