हीरो
हीरो
अनाया के हाथ में एक आइडेंटिटी कार्ड है जिसे पच्चीसों बार चूम लिया है उसने और फिर उसे इस तरह हसरत भरी निगाहों से देख रही है जैसे बहुत कीमती चीज़ हो .... । मुझे देखते ही उसने जरा ऊंची आवाज़ में कहा "देखो ना मम्मा यह मेरा है इसमें मेरी तस्वीर है और मेरा नाम लिखा है ।" अब मैं कहीं भी किसी से भी मिलने जा सकती हूं और मेरी गाड़ी पर भी "प्रेस " लिखा रहेगा तो बेवजह उसे कोई रोकेगा नहीं । और हां तुम भी मेरे साथ कहीं भी चल सकती हो ........ उसके शब्द पूरे होने से पहले ही मुझे जैसे एटैक पड़ गया हो .... कलेजा थाम कर बैठ गई नीचे ....। अचानक माहौल बदल गया थोड़ी देर पहले जो खुशी का उन्माद था वो गमगीन माहौल में बदल चुका था .... ।
मैं लगभग सैंतीस साल पीछे लौट गयी । जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थें और मैं उनकी ऐसी दीवानी थी कि दिन रात बस राजीव गांधी की ही तस्वीर देखती रहती थी । अपने बेडरूम में बेड के ठीक सामने बीचोबीच में लगा रखा था ताकि आंख खुलते ही उन्हें देखूं ...। अखबार में जहां कहीं उनकी तस्वीर मिलती फट से काट कर रख लेती । वो दिन मुझे खूब अच्छे से याद है जब अपनी सहेलियों को बुला कर पार्टी कर रही थी । राजीव गांधी के नाम का केक काटने से पहले उनके तस्वीर पर तिलक लगाया तब दादाजी ने रोका था । कहा था तुम कुंवारी लड़की हो किसी गैर मर्द को तिलक नहीं लगा सकती और माला नहीं पहना सकती .... मैं थोड़ी मायूस हो गई लेकिन फिर सहेलियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि जल्दी करो , जल्दी करो घर जाना है । तब पापा ने मेरा साथ दिया था कि ठीक है आज तिलक लगा लो लेकिन अगले बार से ध्यान रखना नहीं तो सोनिया गांधी तुम्हारी जान ले लेगी .... इतने पर एक जोरदार ठहाका लगा और सब सहजता महसूस करने लगे केक काटा गया ,समोसा , गुलाबजामुन और पापा के पसंद का कलाकंद भी आया था फिर कोको कोला और थम्स अप भी था । खूब मज़े किए हमने फिर शाम ढलने से पहले ही सहेलियां विदा हो ली । सभी अपने अपने घर चली गई ।
मेरे पढ़ने का समय होने वाला था । मैं किताब ,कॉपी , पेन समेट कर ड्राइंग रूम में पहुंच गयी । मेरे सर समय के बड़े पाबंद थें । कड़ाके की ठंड हो या चिलचिलाती धूप या बरसात हो उन्होंने समय दिया है तो नियत समय पर जरूर पहुंच जाएंगे और उनके पहुंचने के बाद अगर किताब कॉपी ढूंढना शुरू करूं तो उन्हें बहुत तेज गुस्सा आता था । नाक पर पसीने की बूंद झिलमिलाने लगती थी और गोरा चेहरा तमतमा का लाल हो जाता था ..... यह दृश्य मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था इसलिए हमेशा पहले से ही तैयारी रखती थी । वो आ गये मैंने देखा और फट से दरवाजा खोल दिया । पापा भी वहीं थें उन्होंने कहा केक लाओ तो उन्होंने कहा केक ! "आज किसका जन्मदिन है ? " मैंने कहा राजीव गांधी का वो हंसने लगे जोर से मुझे अभी तक वो हंसी याद है .... पापा ने कहा हां देखिए ना इसके कमरे में जाकर बड़ी सी तस्वीर लगा रखी है , तिलक भी लगाया जिस पर जरा सा विवाद भी हो गया । बाबूजी पुराने ख्यालात के हैं , उनके हिसाब से किसी भी लड़की को गैर मर्द को तिलक नहीं लगाना चाहिए और ना ही माला पहनाना चाहिए क्योंकि पहले माला पहनाने का मतलब उसे पति के रूप में स्वीकारा जाना माना जाता है । इसलिए बाबूजी ने रोका था । खैर हमारी पढ़ाई-लिखाई शुरू हुई । उसके बाद उन्होंने पूछा था "तुम इतना चाहती हो राजीव गांधी को ?" मैंने कहा हां बहुत ज्यादा तब उन्होंने कहा था ठीक है मैं तुम्हें उनके पास ले चलूंगा , मैंने कहा सच ..! सचमुच आप मिलवा सकते हैं ...? उन्होंने कहा हां "मैं पत्रकार बन गया हूं मुझे मेरी आइडेंटिटी कार्ड मिल जाएगी तब मैं तुम्हें अपने साथ दिल्ली ले जाऊंगा और राजीव गांधी से मुलाकात करवा दूंगा ।" खुशी के मारे मेरी आंखें चमक उठी और फिर मेरे सपने और भी रंगीन होने लगे ..... ।
अभी कहानी बाकी है । मगर ताशी मेरे हाथ में चाय पकड़ाने लगी तो मेरा ध्यान भंग हुआ और यथार्थ के कठोर भूमि का एहसास हुआ ..... अब तो राजीव गांधी है ही नहीं .... और ना कोई ऐसा जिससे मिलने का ऐसा उन्माद है दिल कहीं और ही लगा बैठी ....। जिस राजीव गांधी से मुलाकात का ख्वाब देखा था और उस ख्वाब को हकीकत करने की चाह में मैंने उस पत्रकार से एक नाता जोड़ लिया था । उस वक्त तो सिर्फ राजीव गांधी से मिलने की तमन्ना थी , जुनून था एक नशा सा सवार था । मेरी समझ में पत्रकार महोदय ही एकमात्र इंसान थें जो मेरा सपना सच कर सकते थें इसलिए मैं बस उनके प्रति आसक्त हो गई । हर रोज़ का मिलना जुलना , पढ़ना लिखना दैनिक दिनचर्या में शामिल हो गया और यह सब होते होते उसी जरिए से लगाव हो गया जुड़ाव हो गया फिर ........... न जाने क्या क्या हुआ मन सातवें आसमान पर चढ़ गया वक्त अपने नियत गति से गुजरता रहा पत्रकार महोदय अपने पत्रकारिता के क्षेत्र में फलते फूलते रहें । मेरा बचपना कब किशोरावस्था में पहुंच गया और कब युवा अवस्था पार करने लगा पता ही नहीं चला .....
फिर एक दिन वह मनहूस खबर आई की राजीव गांधी की हत्या हो गई । सुनकर सदमा लगा , दुःख भी हुआ मगर जैसा की प्रकृति का नियम है धीरे धीरे हर दुःख दर्द कम होता जाता है और फिर समाप्त हो जाता है । हम वक्त के साथ चलने लगते हैं । चलते चलते बहुत आगे बढ़ने के बाद उस पत्रकार महोदय में राजीव गांधी नजर आने लगे और बूझता हुआ चिराग फिर से जगमगा उठा । अब शुरू हुआ एक नया सिलसिला .......। मगर ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है । वक्त फिर करवट लिया और इस बार रफ्तार बड़ी तेज़ हुई और तीन दशक पार करने के बाद जरा धीमी हुई । बेहोशी का आलम टूटा तो अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी हुई मिली । हाथ में मोबाइल था जिसे बेख्याली में आन कर लिया था । व्हाट्सएप चैट खुल गया डीपी टच हो गई जिसे देखकर कम्पाउन्डर चौंक गया और देखने के लिए करीब आया "ये तस्वीर राजीव गांधी जी की है ? " मैंने कहा नहीं तो और मोबाइल आफ कर दिया मगर कम्पाउन्डर जरा ढीट हो चुका था सप्ताह भर से मिलते मिलते । "उसने कहा दिखाई एक बार प्लीज़ । मैंने दिखाया तो कम्पाउन्डर ने फिर अपनी बात दोहराई हूबहू राजीव गांधी जी की शक्ल है क्या आप इनसे मिलवा सकती हैं ? मैं भी राजीव गांधी जी का जबरदस्त फैन हूं इन्हें देखकर मुझे बड़ी खुशी होगी प्लीज़ आप मिलवा दीजिए । उस वक्त अधिक बात करने की हालत में नहीं थी इसलिए कह दिया "हां ज़रूर मिलवा दूंगी पहले यहां से ठीक होकर घर पहुंचूं तभी तो बुलाऊंगी इन्हें ।" हॉस्पिटल में कहां रखूंगी ? कम्पाउन्डर खुशी खुशी चला गया और मैं सोचने लगी कि सिर्फ मुझे ही नहीं औरों को भी लगता है कि उनकी शक्ल राजीव गांधी जैसी है ।
हॉस्पिटल से घर आई और फिर दैनिक दिनचर्या में रम गई । कम्पाउन्डर भी भूल गया शायद फिर कभी उसने जिक्र नहीं किया ।
करीब तीन साल बीत गए तब वो तमाम बातें किसी चलचित्र की भांति घूमने लगी हैं ।
ताशी की आइडेंटिटी कार्ड उठा कर देखा और आलमीरा में संभाल कर रख दिया । स्कूटी पर प्रेस लिखा गया है । कार पर भी स्टीकर चिपकाया गया है । शायद कल किसी विशिष्ट हस्ती का इंटरव्यू लेने जाना है ।
मगर उसे क्या उसका हीरो "राजीव गांधी" तो रहें नहीं । उनके हमशक्ल पत्रकार महोदय से मिलने का क्या फायदा ? दोनों के रास्ते अलग हो चुके हैं मंजिल अलग है । हम दोनों की दुनिया अलग है । हम अपने अपने संसार में मगन हैं , सुखी , संतुष्ट और खुशहाल है ।
बचपन की चाह , किशोरावस्था का आकर्षण और युवावस्था का उन्माद खत्म हो चुका है । पचपन वसंत देख लिया है । उम्र के साल लकीरों का शक्ल लेकर निशानियां छोड़ने लगे हैं । चांदी के तारों से बालों का श्रृंगार हो चुका है । वक्त बहुत बदल गया है । अब तो बच्चों के दिन हैं अपने हीरो चुनने का और उस हीरो से मिलने जुलने का । अपना हीरो तो वही जीवनसाथी हैं जिनके साथ गुज़रे हैं दशकों दशक ... ।
