Shakuntla Agarwal

Tragedy


4.8  

Shakuntla Agarwal

Tragedy


"गुनहगार कौन?"

"गुनहगार कौन?"

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उमा आज काम करने नहीं आयी । पता नहीं आयेगी भी या नहीं, फ़ोन भी नहीं किया । वह तो टॉइम की इतनी पाबन्द है कि भले ही घड़ी में टॉइम मिला लो । इतने में उमा हड़बड़ी में प्रवेश करती है ।" अरे उमा ! तू आज कहाँ रह गयी थी ? आज लेट कैसे हो गई ? हम अभी तेरी ही बातें कर रहे थे । "


"क्या करूँ ऑंटी, आज फिर हरी देर रात तक घर नहीं आया तो उसको ढूँढ कर लाने में ही दो बज गये । वो तो भला हो हमारे घर के पास ही ऑटो चलाने वाले भईया का । उसने उसे सड़क पर पड़े देख लिया । सवारी छोड़कर मेरे पास घर आया और फिर मुझें लेकर गया । तब जाकर हम हरी को नशें में धुत्त, सड़क से उठा कर लाये, शुक्र है कोई गाड़ी नहीं आयी, नहीं तो कुचल जाती साले को । ऑंटी, मैं तो इस रोज की किच - किच से तंग आ गयी हूँ ।" 


ऑंटी -" उमा ! ये बात तो बता, उसके पास पीने के लिये पैसे कहाँ से आते हैं ? काम - धन्धा तो कुछ करता नहीं ।" 


उमा - "क्या बताऊँ ऑंटी, घर की चीजों को उठाकर ओने - पोने दामों में बेच आता है । बस उसका पऊआ आना चाहिये । उसे कौन सा कमाना है । और कभी - कभी तो जो मैं कपड़े की तह में पैसे बचाकर रखती हूँ, उन्हें भी ले जाता है । उसे यह भी समझ नहीं आता कि यह रात - दिन खटती है, तब जाकर दो जून की रोटी का जुगाड़ हो पाता है । बच्चों की फीस और हारी - बिमारी के खर्चे के लिये तो उधार ही चलता रहता है । पर उसे क्या लेना - देना, उसे तो पीने से मतलब है । पीता तो है ही ऑंटी, पर पीकर जो हँगामा मचाता है, उसका क्या करूँ ? वो तो पूरे गली - मोहल्लें को ही सर पर उठा लेता है । वो तो मेरे व्यवहार की वजह से, मोहल्लें वाले खोली खाली नहीं करवा रहें हैं, नहीं तो सड़कों पर भीख माँगते फिरते । होश तो उसे रहता नहीं ऑंटी, आजकल तो हाथ भी उठाने लग गया है । डंडा हाथ में आ जाये तो उसी की दे पाड़ता है । समझ नहीं आ रहा क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? कुछ समाधान ही नज़र नहीं आता । काम करती रहीं और अपने रोने रोते रहीं ।" 


ऑंटी - "तूने ठेला भी तो लगवाया था, उसका क्या हुआ ? तू भी तो काम निपटाने के बाद, उसका हाथ बटानें वहाँ चली जाती थी । अच्छा - खासा कमाने लग गया था ।" 


"क्या बताऊँ ऑंटी ! ग्राहकों को तो मेरा खसम बना दिया । कहने लगा कि तू तो बदचलन हैं । खीं - खीं करके हँसती रहती है और इनसे नैन मट्टका करती है । मुझपें लाँछन भी लगाया और सामान बेचकर दारू भी पी गया ।" 


हरी को उमा बेचारी पता नहीं कहाँ - कहाँ से ढूँढ़कर लाती और ऐसे ही धीरे - धीरे गृहस्थी की गाड़ी आगे खिसक रही थी । परन्तु एक दिन तो हरी ने हद ही कर दी, जब उमा का नाम पड़ोसी के साथ जोड़ दिया । मेरे पीछे से उसके साथ गुलछर्रें उड़ाती है, और मुझें ऑंखें दिखाती है । आज मैं तेरी इन आँखों को ही निकालकर रख दूँगा । न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी । कहते हुए उमा की आँखों में लाल - मिर्च झोंक दी, और चोटी से पकड़कर, घसीट कर चूल्हें के पास ले गया । आज मैं तेरा काम - तमाम कर देता हूँ । जैसे - तैसे पड़ोसियों ने बीच - बचाव करके उसे बचाया । 


यह काम वाली बाईयों, निम्न वर्ग और मजदूरों की बहुत बड़ी समस्या है कि घर के मर्द या तो काम करते नहीं हैं और अगर करते भी हैं तो उस कमाई को दारू में उड़ा देते हैं । उन्हें घर की ज़िम्मेदारियों का अहसास नहीं हैं । ज़्यादातर महिलायें घर का भार भी ढोती हैं और अपने पति को भी संभालती हैं । दूसरी ओर पति घरवाली पर हाथ उठाते हैं । घरवाली पर हाथ उठाना, लाँछन लगाना और कभी - कभी औरतों को मौत के घाट उतार देना उनकी फितरत बन गयी है । हमारे देश में इन शराबियों की बहुत बड़ी तादाद है, जिन्हें खाना मिले या न मिले, लेकिन "शकुन" दारू मिलनी चाहिये । 



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