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Raju Kumar Shah

Tragedy

4.5  

Raju Kumar Shah

Tragedy

गरीब क्या करता है

गरीब क्या करता है

6 mins
463



अप्रैल का महीना था, दोपहर का समय। लू के थपेड़े उसके शरीर में बची नमी को खींच रहे थे, जैसे पानी का एक-एक बूंद खींच लेना चाहते हो! खून तो सूदखोरों ने पहले ही खींच लिया था! आंखें, आंखों की सुरक्षा के लिए बनी हड्डियों के सांचे में धंस चुकी थी। कंधे और हाथ की हड्डियों को जोड़ने वाली हड्डी साफ-साफ दिखाई दे रही थी, उभरी हुई! हालाँकि उसपर चमड़े का पर्त अभी भी बाक़ी था। पेट का वह गहरा हिस्सा भी दिखता जो कालांतर से अधभुखा होने की वजह से खाईनुमा हो चुका था।लेकिन उसको छुपाने के लिए एक तार-तार हुई बनियान बची हुई थी। नीचे एक लुंगी उसने पहन रखा था, जिसे उसने कुछ छः माह पहले खरीदा था।

वह अपने खेत के एक किनारे लगे बबुल के पेड़ पर डाले गए मचान, पर बैठा था। सिर्फ़ तपती धरती इस धूप में लोगों का भर्ता बना सकती थी लेकिन वह इस खुले मैदान में, लू और गर्मी दोनों को झेल रहा था। पर उसे चिंता इस बात की नही थी कि इस गर्मी और लू से कैसे बचा जाय! बल्कि इसकी कि इस बार रामनवमीं के मेले में अपने बच्चों को मेला कैसे घूमाने ले जाएगा! दिल तो उसने बहुत तोड़ा है, अपना, अपनी पत्नी का, अपने बच्चों का, अपनी माँ का! माँ तो इसी उम्मीद में चल बसी थी कि किसी दिन उनका बेटा उनके लिए एक अच्छी सी साड़ी लेकर आएगा। और पत्नी अपने पति के हालातों को देखते हुए मौन हो गई थी। उसने मान लिया था कि मायके से गाहे-बगाहे आये साड़ी और सामानों से ही उसके श्रृंगार पूरे होंगे। लेकिन बच्चों का क्या! न तो वे इतने समझदार थे कि अपने पिता की स्तिथि को समझे और बार-बार ज़िद करना बंद कर दे! और न ही उनका कोई मायका था जिससे उम्मीद लगा के बैठते कि वहाँ से उनके लिए कुछ आएगा। बच्चे चाहे अमीर के हो या गरीब के उनकी इच्छाएं और हरकतें एक जैसी ही होती है। ज़िद तो उनके स्वभाव में होता है। हाँ, यह अलग बात है कि अमीरों के बच्चों की इच्छाएं पल में पूरी हो जाती है और गरीबों की, सालों दबते-दबते मर जाती है।

' लेक़िन इस बार वह ऐसा नही कर सकता!पर उपाय क्या है?' उसने अपने आप से पूछा। फिर मचान से ही सिर उठाकर गेहूं के खेत मे नज़र डाली 'अभी अधपके है,इन्हें काटकर तो बेचा भी नही जा सकता'। फिर उसने मक्के की खेत मे नज़र डाली 'अभी तो दाने भी नही आये होंगे'। 'किसी से उधार लिया जाय? नामुमकिन है, सबसे तो ले चुका है! फिर? फिर तो कोई उपाय नही बचा है! तो क्या बीबी के कुछ गहने? सब तो बिक चुके है! तो क्या कुछ खेत गिरवी? नही! नही! मेले के लिए खेत गिरवी कौन रखता है! वैसे भी मां की बीमारी में एक तिहाई जमीन गिरवी रखी जा चुकी है।कहीं से कोई उम्मीद नही थी, उम्मीद की किरण भी नही थी। परेशान होकर उसने सोचना बंद कर दिया। लेकिन सोचना बंद भर कर देने से समस्या का निराकरण तो नही हो जाता!

अगली सुबह रामआधार खेत पर ही बना रहा। घर जाकर वह अपने बच्चों का सामना नही कर सकता था। क्योकिं उसके पास एक रुपया नही था कि वह उनको मेला दिखाने ले जा सके। वह सुबह से ही मक्के के खेत मे कुदाल लेकर जबरजस्ती काम करता रहा। उधर घर पर बच्चे उसका इंतजार करते रहे कि 'पापा खेत से आयेंगें और हमें मेला लेकर जाएंगे। लेकिन धीरे-धीरे बारह बज गए रामआधार खेत से घर नही आया। अधीर होकर उसके सबसे छोटे बेटे ने अपनी माँ से पूछा--

'माँ! पापा नही आयेंगें क्या? मुझे मेला जाना है, उन्होंने कल जाने के लिए कहा था।'

माँ क्या जवाब देती उसे पता था कि रामाधार घर क्यों नही आ रहा है।। वह चुप ही रही। उसे चुप देख लड़के ने फिर पूछा -'माँ! मैं खेत से पापा को बुला लाऊं?'

माँ को कुछ बोलता हुआ न देखकर वह दौड़ता हुआ खेत पर चला गया। उसने देखा उसके पिता मचान पर सो रहे थे।

'पापा!ओ पापा! आप सो रहे हो? हमलोग घर पर कब से इंतजार कर रहे है कि आप आओगे और हमें लेकर मेला चलोगे। चलो न पापा जल्दी! सब लोग मेला जा रहें है।'

बच्चे की आवाज सुनकर उसने नीचे देखा। उसके बच्चे के चेहरे पर डर और याचना साफ झलक रही थी। डर इस बात का कि कहीं हर बार की तरह इस बार भी पापा मेला ले जाने से इनकार न कर दे। और इसी डर ने उसे अपने पिता के सामने याचक बना दिया था। बेटे की हालत देख रामआधार का कलेजा मुँह को आया। लेकिन आंखे इस तरह के दृश्यों के लिए अभयस्त हो चुकी थी। वह कुछ देर तक उसकी मासूमियत को घूरता रहा। इस बार उसे इनकार करते न बना! वह मचान से नीचे आया और बोला-'चलो मेला चलते है'।

रास्ते भर उसके बच्चे आपस में बात करते रहे। कोई कहता'मैं मेले में पापा से गुब्बारे ख़रीदवाऊंगा। कोई कह रहा था' मैं तो खूब सारी जलेबी और चाट खाऊंगा। तो कोई कहता 'मैं तो पापा से बाँसुरी ख़रीदवाऊंगा और मचान पर बैठ के कृष्ण भगवान की तरह बाँसुरी बजाऊँगा।

रामआधार उन सबकी बातें सुन रहा था और चलते जा रहा था। उसके पैर उसे मेले की तरफ जाने से रोक रहे थे और ज़मीर धिक्कार रहा था ' कैसा है रे! तू तो इनकी छोटी-छोटी ख़्वाहिश भी पूरी नही कर सकता है, क्या तुझे बाप कहलाने का हक़ है?'

पर रामआधार निर्लज हो चुका था। उसे जमीर की आवाज सुनाई नही दे रही थी। वह तो कुछ सोचता हुआ चले ही जा रहा था। उसने इस बार अपने बच्चों का दिल तोड़ने का अलग तरीका निकाल लिया था। कम से कम इस तरीके से उसके बच्चों का दिल आधा ही टूटेगा न? बच्चे कुछ खा नही पाएंगे न? कुछ ले नही पाएंगे न?लेकिन कम से कम मेले में आकर खुश तो होंगें! और यह तरीका अपनाने से वें रोज यह तो नही कह पाएंगे कि 'पापा हमको इसबार भी मेला दिखाने नही ले गए!'

मेले में पहुँचतें ही सब अपने पापा की उंगली पकड़ के अपनी-अपनी फ़रमाइश बताने लगे- पापा!पापा! वह देखो, गुब्बारे! वह देखो जलेबियाँ!वह देखो बाँसुरी! एक ने कहा-'पापा मुझे बाँसुरी दिला दो न!'

वह उनको बाँसुरी वाले के पास ले गया। उसने बाँसुरी का मोल भाव किया। पांच रुपये की एक थी। उसने बाँसुरी वाले से बाँसुरी ली और बच्चे को दे दिया। बच्चा तुरंत बाँसुरी बजाने लगा। रामआधार ने बाँसुरी वाले को पैसा देने के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में हाथ डालना रामआधार का मात्र दिखावा था! जेब में पहले से ही कुछ नही था! उसने ऐसा सिर्फ़ उस बाँसुरी वाले को और अपने बच्चों को दिखाने के लिए किया , क्योकिं वह नही चाहता था कि बाँसुरी वाला और उसके बच्चें यह जाने की उसके पास पहले से ही पैसा नही था। उसने मेले में आने से पहले ही अपने कुर्ते की जेब फाड़ ली थी ताक़ि सबको यह लगे जैसे मेले में किसी चोर ने उसकी जेब काट ली हो!

रामआधार ने बाँसुरी वाले के सामने सन्न हो जाने का अभिनय किया! लेकिन बाँसुरी वाला निर्मोही निकला।उसने झट से लड़के के होंठ से बाँसुरी छीन ली! और उनको दुत्कारते हुए वहाँ से भगा दिया



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