kumar gourav

Abstract Inspirational


4.2  

kumar gourav

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घुंघरू

घुंघरू

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घुंघरू उसे बहुत प्रिय थे। दुकान पर दो नहीं चार घुंघरू बाली पायल लूंगी ,कहकर मां से लड़ पड़ती थी। मां समझाती ज्यादा घूंघरू छमकाना ठीक नहीं है ,लोगों की नजर लग जाती है। फिर उसकी जिद के आगे हार जाती और ,तीन घूंघरूओं वाली पायल ले देती। मुँह फुलाये वो पायल पहन कर माँ पर अहसान करती।  

जबकि उसे ठीक ठीक याद था पहली बार घूंघरू से परिचय उसकी माँ ने ही करवाया था। कैसे ठुमक ठुमक कर चलती थी वो आँगन में , और माँ उसे सब कामधाम छोड़कर निहारा करती थी। 

याद है पिता ने कितना झगड़ा किया था इतनी मँहगी चीजें खरीदने की औकात नहीं है हमारी तुम समझती नहीं हो। बेटी जात है अभी से जोड़ना शुरू करोगी तब जाकर इसके लिए ऐसा घर वर ढूंढ पाओगी जहाँ सुख से रह पाओगी। माँ डांट सुनकर भी हँस देती तुम बेटी को राजमहल भेजने के सपने देखते रहो। विधाता ने उसके जीवन में रानी बनने का सुख लिखा है या नहीं मुझे नहीं पता लेकिन ये मेरे हाथ में है मैं उसे राजकुमारियों की तरह पालूंगी। 

फिर पिता परदेशी हो गये साल दो साल पर कभी आते लेकिन उसके नाम से खुले बैंक खाते में हर महीने की पांच तारीख को दस हजार रूपये जरूर आ जाते। उस रात सो नहीं पाती माँ के सीने से लग पूछती क्या पिता के मन में हमारे तुम्हारे लिए प्रेम की छोटी सी लौ भी नहीं जलती। माँ उसके बालों में अंगुलियां फिराती हुई बुदबुदाती कहते हैं तेरा मेरा प्रेम तो अखण्ड ज्योत है जो हमेशा जलता रहेगा। हम दोनों ने एक सपना देखा बेटी को सुखी जीवन देने का। तुम तो उसे राजकुमारी बनाकर पाल ले रही हो लेकिन मेरा उसके लिए राजकुमार ढूंढकर लाने का सपना कहीं अधूरा न रह जाए। बस उसी सपने की चमक में इस ज्योत की लौ कहीं छुप न जाए।

बाद में उसके घूंघरूओं से न जाने माँ को क्यों चिढ़ होने लगी है। जबकि अब तो जब चलती है तो घूंघरूओं की छनकार सुन हर आता जाता उसे कितनी हसरत से निहारता है। 

माँ बाप के सपने से इतर उसने भी एक सपना देखा सिल्वर स्क्रीन पर चमकने का। माँ को समझा बुझाकर पिता को बिना बताये वो बम्बई पहुंच गई।

थोड़े संघर्ष के बाद उसने अपने सपने पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आज फिल्म शूटिंग का पहला दिन है। 

उसे नृत्य दृश्य का अभिनय करना है पैरों में घूंघरू बाँधते हुए उसने घूंघरू की छनकार सुनी तो अबतक का पूरा जीवन एक फिल्म की तरह उसके सामने घूम गया।

उसके कदम घूंघरू का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं जबकि उसका सपना पूरा होनेवाला है। सपना तो उसके माता पिता ने भी देखा था। माँ ने राजकुमारी और पिता ने रानी का जीवन देने का। स्वयं का सपना उसे कहाँ ले जा रहा है ये तवायफ का किरदार। नहीं अपने सपने पूरे करने के लिए उनके जीवन भर के सपने को मिट्टी में नहीं मिला सकती। 

"फिर "

"फिर क्या ? दिमाग भन्ना गया एक पैर में घूंघरू बांधे ही शूटिंग छोड़कर सड़क पर आ गई। आटो लिया और स्टेशन आई। अब वापस घर जा रही हूं। टिकट लेने का भी होश नहीं रहा। "

सामने बैठी पिया उसकी बातें आँखें फाड़े सुन रही थी। दुनिया जहान के फिल्मी लोग अपना सपना पूरा करने भागे हुए मुंबई आते हैं और ये गजब फिल्मी लड़की है जो मुंबई छोड़कर भाग रही है।

 गाड़ी रूकी तो पिया अपना टिकट उसे थमाते हुए उतर गई " रख लिजिए आपके काम आएगी। "

उसने आँखें फैलाई " अरे आप तो लखनऊ तक साथ चलनेवाली थीं। " 

वो मुस्कुरा उठी "आपने मेरा सपना तोड़ दिया। मैं भी किसी ऐसे ही स्वार्थी सपने के लिए सफर कर रही थी।"


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