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हरीश कंडवाल "मनखी "

Classics

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हरीश कंडवाल "मनखी "

Classics

घस्यारी

घस्यारी

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कांति चाची ने सुबह दो रोटी चाय के साथ मोड़कर खाई, और उसके बाद पलूड़ी (घास बॉधने वाली रस्सी), लाल साफा और दराती उठाकर उसको पळयूण ( सफेद पत्थर पर घिसकर धार देने लगी ) पर घिसने लगी। गॉव की अन्य देवरानी जिठानी और रिश्ते की सासू भी साथ में घास लेने के लिए निकल पड़ती हैं। रास्ते पर हॅसी मजाक और ठिठोली करते हुए वह जंगल जाती हैं, और घास काटने लगती है, गॉव की महिलाओं की यह आम दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कांति चाची खूब हंसोली ठिठोली करने वाली हैँ, वह कुछ ना कुछ स्वांग रचती और सबको हंसाती, कभी अपने सासू की नक़ल करती तों कभी गाँव की अन्य ताई सासू या चाची सासू की। उनके साथ वाली देवरानी जिठानी उनको नक़ल करने के लिए कहती। जंगल में कभी अलग अलग आवाज़ देकर सबको बुलाती, और हंसाती। कभी कांति चाची बीमारी में या इधर उधर जाने की वजह से जिस दिन घास लेने नहीं जाती उस दिन साथ वाले बड़े उदास हों जाते। कांति चाची का स्वभाव बहुत ही मृदुल और व्यवहार कुशल था, रास्ते का घर होने के कारण सब उधर से ही जाते, चाची, सबको बिठाकर चाय पिलाती, सबको खाना खिलाती। बिना बांटे खाये तो उनको चैैन ही नहीं आता। कांति चाची दिन भर काम पर लगी रहती। दो बेटी थी उनका विवाह कर लिया, चाचाजी मेहनत मजदूरी और खेती करते, इससे दोनों का गुजारा हो जाता। बेटियॉ कभी कभी मायके आ जाती और फिर अपने ससुराल चली जाती। कांति चाची सुखः दुख में सबके साथ खड़ी रहती, गॉव में कोई भी कार्य हो जैसे शादी- मुण्डन, सामूहिक पूजा, या अन्य कोई कार्यक्रम उसमें कांति चाची सबसे आगे आकर काम संभालती और अन्य को प्रोत्साहित करती। विवाह के अवसरों पर कांति चाची खूब मॉगल लगाती, और बेटियों के विवाह के अवसर पर दूल्हा पक्ष को शगुनाखर के रूप मांगलिक गाली देती जिससे हॅसी और मजाक का माहौल बना रहता। बानों के समय देवर ननद और समधीयों पर दौड़-दौड़कर हल्दी लगाती, खूब हॅसी मजाक करती रहती। शादी में उनके रहने पर खूब रौनक रहती। बड़े बूढ़े जवान सभी उनके साथ और वह सबके साथ हॅसी ठिठोली करती रहती। कांति चाची बरसात के समय सबके साथ खेतों में निराई गुड़ाई करती, वहॉ पर भी गीत गाती रहती, धान रोपाई के समय खूब मस्ती करती। उन्होने जीवन को बड़े ही अच्छे अंदाज में जिया, उनका मानना था कि जो प्रारब्ध में लिखा होगा उसको कोई मिटा नहीं सकता है, इसलिए जो पल मिल रहे हैं, उसको मस्ती के साथ जीओ। कांति चाची की जब नई नई शादी हुई तो शुरूवात में सामजस्य बिठाने में समस्या आयी। कांती चाची की सासू थोड़ा तेज स्वभाव की थीं, हर बात पर कांति चाची को झड़पती रहती थी, शुरूवात में कांति चाची को समस्या होती थी, लेकिन सासू दिल की अच्छी थी बस मुॅह की खराब थी, इसलिए कांति चाची अपनी सासू से बहस करनी छोड़ दी, धीरे धीरे बहु पुरानी होती गयी और सासू उम्रदराज। इसलिए अब वह एक दूसरे के सहारे बनते चले गये। कांति चाची ने कभी अपना फर्ज नहीं भूला, सुबह उठ जाती, उस समय आय का मुख्य साधन खेती और पशुपालन था, जिसके लिए सुबह जल्दी उठना और देर रात में सोना पहाड़ की महिलाओं की आम जिंदगी का हिस्सा था। कांति चाची सुबह चार बजे उठ जाती, उठकर चिमनी जलाकर पहले चक्की में गेहॅु और मंडुवा पीसती ताकि दो चार दिन के लिए आटा हो जाय। जैसे ही हल्का उजाला हुआ भैंस को बाहर निकालकर उसको पींडू और घास खिलाती, उजाला होते ही चाय बनाती और उसके बाद धान, झंगोरा जो भी है, वह कूटने में लग जाती। गॉव में उस समय हर घर नल हर घर जल नहीं था, गॉव के पानी के स्त्रोत में जाना वहॉ से ताजा पानी भरकर लाना और फिर घर आकर रोटी बनाना। खड़पात (झाड़ू लगाना) सासू कर देती थी, और गाय भैंस का दूध भी निकाल लेती थी जब तक जवान थी। उसके बाद कांति चाची घास के लिए निकल जाती, दिन में आकर खाना खाया और फिर उसके बाद गाय चुगाने चली जाती। सर्दियों में शाम को लकड़ी लेने जाती, घर आकर फिर घास अलग काटकर लाती। वहीं शाम को फिर खाना बनाना, कभी कभी देर रात में छांछ छोलना, और घी बनाना। इसके साथ ही दिन में समय नहीं मिलता तो रात को नहाती। दिन भर संघर्ष करती रहती। कांति चाची ने इन सब कामों को खूब आनंद के साथ किया। कांति चाची ने अपनी जवानी में दो धोती में पूरा साल काटा है, एक भीग जाती तो उसे उसी समय सुखाने के लिए रख देते। बरसात में चूल्हे के पास या कमरे में रस्सी टॉककर सूखाते कई बार तो भीगी धोती को वह चूल्हे के सामने खड़े होकर सुखाती। बहुओं को तों त्योहार के समय ही दाल चावल खाने को मिलता और गेंहू की रोटी भी। बाकि तों पलेउ, बाड़ी, झंगोरा, झूल्ली, चुलमंडी खाने को ही मिलता था, गेंहू की रोटी तों मेहमानों और घर के विशेष सदस्यों को दिया जाता। कुछ खड़ूस सास तों बहुओं को केवल पलेउ ही देती। दो वक्त तो पलेऊ खाने में कट जाते। जब घर में किसी का बच्चा होता तों उसके 10 दिन तक का ही परहेज रहता, उसके बाद वह काम पर लग जाती। उस जमाने की कुछ सासू तों सुलकीण ( प्रसव का एक माह की अवधि ) में भी चैन नहीं देती हैँ। हालांकि कांति चाची की सास इस मामले में भलमानस रही। कांति चाची एक दिन जंगल गयी हुई थी, पेड़ पर चढ़कर घास काट रही थी, उनके साथ वाले नीचे घास इकठ्ठा कर रहे थे, और सब हॅस रहे थे, होनी का शायद कुछ और ही मंजूर था, कांति चाची जिस टहनी पर चढ़ी हुई थी वह टूट गयी और कांति चाची धड़ाम से नीचे गिर गयी। कमर टूट गयी, चारपाई में लोग घर लेकर आये, दो महीने तक बिस्तरे में पड़ी रही, गॉव वालों ने खूब सेवा की, दो माह बाद कांति चाची अपनी लंबी यात्रा पर चली गयी। सोशल मीडिया में जब अनिता घस्यारियों की फोटो देख रही थी तो उनको कांति चाची की याद आ गयी। तब वह अपने बहुओं को कह रही थी आज हम लोग बहुत अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हो, आज सुबह अपने हिसाब से उठते हो, अच्छा खाते हो, अच्छा पहनते हो। संघर्ष क्या होता है, हमने अपने जीवन में देखा है, और इंसान क्या होता है, वही भी कांति चाची भले ही आज हमारे बीच नहीं है, किंतु उनकी यादें हमेशा हमारे जेहन में हैं, यह कहते हुए ऑखों से ऑसू टपकने लगे। हरीश कंडवाल मनखी की कलम से।


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