जीवन का उठता तूफान
जीवन का उठता तूफान
रोहिणी ने अपने सहकर्मी वैभव को जाते हुए कहा की आज जो काम लंबित रह गए हैँ उनकी सूची बनाकर मुझे व्हाट्सप्प कर देना। रोहिणी ने अपनी गाड़ी निकाली और ऑफिस से घर के लिए निकल पड़ी। आगे रास्ते पर सब्जी मंड़ी हैँ, वहां से सब्जी लेने के लिए रुकी। सब्जी मंडी पर क्या सब्जी लूँ, यह सोच विचार करने लगती हैँ, क्योंकि घर में सब अलग अलग सब्जी पसंद हैँ, कोई बीन्स नहीं खाता, किसी को भिंडी पसंद नहीं, लौकी तोरी टिंडा करेला तों सालों से नहीं बनी होंगे, गोभी, शिमला मिर्च या पालक वह भी पनीर के साथ ही खाना पसंद करते हैँ। सब्जी मंडी में सब्जी के भाव और ज्यादा समस्या पैदा कर देते।
बच्चों को बचपन में जैसी आदत डाल दी वह वैसे ही बनजाते हैँ, बचपन में लाड़ प्यार में उनकी पसंद पूछकर खाना बनाना एक समय बाद वह मुश्किल बन जाता हैँ। अब रोहिणी के साथ भी ऐसा ही होने लगा हैँ।
रोहिणी का एक बेटा और बेटी हैँ, दोनों अब किशोरावस्था में पहुँच गए हैँ। दोनों अब हर बात पर तर्क और वितर्क करने लगे हैँ, कई बार रोहिणी उनके ऊपर बिना बात की भी झल्ला पड़ती हैँ। आज भी कोई सब्जी समझ नहीं आई तों सोचा आज बाहर से ही कुछ मंगवा लेते हैँ।
रोहिणी का पति बैंक में मैनेजर हैँ, हर तीन साल में पोस्टिंग इधर उधर होने के कारण रोहिणी ने देहरादून में रहना पसंद किया, यँहा अच्छी नौकरी भी मिल गई थी, रोहिणी आत्मनिर्भर बनी रहना चाहती हैँ, इसलिए पति सुमेश के कहने पर भी उसने नौकरी करना नहीं छोड़ी। घर में काम करने लिए एक बाई रखी हुई हैँ। सुमेश का कहना था की अब बच्चों की परवरिश पर ध्यान देना जरूरी हैँ।
रोहिणी का बेटा यश 11वी क्लास में पढ़ रहा हैँ, और बेटी यशस्वी अभी 10 में हैँ। दोनों ने जिद करके स्मार्ट फोन ले लिए हैँ, अब वह पढ़ाई पर ध्यान कम और फोन में ज्यादा व्यस्त रहने लगे। शुरुआत में अपने काम के चक्कर में रोहिणी ने अपना फोन बच्चो को दिया, ताकि वह परेशान ना करें, धीरे धीरे दोनों बच्चों को लत लग गई, अब वह बिना फोन के नहीं रह पाते, अब पढ़ाई कम करते, बाहर नहीं निकलते, कोई रिश्तेदार आये तों उनसे नहीं मिलते, उनकी इस आदत से रोहिणी परेशान होने लगी और झल्लाने लगी।
यश किशोरवस्था में पहुँच चुका हैँ, अब वह किसी की डांट बर्दास्त नहीं कर पाता हैँ, यह उम्र होती ही ऐसी हैँ, जिसमें अंदर एक तूफान और बाहर शरीर में परिवर्तन चलता रहता हैँ, भावनाये जोश में होती हैँ, और हर स्वभाव और मन के भाव के विपरीत जो भी बात करता हैँ या रोकता टोकता हैँ, वह दुश्मन लगने लगता हैँ। माँ बाप दादा दादी जो भी भले के लिए समझाये वह बुरे लगते हैँ, वहीँ दूसरी ओर हम उम्र दोस्त और विशेषकर विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ने लगता हैँ।
रोहिणी बच्चों को डांटती रहती, उसे डर लगता की कहीं बच्चों के संगत में आकर यश गलत दिशा में नहीं चला जाये, उसे यह चिंता रहती, इसलिए वह इस बात का जिक्र हमेशा सुमेश से करती। रोहिणी का डर धीरे धीरे शक में बदलने लगा, यश और यशस्वी कुछ देर लेट हों जाती तों उसे शक होने लगता की यह कुछ गलत तों नहीं कर रहे हैँ। रोहिणी हर बात पर जासूसी करने लगी, जिससे घर का वातावरण असंतुलित होने लगा। अब दोनों बच्चे माँ से हर बात कहने और बताने से डरने लगे।
रोहिणी भी अपने बदलते स्वभाव से परेशान थी, एक तरफ ऑफिस की टेंशन दूसरी तरफ घर में बिगड़ता माहौल। सुमेश जब घर आया तों बच्चे डरे सहमे से नजर आ रहें थे। रोहिणी का व्यवहार भी अलग सा लग रहा था। एक दो दिन घर में रहा तों उसको समझने की कोशिश करने लगा
सुमेश ने सप्ताह के अंत में दो दिन के लिए बाहर जाने का कार्यक्रम बनाया ताकि माहौल परिवर्तन हों सके। सुमेश ने कहा की जीवन को कठिनाई से नहीं जीना हैँ बल्कि आसानी से जीना सीखना जरूरी हैँ। रोहिणी किशोरावस्था के दहलीज पर जब युवा होते हैँ, तब माता पिता को चौकीदार या सुरक्षा गार्ड की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह बना रहना जरूरी हैँ, चिड़िया भी अपने बच्चों को थोड़ा खुला छोड़ती हैँ, अपने पंखो के नीचे दबाकर नहीं रखती ताकि वह उड़ना सीख सके।
वहीँ यश और यशस्वी को सुमेश ने कहा की आप जानते हों की बाइक या स्कूटी पर ब्रेक क्यों लगाया जाता हैँ, यश ने कहा कि पापा गाड़ी रोकने के लिए लगाया जाता हैँ। यशस्वी ने भी कहा कि पापा यश सही कह रहा हैँ, तब सुमेश ने समझाया कि गाड़ी में ब्रेक इसलिए नहीं लगाये जाते कि वह रोकने के लिए हैँ, बल्कि इसलिए लगाते हैँ कि जब हम गाड़ी चला रहें होते हैँ तों हम अपनी ग़ाड़ी कि रेस इतनी तेज कर सकतें हैँ कि हमको किसी समय रुकना पड़े तों ब्रेक का इस्तेमाल कर सकें। माँ बाप भी जीवन में गाड़ी के ब्रेक कि तरह होते हैँ, जब आवश्यकता पड़ती हैँ तब हम उनका साथ और आशीर्वाद मिलता हैँ, माँ बाप हमेशा गाड़ी के ब्रेक नहीं होते बल्कि रेस भी होते हैँ, जो हमेशा अपने बच्चों को खुद से आगे बढ़ना देखना चाहते हैँ, वह बच्चों पर नियंत्रण नहीं करना चाहते बल्कि उनको सही दिशा देना होता हैँ, आप लोगों कि जो उम्र हैँ वह सामने बहती नदी कि तरह हैँ, यदि वह सही तरीके से बह रही हैँ तों अपने चारो ओर हरियाली और सुंदरता को बनाये रखती हैँ, वहीँ वह जब उफान पर आती हैँ तों अपने ही किनारों को नष्ट कर देती हैँ, उसी प्रकार आपकी यह उम्र भी हैँ, इसमें आपके लिए माता पिता और परिवार सबसे बड़े सहयोगी बनते हैँ, आपको बाहरी दुनिया दोस्त सब अच्छे लगते हैँ, किन्तु वह क्षणिक होते हैँ जबकि परिवार आपका साथ हमेशा देता हैँ।
यह सब बातें करते करते वह चाय पी रहें थे, आज आपकी माँ सिर्फ माँ कि भूमिका नहीं निभाती बल्कि एक पिता कि भूमिका भी निभा रही हैँ, क्योंकि मैं तों आपका साथ महीने और हप्ते में कभी कभी मिल पाता हैँ। माँ ऑफिस कि जिम्मेदारी के साथ घर कि आपकी, मेरे माँ पिताजी कि और अन्य रिश्तो को भी बखूबी निभाती हैँ, साथ ही वह आपको सही दिशा देना चाहती हैँ, क्योंकि आपका भविष्य बन सकें। हाँ आपको सुरक्षित करने के लिए खुद को ही असुरक्षित करते हुए मानसिक तौर पर कमजोर बन गई और उनक़ी सोच शक वाली बनती चली गई।
आपको फोन, एवं अन्य सुविधाएं आपके हित के लिए दी जाती हैँ, किंतु उनको आपको कमजोरी नही बनानी हैँ। सुमेश के शब्द और भाव स्पष्ट थे किन्तु शालीनता उससे ज्यादा थी।
रोहिणी और यश एवं यशस्वी को सुमेश के द्वारा समझायी गई बातें बेहतरीन ढंग से आ गई थी, आज परिवार क़ी अहमियत दिखाई दे रही थी, दोनों बच्चों को भी अहसास हों गया था क़ी माँ बाप दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त होते हैँ, उन्हें बस समझने क़ी आवश्यकता हैँ। अगले दिन सब हँसते हुए अपने घर देहरादून लौट कर आ गए।
हरीश कंडवाल "मनखी" क़ी कलम से
