"अधूरी उड़ान"
"अधूरी उड़ान"
इण्टर कॉलेज में 11 वीं के छात्र अपने वरिष्ठ साथी 12वीं के विद्यार्थियों को फेयरवेल दे रहे थे। सभी उनके अच्छे नम्बरों से पास होने की शुभकामनाये दे रहे थे। वहीं सभी अध्यापकों को ही नहीं बल्कि सारे विद्यालय को विश्वास था कि इस साल प्रतीक और सोनम सबसे अच्छे नम्बर लेकर आयेगें, और विद्यालय का नाम रोशन करेंगे। दोनों छात्र बहुत प्रतिभाशाली थे, दोनों हर साल प्रथम द्वितीय आते थे। इस बार भी दोनों ने खूब जमकर मेहनत की है। सोनम ने जहॉ डॉक्टर बनने का सपना देखा है, वहीं प्रतीक भी इंजीनीयर बनना चाहता है। प्रतीक के पिताजी की गॉव में ही एक दुकान है, वहीं सोनम के पिताजी बाहर कम्पनी में काम करते हैं। सोनम अभी सबसे मिल रही है, वहीं प्रतीक भी अपने दोस्तों से मिल रहा है। बोर्ड परीक्षा के बाद फिर आगे तैयारी करनी है, इसलिए प्रतीक सीधे देहरादून शहर में जाकर कोचिंग करना चाहता है, वहीं सोनम अपने पिताजी के साथ दिल्ली जाने की तैयारी में है। आजकल की युवा पीढ़ी कुछ करना चाहती है। किशोरावस्था का तूफान बड़ा अजीब होता है, इसमें अपने मॉ बाप, गुरूजन सब दुश्मन लगते हैं, वहीं अपने साथी और हम उम्र एवं विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण अच्छा लगता है। प्रतीक और सोनम भी इसी उम्र से गुजर रहे हैं। एक गलत संगत उनके भविष्य को तबाह कर सकती है, इसलिए सोनम और प्रतीक की मॉ गॉव में रहकर भी उन पर निगाह रखती हैं।
इधर प्रतीक के बोर्ड की परीक्षा समाप्त हुई और अगले दिन वह देहरादून आ गया, यहॉ वह अपने चचेरे भाई जो कि परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, उसके साथ रहने आ गया। प्रतीक युवा था, देहरादून को देखना और समझना चाहता था, कुछ दिन मौज मस्ती की, और उसके बाद वह अपनी पढ़ाई में लग गया। जेई मेन्स की परीक्षा दी और अच्छी रैंक प्राप्त हो गयी। और उसको कॉलेज मिल गया। हॉस्टल में रहने की व्यवस्था हो गयी। प्रतीक के पिताजी ने अभी तक की जमा पूॅजी बेटे की कॉलेज में पढाई पर लगा दी, उनको मानना था कि बेटा अगर लायक बन गया तो इससे अच्छी जमा पूॅजी और क्या हो सकती है।
उधर सोनम ने भी नीट की परीक्षा पास कर ली और नर्सिग कॉलेज में दाखिला ले लिया। इण्टर के बाद सोनम और प्रतीक दोनों अलग अलग दिशा में चले गये तो वार्ता का सिलसिला टूट गया। सोनम भी छात्रावास में रहने लगी, उसके साथ दो लड़कियॉ उत्तराखण्ड की रहने वाली थी मिल गयी, उनमें काफी अच्छी मित्रता हो गयी। समय का पहिया घूमता रहा और सोनम की पढ़ाई चलती रही। अब गॉव आना कम हो गया, मॉ को फोन करती रहती, और हॉस्टल की बातें बताती रहती। मॉ घर से सख्त हिदायत देती कहती बेटा अपना ध्यान रखना, पराये जगह पर हो, वहॉ पर अपनी सावधानी और अपना ख्याल रखने की जिम्मेदारी स्वयं की होती है।
प्रतीक के माता पिता दोनों खूब मेहनत कर रहे हैं, इंजीनियरिंग की पढाई की फीस के साथ-साथ अन्य खर्चे भी होते हैं। वह चाहते हैं कि उनके बेटे प्रतीक को कोई परेशानी ना हो, इसलिए अपने खर्चों में कटौति कर अधिक से अधिक बचत की जा सके। प्रतीक के स्कूल जहॉ से सोनम और उसने इण्टर किया था वहॉ पर भी उनका उदाहरण दिया जाता है। प्रतीक पहले दो सेमेस्टर में खूब मेहनत करता है, वह कुछ अच्छे करने की सोचता रहता है, माता पिता के सपनों को साकार करना चाहता है। वह सोनम के साथ उसका एकतरफा प्यार था, कभी इजहार नहीं किया। उसका सोचना था कि कुछ बन जाउंगा तो तब सोनम से बात करूंगा। वक्त का पहिया घूमता रहता है, जीवन में अनेकों उतार चढाव आते रहते हैं, झंझावतों से निकलने वाला और खुद को अनुशासित रखने वाला ही किशोरावस्था की तूफानों से अपनी जीवन नैया को पार लगाने में सफल होता है। सोनम और प्रतीक दोनों ही किशोरावस्था के झंझावतों में झूल रह हैं। सोनम का भी बीएससी नर्सिग का पहला साल निकल गया है। वह भी खूब मेहनत कर रही है। उसका उद्देश्य है कि वह नर्सिग अधिकारी के पद पर एम्स में अपना कैरियर बनाये, और वह अपने कैरियर के प्रति बहुत सजग भी थी।
ईधर दूसरे साल में प्रतीक के नये साथी अमन, अजीत, बन गये, शुरूवात में तो प्रतीक को सबके साथ घुलने मिलने में वक्त लग गया, किंतु किशोरावस्था की उम्र का जो पड़ाव होता है, वह अरबी के पत्तों के ऊपर के पानी के जैसा होता है, वह कहीं भी ढलक जाता है, यदि उसको ठहराव और सही दिशा नहीं मिलती है, तो वह राह भटक जाता है, इसी तरह से प्रतीक को भी सही राह नहीं मिल पायी और रास्ता भटक गया। प्रतीक अपने दोस्तों के साथ पहले तो बाहर जाना सीख गया, देर रात हॉस्टल के कमरों में पार्टीयों में शामिल रहता, और मौज मस्ती करने में उसे आनन्द आने लगा। रोक टोक करने वाला कोई नहीं था, मनमर्जी चलने लगी। कभी हॉस्टल के वार्डन रोकने का प्रयास करते तो दो चार दिन सब ठीक रहते फिर किसी ना किसी के जन्म दिन की पार्टी का बहाना होने लगा।
दो साल तक खाने की पार्टी चलती रही, सब सामान्य था। लेकिन दो साल बाद प्रतीक और उसके दोस्तों का पार्टी करने का तरीके बदलने लग गया। अब धीरे धीरे व्यसन शुरू हो गये, कुछ दिनों में यह उनकी आदत में शुमार हो गया। अब प्रतीक की संगत बदल चुकी है, अमन और अजीत नये दोस्त जो कि घर से अमीर हैं, उनके लिए पैसे का कोई महत्व नहीं है, वह जिंदगी को अवारगी और मस्ती में जीने का आदर्श समझते हैं। प्रतीक के नये दोस्त उसे ’’कूल’’ नाम पर गलत राह दिखाने लगते हैं। उनका कहना और मानना है कि ’’ जिंदगी का मजा लेना है तो थोड़ा सूखा नशा आजमा के देख, इसमें किसी को पता भी नहीं चलता है, और जीवन जीने का अलग ही मजा आता है, साथ ही पढ़ने में ध्यान लगता है’’। शुरूवात में तो प्रतीक ने कई बार मना किया, पर बार-बार जिद और दोस्तों के बीच बैकवर्ड थींकंग की मजाक उड़ाने से वह डगमगा गया। उसको भी लगा कि एक बार आजमा के देख लेता हॅूं कैसा लगता है, अच्छा नहीं होगा तो छोड़ दूंगा कोई क्या जबरदस्ती कर लेगा घ्।
दोस्तों के कहने पर प्रतीक सूखे नशे के दल दल में फॅसता चला गया। प़ढा़ई से मन हटने लगा, खेल कूद छूट गया, घर जाना छोड़ दिया और माता पिता और गुरूजनों से झूठ बोलने लगा। घर से झूठ बोलकर मॉ बाप से अधिक पैसें मॉगने लग गया। क्योंकि अब नशे की लत पड़ चुकी थी, उसको हर समय कुछ ना कुछ सूखा नशा करने के लिए चाहिए। इसके चलते उसकी ऑखों की चमक कम होती चली गयी, और सपनों की उड़ान कम होने लगी। उसको अकेला रहना ही अच्छा लगने लगा, कभी गॉव चला भी जाता तो दिन भर वह नशे में रहता और एक कमरे में बैठे रहता। मॉ बाप परेशान हो गये, जिस बेटे के लिए सारी जमा पूॅजी लगायी आज वह उनके सामने बरबाद होने लगा। मॉ बाप कुछ बोलते तो उनको धमकाने लगता और आत्म हत्या करने की धमकी देता। इकलौता बेटा है, बस यह जिंदा रहे इसलिए वह ज्यादा कुछ नहीं कहते। मॉ बाप के सपने सब बिखर गये जिस प्रतीक का नाम सब गर्व से लेते थे आज वह पूरे गॉव और स्कूल मेंं घृणा का पात्र बन गया है। हर कोई प्रतीक के मॉ बाप के भाग्य को कोस रहा है, जो कभी सभी के लिए प्रेरिणा स्त्रोत कहलाता था आज वह सबकी दृष्टि में नालायक औलादों में गिना जाने लग गया।
प्रतीक की मॉ को सबसे ज्यादा सदमा लगा, मॉ के अरमान पिताजी के अरमानों से बड़े होते हैं, मॉ की ममता बड़ी ही दयालू होती है, पिताजी कहते थे कि शायद हमारे भाग्य में यह दिन देखने को थे, इसिलए हमने इसकों इतना लाड़ प्यार दिया, जिसका नतीजा आज हमें भुगतना पड़ रहा है। जो भी उनकी दुकान में आता वह बेटे की बात पूछता, जो पिता कभी गर्व से कहता था कि उनका बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है, आज उसके बारे में बताने में उनको शर्म महसूस हो रही थी। लेकिन प्रतीक नशे की लत में इतना डूब गया कि उसको इन सब की कोई परवाह नहीं थी।
एक दिन सोनम अपनी स्वास्थ्य जागरूकता अभियान के तहत नशे को ना और जिंदगी को हॉ के नुक्कड़ नाटक के लिए प्रतीक के कॉलेज में आयी हुई थी। इंजीनियरिंग के हॉल में नर्सिग के बच्चे नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सूखे नशे के पडने वाले प्रभाव को दिखा रहे थे, नुक्कड नाटक के माध्मय से सोनम प्रेमिका बनी हुई थी और दूसरी लड़की उसकी प्रेमी। जो लड़की प्रेमी की भूमिका अदा कर रहा था, वह ऐसे लग रहा था मानों प्रतीक के साथ घटी घटनायें हों, सोनम अपने प्रेमी को शादी करने के लिए इसलिए मना कर देती है कि वह सूखा नशा करता है। वह जब खुद को नहीं संभाल पा रहा है, अपनी मॉ बाप की नहीं सुन रहा है, जिन मॉ बापों ने उसके लिए इतना कुछ त्याग किया उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाया है, ऐसे लड़के के साथ कैसे वह अपनी जिंदगी को दॉव पर लगा सकता है। सोनम ने कहा कि ’’ नशा शुरूवात में दोस्त लगता है, लेकिन अंत में जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है’’ अपने परिवार और अपनों को खे देता है’’। सोनम और उसके इस नुक्कड़ नाटक से प्रभावित होकर सबने खूब तालियॉ बजायी। सोनम को नहीं मालूम था कि प्रतीक जो कि उसका सहपाठी था वह भी इसी नशे के गिरप्त में है, और वह भी आज अपनी जिंदगी को नशे में बरबाद कर रहा है।
सोनम को देखते ही प्रतीक को नशे मेंं ही अपने पुराने दिन याद आने लगे, उसको लगने लगा कि कहीं सोनम भी उसको मना नहीं कर दे, उसको लगने लगा कि उसने वास्तव में गलत राह चुन ली। उसने खुद से इरादा किया कि वह अब इसका त्याग करेगा। यह नुक्कड़ नाटक उसके दिल को छू गया, खासकर उसकी प्रेमिका सोनम का अभिनय। उसको समझ आने लगा कि वह खुद को और अपने परिवार को साथ में सोनम को भी खो रहा है। उसने हिम्मत जुटाई और अगले दिन अपने गॉव आकर अपने माता पिता को सब सच बता दिया। घरवालांं ने डॉटने के बजाय उसका साथ दिया। उसको चिकित्सालय में भर्ती कराया, और उसकी कांउसिंलिंग करवायी। इसी दौरान सोनम की क्लीनीकल पोस्टिंग भी उसी चिकित्सालय में लगी जहॉ प्रतीक का इलाज चल रहा था। अचानक प्रतीक को देखकर सोनम हकबक रह गयी और आते ही बोली प्रतीक तुमने अपना यह क्या हाल बना रखा है, तुम्हें क्या हो गया है। प्रतीक ने कहा कि बस अब तो थोड़ा ठीक हो गया हॅू, मैनें अपने को बहुत बड़ी सजा देने जा रहा था, और गलत संगत में पड़ने से जिंदगी को बरबाद कर रहा था। तुम्हारे कारण मेरी जिंदगी बच गयी आज जीवन को एक नई दिशा तुम्हारे कारण मिली है। उसने सोनम को संक्षेप में सब बता दिया और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से वह सोनम के अभिनय से प्रेरित होकर उसने नशे को ना कहना कि हिम्मत जुटा पाया। सोनम यह सुनकर हतप्रभ रह गयी। उसने कहा कि सोनम तुम्हारे उस दिन के अभिनय ने मुझे नई जिंदगी दी है, अब मैनें धीरे धीरे नशे को ’ना’ कहना सीख लिया, अब मैं फिर से मैदान में लौट रहा हूॅ। मुझे जिंदगी में एक नई उड़ान मिल गयी है। इस नई उड़ान पर पंख लगाने के लिए उसने सोनम का धन्यवाद किया। सेनम यह सब जानकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हुए उसको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, और साथ में जाते हुए अपना फोन नम्बर दे जाती है।
हरी’’नई उड़ान’’
इण्टर कॉलेज में 11 वीं के छात्र अपने वरिष्ठ साथी 12वीं के विद्यार्थियों को फेयरवेल दे रहे थे। सभी उनके अच्छे नम्बरों से पास होने की शुभकामनाये दे रहे थे। वहीं सभी अध्यापकों को ही नहीं बल्कि सारे विद्यालय को विश्वास था कि इस साल प्रतीक और सोनम सबसे अच्छे नम्बर लेकर आयेगें, और विद्यालय का नाम रोशन करेंगे। दोनों छात्र बहुत प्रतिभाशाली थे, दोनों हर साल प्रथम द्वितीय आते थे। इस बार भी दोनों ने खूब जमकर मेहनत की है। सोनम ने जहॉ डॉक्टर बनने का सपना देखा है, वहीं प्रतीक भी इंजीनीयर बनना चाहता है। प्रतीक के पिताजी की गॉव में ही एक दुकान है, वहीं सोनम के पिताजी बाहर कम्पनी में काम करते हैं। सोनम अभी सबसे मिल रही है, वहीं प्रतीक भी अपने दोस्तों से मिल रहा है। बोर्ड परीक्षा के बाद फिर आगे तैयारी करनी है, इसलिए प्रतीक सीधे देहरादून शहर में जाकर कोचिंग करना चाहता है, वहीं सोनम अपने पिताजी के साथ दिल्ली जाने की तैयारी में है। आजकल की युवा पीढ़ी कुछ करना चाहती है। किशोरावस्था का तूफान बड़ा अजीब होता है, इसमें अपने मॉ बाप, गुरूजन सब दुश्मन लगते हैं, वहीं अपने साथी और हम उम्र एवं विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण अच्छा लगता है। प्रतीक और सोनम भी इसी उम्र से गुजर रहे हैं। एक गलत संगत उनके भविष्य को तबाह कर सकती है, इसलिए सोनम और प्रतीक की मॉ गॉव में रहकर भी उन पर निगाह रखती हैं।
इधर प्रतीक के बोर्ड की परीक्षा समाप्त हुई और अगले दिन वह देहरादून आ गया, यहॉ वह अपने चचेरे भाई जो कि परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, उसके साथ रहने आ गया। प्रतीक युवा था, देहरादून को देखना और समझना चाहता था, कुछ दिन मौज मस्ती की, और उसके बाद वह अपनी पढ़ाई में लग गया। जेई मेन्स की परीक्षा दी और अच्छी रैंक प्राप्त हो गयी। और उसको कॉलेज मिल गया। हॉस्टल में रहने की व्यवस्था हो गयी। प्रतीक के पिताजी ने अभी तक की जमा पूॅजी बेटे की कॉलेज में पढाई पर लगा दी, उनको मानना था कि बेटा अगर लायक बन गया तो इससे अच्छी जमा पूॅजी और क्या हो सकती है।
उधर सोनम ने भी नीट की परीक्षा पास कर ली और नर्सिग कॉलेज में दाखिला ले लिया। इण्टर के बाद सोनम और प्रतीक दोनों अलग अलग दिशा में चले गये तो वार्ता का सिलसिला टूट गया। सोनम भी छात्रावास में रहने लगी, उसके साथ दो लड़कियॉ उत्तराखण्ड की रहने वाली थी मिल गयी, उनमें काफी अच्छी मित्रता हो गयी। समय का पहिया घूमता रहा और सोनम की पढ़ाई चलती रही। अब गॉव आना कम हो गया, मॉ को फोन करती रहती, और हॉस्टल की बातें बताती रहती। मॉ घर से सख्त हिदायत देती कहती बेटा अपना ध्यान रखना, पराये जगह पर हो, वहॉ पर अपनी सावधानी और अपना ख्याल रखने की जिम्मेदारी स्वयं की होती है।
प्रतीक के माता पिता दोनों खूब मेहनत कर रहे हैं, इंजीनियरिंग की पढाई की फीस के साथ-साथ अन्य खर्चे भी होते हैं। वह चाहते हैं कि उनके बेटे प्रतीक को कोई परेशानी ना हो, इसलिए अपने खर्चों में कटौति कर अधिक से अधिक बचत की जा सके। प्रतीक के स्कूल जहॉ से सोनम और उसने इण्टर किया था वहॉ पर भी उनका उदाहरण दिया जाता है। प्रतीक पहले दो सेमेस्टर में खूब मेहनत करता है, वह कुछ अच्छे करने की सोचता रहता है, माता पिता के सपनों को साकार करना चाहता है। वह सोनम के साथ उसका एकतरफा प्यार था, कभी इजहार नहीं किया। उसका सोचना था कि कुछ बन जाउंगा तो तब सोनम से बात करूंगा। वक्त का पहिया घूमता रहता है, जीवन में अनेकों उतार चढाव आते रहते हैं, झंझावतों से निकलने वाला और खुद को अनुशासित रखने वाला ही किशोरावस्था की तूफानों से अपनी जीवन नैया को पार लगाने में सफल होता है। सोनम और प्रतीक दोनों ही किशोरावस्था के झंझावतों में झूल रह हैं। सोनम का भी बीएससी नर्सिग का पहला साल निकल गया है। वह भी खूब मेहनत कर रही है। उसका उद्देश्य है कि वह नर्सिग अधिकारी के पद पर एम्स में अपना कैरियर बनाये, और वह अपने कैरियर के प्रति बहुत सजग भी थी।
ईधर दूसरे साल में प्रतीक के नये साथी अमन, अजीत, बन गये, शुरूवात में तो प्रतीक को सबके साथ घुलने मिलने में वक्त लग गया, किंतु किशोरावस्था की उम्र का जो पड़ाव होता है, वह अरबी के पत्तों के ऊपर के पानी के जैसा होता है, वह कहीं भी ढलक जाता है, यदि उसको ठहराव और सही दिशा नहीं मिलती है, तो वह राह भटक जाता है, इसी तरह से प्रतीक को भी सही राह नहीं मिल पायी और रास्ता भटक गया। प्रतीक अपने दोस्तों के साथ पहले तो बाहर जाना सीख गया, देर रात हॉस्टल के कमरों में पार्टीयों में शामिल रहता, और मौज मस्ती करने में उसे आनन्द आने लगा। रोक टोक करने वाला कोई नहीं था, मनमर्जी चलने लगी। कभी हॉस्टल के वार्डन रोकने का प्रयास करते तो दो चार दिन सब ठीक रहते फिर किसी ना किसी के जन्म दिन की पार्टी का बहाना होने लगा।
दो साल तक खाने की पार्टी चलती रही, सब सामान्य था। लेकिन दो साल बाद प्रतीक और उसके दोस्तों का पार्टी करने का तरीके बदलने लग गया। अब धीरे धीरे व्यसन शुरू हो गये, कुछ दिनों में यह उनकी आदत में शुमार हो गया। अब प्रतीक की संगत बदल चुकी है, अमन और अजीत नये दोस्त जो कि घर से अमीर हैं, उनके लिए पैसे का कोई महत्व नहीं है, वह जिंदगी को अवारगी और मस्ती में जीने का आदर्श समझते हैं। प्रतीक के नये दोस्त उसे ’’कूल’’ नाम पर गलत राह दिखाने लगते हैं। उनका कहना और मानना है कि ’’ जिंदगी का मजा लेना है तो थोड़ा सूखा नशा आजमा के देख, इसमें किसी को पता भी नहीं चलता है, और जीवन जीने का अलग ही मजा आता है, साथ ही पढ़ने में ध्यान लगता है’’। शुरूवात में तो प्रतीक ने कई बार मना किया, पर बार-बार जिद और दोस्तों के बीच बैकवर्ड थींकंग की मजाक उड़ाने से वह डगमगा गया। उसको भी लगा कि एक बार आजमा के देख लेता हॅूं कैसा लगता है, अच्छा नहीं होगा तो छोड़ दूंगा कोई क्या जबरदस्ती कर लेगा घ्।
दोस्तों के कहने पर प्रतीक सूखे नशे के दल दल में फॅसता चला गया। प़ढा़ई से मन हटने लगा, खेल कूद छूट गया, घर जाना छोड़ दिया और माता पिता और गुरूजनों से झूठ बोलने लगा। घर से झूठ बोलकर मॉ बाप से अधिक पैसें मॉगने लग गया। क्योंकि अब नशे की लत पड़ चुकी थी, उसको हर समय कुछ ना कुछ सूखा नशा करने के लिए चाहिए। इसके चलते उसकी ऑखों की चमक कम होती चली गयी, और सपनों की उड़ान कम होने लगी। उसको अकेला रहना ही अच्छा लगने लगा, कभी गॉव चला भी जाता तो दिन भर वह नशे में रहता और एक कमरे में बैठे रहता। मॉ बाप परेशान हो गये, जिस बेटे के लिए सारी जमा पूॅजी लगायी आज वह उनके सामने बरबाद होने लगा। मॉ बाप कुछ बोलते तो उनको धमकाने लगता और आत्म हत्या करने की धमकी देता। इकलौता बेटा है, बस यह जिंदा रहे इसलिए वह ज्यादा कुछ नहीं कहते। मॉ बाप के सपने सब बिखर गये जिस प्रतीक का नाम सब गर्व से लेते थे आज वह पूरे गॉव और स्कूल मेंं घृणा का पात्र बन गया है। हर कोई प्रतीक के मॉ बाप के भाग्य को कोस रहा है, जो कभी सभी के लिए प्रेरिणा स्त्रोत कहलाता था आज वह सबकी दृष्टि में नालायक औलादों में गिना जाने लग गया।
प्रतीक की मॉ को सबसे ज्यादा सदमा लगा, मॉ के अरमान पिताजी के अरमानों से बड़े होते हैं, मॉ की ममता बड़ी ही दयालू होती है, पिताजी कहते थे कि शायद हमारे भाग्य में यह दिन देखने को थे, इसिलए हमने इसकों इतना लाड़ प्यार दिया, जिसका नतीजा आज हमें भुगतना पड़ रहा है। जो भी उनकी दुकान में आता वह बेटे की बात पूछता, जो पिता कभी गर्व से कहता था कि उनका बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है, आज उसके बारे में बताने में उनको शर्म महसूस हो रही थी। लेकिन प्रतीक नशे की लत में इतना डूब गया कि उसको इन सब की कोई परवाह नहीं थी।
एक दिन सोनम अपनी स्वास्थ्य जागरूकता अभियान के तहत नशे को ना और जिंदगी को हॉ के नुक्कड़ नाटक के लिए प्रतीक के कॉलेज में आयी हुई थी। इंजीनियरिंग के हॉल में नर्सिग के बच्चे नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सूखे नशे के पडने वाले प्रभाव को दिखा रहे थे, नुक्कड नाटक के माध्मय से सोनम प्रेमिका बनी हुई थी और दूसरी लड़की उसकी प्रेमी। जो लड़की प्रेमी की भूमिका अदा कर रहा था, वह ऐसे लग रहा था मानों प्रतीक के साथ घटी घटनायें हों, सोनम अपने प्रेमी को शादी करने के लिए इसलिए मना कर देती है कि वह सूखा नशा करता है। वह जब खुद को नहीं संभाल पा रहा है, अपनी मॉ बाप की नहीं सुन रहा है, जिन मॉ बापों ने उसके लिए इतना कुछ त्याग किया उनकी भावनाओं को नहीं समझ पाया है, ऐसे लड़के के साथ कैसे वह अपनी जिंदगी को दॉव पर लगा सकता है। सोनम ने कहा कि ’’ नशा शुरूवात में दोस्त लगता है, लेकिन अंत में जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है’’ अपने परिवार और अपनों को खे देता है’’। सोनम और उसके इस नुक्कड़ नाटक से प्रभावित होकर सबने खूब तालियॉ बजायी। सोनम को नहीं मालूम था कि प्रतीक जो कि उसका सहपाठी था वह भी इसी नशे के गिरप्त में है, और वह भी आज अपनी जिंदगी को नशे में बरबाद कर रहा है।
सोनम को देखते ही प्रतीक को नशे मेंं ही अपने पुराने दिन याद आने लगे, उसको लगने लगा कि कहीं सोनम भी उसको मना नहीं कर दे, उसको लगने लगा कि उसने वास्तव में गलत राह चुन ली। उसने खुद से इरादा किया कि वह अब इसका त्याग करेगा। यह नुक्कड़ नाटक उसके दिल को छू गया, खासकर उसकी प्रेमिका सोनम का अभिनय। उसको समझ आने लगा कि वह खुद को और अपने परिवार को साथ में सोनम को भी खो रहा है। उसने हिम्मत जुटाई और अगले दिन अपने गॉव आकर अपने माता पिता को सब सच बता दिया। घरवालांं ने डॉटने के बजाय उसका साथ दिया। उसको चिकित्सालय में भर्ती कराया, और उसकी कांउसिंलिंग करवायी। इसी दौरान सोनम की क्लीनीकल पोस्टिंग भी उसी चिकित्सालय में लगी जहॉ प्रतीक का इलाज चल रहा था। अचानक प्रतीक को देखकर सोनम हकबक रह गयी और आते ही बोली प्रतीक तुमने अपना यह क्या हाल बना रखा है, तुम्हें क्या हो गया है। प्रतीक ने कहा कि बस अब तो थोड़ा ठीक हो गया हॅू, मैनें अपने को बहुत बड़ी सजा देने जा रहा था, और गलत संगत में पड़ने से जिंदगी को बरबाद कर रहा था। तुम्हारे कारण मेरी जिंदगी बच गयी आज जीवन को एक नई दिशा तुम्हारे कारण मिली है। उसने सोनम को संक्षेप में सब बता दिया और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से वह सोनम के अभिनय से प्रेरित होकर उसने नशे को ना कहना कि हिम्मत जुटा पाया। सोनम यह सुनकर हतप्रभ रह गयी। उसने कहा कि सोनम तुम्हारे उस दिन के अभिनय ने मुझे नई जिंदगी दी है, अब मैनें धीरे धीरे नशे को ’ना’ कहना सीख लिया, अब मैं फिर से मैदान में लौट रहा हूॅ। मुझे जिंदगी में एक नई उड़ान मिल गयी है। इस नई उड़ान पर पंख लगाने के लिए उसने सोनम का धन्यवाद किया। सेनम यह सब जानकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हुए उसको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, और साथ में जाते हुए अपना फोन नम्बर दे जाती है।
हरीश कण्डवाल "मनखी "
