Dhan Pati Singh Kushwaha

Inspirational


4.1  

Dhan Pati Singh Kushwaha

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घर से ही पूजा

घर से ही पूजा

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"पापा! मंदिर वाले पुजारी शर्मा जी का फोन।"कहते हुए मेरे छोटे बेटे ने घण्टी बजते हुए मोबाइल को मेरे सामने वाली मेज पर रखकर इशारा करते हुए कहा।अभी पांच मिनट पहले आज 24 मार्च,2020 की शाम 8:00 हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का राष्ट्र के नाम संबोधन समाप्त हुआ था।सम्बोधन के उपरान्त हो रही चर्चा को मैं बड़ी तन्मयता से टेलीविजन पर देख रहा था।फोन उठाते ही मेरे नमस्ते बोलने पहले ही पुजारी जी की आवाज़ सुनाई दी।

" नमस्ते, मास्टर जी, मैं शर्मा जी बोल रहा हूं।"-फोन उठाते ही दूसरी ओर मंदिर के पुजारी जी बोले।

"नमस्ते,पुजारी जी, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं?"-उनको पुजारी जी कहकर सम्बोधित करने का उद्देश्य उन्हें यह आश्वस्त करना था कि मैंने उन्हें भली-भांति पहचान लिया है।

"मास्टर जी ,अभी मोदी जी के सम्बोधन के पहले आपने पहले व्हाट्सऐप फिर सम्बोधन से पांच मिनट पहले फोन करके याद दिलाया था कि मोदी जी को जरूर सुनना। अब आप मेरी बात ध्यान से सुनिए। आर्यावर्त के युगाब्द 5122 अर्थात 2077 विक्रमी संवत की शुरुआत जो कि प्रथम बासंतिक नवरात्र होता है ,से इक्कीस दिन की पूजा अर्चना सभी ने अपने घर से भी करनी है जैसा कि सम्बोधन के माध्यम से आपको पता चल ही चुका होगा। पर मैंने सोचा मेरे अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए इसी बहाने आप से बात भी हो जाएगी।"-एक ही बार में सारी सूचना पुजारी जी मुझे दे दी।

मैंने कहा-"बहुत-बहुत धन्यवाद, पुजारी जी।अब तो आप मेरी बात से पूरी तरह सहमत हो ही गये होंगे कि हमारे सारे क्रियाकलाप हरि इच्छा के अधीन होते हैं।सब अपने अंत:करण की आवाज़ के अनुसार निर्णय लेते हैं जिनका प्रेरणास्रोत हम सबका अद्वितीय परमपिता ही है जिसे अलग-अलग पंथों के लोग अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।"

पुजारी अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए बोले-"मास्टर जी, मोदी जी ने जब यही करना था तो 21 मार्च के संबोधन में ही एक बार में ही इस प्रतिबंध को ही क्यों नहीं लगा दिया? "

मैंने अपना पक्ष रखते हुए उन्हें समझाने की कोशिश की-"पुजारी जी, जनता कर्फ्यू के अगले दो दिनों में बहुत से भारतीयों ने यह सिद्ध कर दिया था कि वे बातों से नहीं लातों से समझने वालों में से हैं। उनकी हरकतों से सचमुच ही पीड़ा झेलने वालों पर भी विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।ठीक वैसे ही जैसे गड़रिया के "भेड़िया आया, भेड़िया आया" के झूठ के कारण जिस दिन सचमुच ही भेड़िया आ जाने पर विश्वास नहीं किया गया।लोग की समझदारी के बारे में किया गया पूर्वानुमान गलत सिद्ध होने के बाद ऐसा भारत कदम उठाना पड़ा। अब देखिए इतने से ही काम चल जाएगा या फिर उंगली और टेढ़ी करनी पड़ेगी।"

पुजारी जी कहने लगे-"आप तो काम में पूजा-पजा में काम, योग में पूजा-पूजा में योग का घाल मेल कर देते हो।"

मैंने कहा-"सूर्य नमस्कार, सूर्य की पूजा के साथ-साथ कई योगासनों का अभ्यास कराता है।तो हो गए न एक पंथ दो काज। भारतीय संस्कृति का हर संस्कार बहुआयामी है।जो कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एकदम खरा है।चाहे हमारी सौ कदम दूर से चक्षु सम्पर्क होते ही हाथ जोड़कर नमस्ते करने की परम्परा हो या सात्त्विक शाकाहारी भोजन की परम्परा हो। मनुष्य न तो मांसाहारी प्राणियों की तरह जीभ से चप-चप करके पानी पीता है और मांसाहारी जानवरों की तरह उसकी आहार नाल छोटी नहीं बल्कि गाय जैसै शाकाहारियों की तरह काफी लम्बी होती है।"

पुजारी जी ने अपनी स्वीकार्यता प्रकट करते हुए मुझे मेरी ही बात का मुझे स्मरण कराते हुए जोड़ा-"मैं आपकी बताई उस बात का समर्थक होने के साथ-साथ प्रचारक भी हो गया कि अलग-अलग पंथों में अपने-अपने ढंग से लम्बी सांस खींचकर गायन करते हुए धीमे-धीमे सांस छोड़ने से प्राणायाम भी एक तीर दो शिकार की कहावत को चरितार्थ करता है। पूजा के दौरान शंख बजाना फेफड़ों का उत्कृष्ट व्यायाम होने के साथ-साथ इससे उत्पन्न ध्वनि तरंगों की आवृत्ति पर्यावरण हितकर सकारात्मक ऊर्जा स्रोत भी है।"

मैंने पुजारी को रैदास भक्त के " मन चंगा तो कठौती में गंगा"के उपदेश को याद दिलाते हुए "घर से पूजा के महत्त्व"का पुरजोर समर्थन करते हुए याद दिलाया कि मेरा सामान्य शिफ्ट का विद्यालय होने के कारण शीतकाल में कार्यदिवस में मैं मंदिर नहीं आ पाता था और इसे ऊपर वाले का आदेश मानकर घर से भी पूजा करने में विश्वास रखता रहा हूं।"

पुजारी ने मोदी जी के निर्णय को एक अत्यावश्यक , दूरदर्शी,सोच बताते उनके इस कदम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा-" अपने उद्बोधन में मोदी जी ने दो बार हाथ जोड़कर देशवासियों से घर पर ही इक्कीस दिन के निवेदन हर भारतीय का मन मोह लिया । इससे मोदी जी की प्रजा वत्सलता के भाव वाली भारतीय संस्कारों की परम्परा स्पष्ट दिखाई दी जो आज के काल में लुप्तप्राय हो चुकी है।"

मैंने पुजारी जी को सूचना देने के बहुत-बहुत धन्यवाद देते और नमस्ते करते यह याद दिलाया कि मंदिर के कपाट बंद होने का समय हो गया है।साथ इक्कीस दिन तक आपातकालीन स्थिति को छोड़कर सभी कार्य घर से भी करने का आश्वासन भी दिया।हम दोनों ने विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यम से सविनय जन जागरूकता में पारस्परिक सहयोग के वचन का आदान-प्रदान करके संपर्क में बने रहने का एक -दूसरे को वचन भी दिया ताकि "कोरोनासुर" से मुक्ति की दिशा में हम अपना योगदान दे सकें।


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