घर ही सिर्फ मेरी धुरी नहीं
घर ही सिर्फ मेरी धुरी नहीं
उस दिन रंजीत जी भरी सभा में जब यह कह रहे थे तब सब उनसे बहुत प्रभावित हो रहे थे। उनके वक्तव्य का एक-एक शब्द बहुत प्रभावशाली था।
"लोग कब ये समझेंगे कि बेटी के पैदा होने पर निराश हो जाना, मिठाई ना बांटना, फिर उसको पढ़ाई लिखाई में उचित अवसर नहीं देना, उसको घरेलू कामों में लगा देना, उसको शाम के बाद घर से बाहर निकलने नहीं देना, उसको बेटे के बराबर नहीं समझना मात्र ही भेदभाव नहीं होता है।
बल्कि उसके पैदा होने पर बैंड बाजा बजवाना, ये कहना कि घर में लक्ष्मी आई है, बेटी तो घर की रौनक होती है, बेटी से ही घर घर बनता है, बाद में आते जाते लोगों को बताते रहना कि हमारी बेटी तो बेटे से बढ़कर है, बेटी बड़ी होकर कल्पना चावला बनेगी, साइना नेहवाल बनेगी, सोशल मीडिया पर मेरी बेटी मेरा अभिमान का स्टेटस लगा लेना, उसको देवी की तरह महिमामंडित कर देना भी भेदभाव होता है..!'"वही रंजीत जी घर आकर अपनी पत्नी रजनी से कैसे बात करते हैं वह भी उल्लेखनीय है।उनकी पत्नी रजनी जी... एक बेहद सौम्य और संभरान्त महिला.. जो पूर्णतः घर बच्चों और पति को समर्पित हैं।
अल्हड़ सी, जिन्दगी से भरपूर रजनी की जब शादी तय हुई थी, तब वह बहुत खुश थीं कि उन्हें रंजीत सिंह जैसे पति मिले थे।
एक तरफ जहां सारी सखियों ने रजनी के भाग्य को सराहा था। वहीं रजनी को पता नहीं क्यों रंजीत जी बड़े ही अहंकारी लगे थे। उनमें बहुत सारे गुण थे लेकिन एक बहुत बड़ा अवगुण था तो वह गुस्सैल स्वभाव के थे।और साथ में वह स्त्रियों को हमेशा दोयम दर्जे का समझते थे पता नहीं इतने प्रतिष्ठित पद पर होने के बावजूद भी उनकी मानसिकता ऐसी क्यों थी।
वह अक्सर स्त्रियों को घर परिवार संभालने तक ही उनका कर्तव्य समझते थे। और बात बात पर रजनी को यही समझाते थे कि,"औरतों का कर्तव्य घर संभालना है और घर ही उसकी धुरी है!"
रजनी को हमेशा से सजने सवरने का बहुत शौक था। सिल्क की और बनारसी साड़ियां उसकी कमजोरी थी। वह साड़ी पहनकर बहुत खुश होती और सजती संवरती रहती। लेकिन घर गृहस्ती के काम के बीच में जब वह अपना शौक पूरा करती तब रणजीतसिंह जी गुस्सा हो जाते और कहते कि,
" इतना सज धज कर घर में रहने की क्या जरूरत है ? घरेलू स्त्रियों को पहले घर का काम करना चाहिए और घर परिवार के प्रति जिम्मेदारी ही उनका पहला कर्तव्य होना चाहिए!"
"आखिर... स्त्रियों को बाहर जाकर काम करने और आत्मनिर्भर होने की ज़रूरत ही क्या है?"
यह सुनकर रजनी को बहुत दुख होता और उसका कलेजा छलनी हो जाता था।
यहां तक कि... उनके अनुसार रसोई और बच्चों के लालन पालन से आगे स्त्रियों का कोई अस्तित्व ही नहीं था।
पति के लगातार अवहेलना से रजनी ने एक तरह से अपना मन ही मार लिया था।उस दिन करवा चौथ था।रजनी बहुत सज संवरकर बैठी थी और व्रत करके पति का इंतजार कर रही थी।
जब रंजीत सिंह आए तो उन्हें उम्मीद थी कि वह उसके रूप श्रृंगार की तारीफ करेंगे। लेकिन उसकी तरफ देखे बिना ही रंजीत सिंह जी ने जब कहा कि,
"आओ, देखो चांद निकल आया है। मेरे हाथ से पानी पियो और जल्दी से व्रत खत्म करो और मुझे खाना खिलाओ तुम भी खाओ मुझे बहुत भूख लगी है!"
"यह व्रत तो मैंने आपके लिए ही रखा है। मुझे भी तो भूख लगी है !"
रजनी ने आज पता नहीं कैसे कह दिया।
पत्नी का इस तरह मुखर होकर बोलना रंजीत सिंह जी को बिल्कुल पसंद नहीं आया तो उन्होंने थोड़ा कठोर लहजे में कहा," यह अच्छी बात है कि तुमने व्रत रखा है। पति की सलामती और लंबी उम्र के लिए व्रत रखना पत्नी का कर्तव्य है। लेकिन अब अपने पति को भी भूखा मत रखो। पति को भी समय से खाना खिलाना स्त्री का कर्तव्य है!"।
कर्तव्य का पाठ कुछ ज्यादा ही हो चुका था। रजनी यह शब्द सुन सुन कर तंग आ गई थी तो उससे नहीं रहा गया और वह प्रत्युत्तर में बोल पड़ी,
" आप हमेशा स्त्री के कर्तव्य की बात करते हैं लेकिन कभी आपने पुरुष के कर्तव्य के बारे में सोचा है?"रजनी ने उम्र से थोड़ा गुस्से में कहा।" क्यों नहीं ...सोचता हूं....स्त्री का काम है वंश को आगे चलाना और सास ससुर की सेवा करना और अगर वह सुहागिन इस दुनिया से जाती है या उसका सबसे बड़ा सौभाग्य होता है। मेरी नजर में एक स्त्री की यही कहानी है। और यही उनका जीवन का उद्देश्य होता है।
उनका आरंभ मायके में और सुसराल में अंत होना चाहिए।
यथार्थ ने रजनी को समझाया और किसी काम का कहकर घर से बाहर निकल गया।
रजनी एक पढ़ी-लिखी महिला थी। और अपनी प्रतिभा को नष्ट होता हुआ नहीं देख सकती थी। वैसे देखा जाए तो उसे दिखाकर कोई मारता डांटता या पीटता नहीं था। बस उसे घर में वह सम्मान नहीं हासिल था, जिसकी वह हकदार थी। चाहे घर हो या बाहर उसके ऊपर जिम्मेदारियों का भी बड़ा बोझ था। जिनसे दबकर वह किसी और चीज के बारे में सोच भी नहीं सकती थी।जब परस्पर संघर्ष करते हुए रजनी ने अपने दोनों बेटों को बड़ा किया और अपनी पहचान बनाने का ख्वाब कहीं किसी कोने में पोटली में बांधकर रख दिया।कालांतर में रजनी के दो बेटों की जब उनकी शादियां हुई तो रजनी ने अपनी बहूओं को एक ही बात समझाई कि,
" स्त्री को अपने कर्तव्य के साथ-साथ अपने अधिकारों के प्रति भी सजग होना बहुत ही जरूरी है। नहीं तो पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है!"
अब घर में दोनों बहूओं के आ जाने के बाद रजनी को बहुत आराम हो गया था। अब वह अपने बचे हुए समय का सदुपयोग करना चाह रही थी लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहां से और कैसे शुरू करे।एक दिन आंगन में बैठी बैठी रजनी कुछ सोच ही रही थी उसकी दोनों बहुएं सीमा और आरती आई और कहने लगी," मम्मी जी ! हम दोनों के ऑफिस में नवरात्रि के नौ दिन ऑफिस में एनुअल डे ट्रेडिशनल ड्रेस पहन कर जाना है। प्लीज आप हमारी मदद करो!"" मैं इसमें क्या कर सकती हूं ?तुम दोनों खुद इतनी मॉडर्न हो. मुझे भला नए फैशन की कहां समझ है ? हां पुराने सिल्क और बनारसी साड़ियों की बात हो और ब्लाउज की बात हो तो मैं उसमें कोई आईडिया दे सकती हूं !"
तब बड़ी बहू सीमा ने बड़े उत्साह से कहा,"मम्मी जी,हमें इसी में तो आईडिया देना है। आप कृपया अपनी साड़ियों का खजाना निकालिए और हमें अलग-अलग साड़ी के साथ ब्लाउज मैचिंग करना भी सिखाइए। हम जानते हैं कि आपके पास साड़ियों का बहुत बड़ा खजाना है जो आप पहनती नहीं। और पता नहीं क्यों आपने हमें भी नहीं दिखाया!""अरे बेटा! वह पुरानी फैशन की साड़ियां तुम लोगों क्या पहनोगे ?तुम लोग तो जॉर्जेट शिफॉन और पता नहीं क्या क्या पहनती हो! हमारे जमाने में तो पर क्या हार में शादी ब्याह में बनारसी और सिल्की पहने जाते थे।!"
"वाह....मम्मी जी, आप तो इन साड़ियों का बिजनेस कर सकती हैं!"
इस उमर में क्या काम कर सकती हूं ?"रजनी ने कहा।"आपके पास बहुत सारी अच्छी-अच्छी पुरानी साड़ियां है। और पता है अब आगे शादियों का मौसम चलनेवाला है तो आप अपनी साड़ियों को रेंट पर दे सकती हैं। इनसे कमाई भी हो जाएगी और एक तरह से इन साड़ियों का उपयोग भी हो जाएगा। वरना इतनी सुंदर महंगी साड़ियां इतनी भारी कामदार साड़ियां आजकल कहां मिलती हैं?"
दोनों बहुओं ने रजनी के मन में एक नया उत्साह जगा दिया था।और रजनी को यह काम बहुत पसंद आया।अब वह अपनी पुरानी साड़ियां ड्राईक्लीन कराकर अच्छे से सजा कर शादियों में रेंट पर देने लगी। इससे जो कमाई होती उससे रजनी का उत्साह ओर बढ़ जाता था। और अब रजनी का समय भी अच्छा कट जाता था। अब वह बहुत खुश भी रहने लगी थी।
किसी भी उम्र में इंसान चाहे तो अपने लिए खुशियां ढूंढ सकता है।
कभी इसके लिए खुद कोशिश करनी पड़ती है तो कभी कोई अपना उसकी मदद कर जाता है।
जैसे कि इस कहानी में रजनी की दोनों बहुओं ने उसे आगे जीवन में अपना समय का सदुपयोग करना और अपने मन का काम करने की प्रेरणा दी। और वह अपने प्रयास से अपने काम को मन लगाकर करने लगी।घर में पैसे आने लगे और रजनी का नाम होने लगा तो उनके पति के मन में भी उनकी इज्जत बढ़ने लगी। अब तो उनकी सोशल मीडिया में भी बहुत पहुंच हो गई थी। क्योंकि दोनों बहुओं ने उनका अकाउंट भी खुलवा दिया था। अब वह अपना काम खुद संभालने लगी थी। बचे हुए समय में उनकी बहूऐं भी उनकी मदद कर दिया करती थी।और इस तरह जीवन की संध्या को उन्होंने अपनी खुशियों वाला काम करके प्रकाशमान कर दिया था। और अपना अस्तित्व खुद की नजरों में बहुत ऊंचा कर लिया था। अब उन्हें रातों में बहुत चैन की नींद आती थी और अपने जीवन की सार्थकता समझ आती थी।
जीवन का अंत तब तक नहीं होता जब तक इंसान की इच्छा हो भावना हो और ख्वाहिश हो। शरीर की मृत्यु हो सकती है क्योंकि शरीर की मृत्यु तो अवश्यंभावी है। लेकिन हमारा जो मन है वह हमेशा जीवित रहता है। और जीवन पर्यंत खुद के लिए अपने अस्तित्व की स्थापना के लिए कोशिश करता रहता है।.इन्सान को असली खुशी तभी मिलती है जब वह खुद का एक महत्व देखता है
और खुद के द्वारा कोई सकारात्मक कार्य करता है जैसी कि रजनी जी की जिंदगी में यही एक बदलाव आया था कि अब वह अपनी जिंदगी को एक उद्देश्य दे चुकी थी एक ऐसा सकारात्मक उद्देश्य जिनसे उनको खुशी भी मिलती थी और अपने परिवार का सहयोग उनको आगे बढ़ने में और भी मदद कर रहा था।
वह खुद भी समझ चुकी थी और आने वाली हर नस्ल को समझाना चाहती थी कि....स्त्रियों को आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। (समाप्त)
