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V. Aaradhyaa

Classics

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V. Aaradhyaa

Classics

एक राह जीने की...

एक राह जीने की...

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वैसे तो...लाल जोड़े में लगभग हर लड़की खूबसूरत लगती है।और...उस दिन जिसे मैंने देखा,उस लड़की को बेहद खूबसूरत तो नहीं कह सकते पर वह दुल्हन के लिबास में थी, शायद इसलिए बहुत खूबसूरत लग रही थी।अमूमन तौर पर मैं किसी लड़की को एकटक नहीं घूरती लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी कशिश थी जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी। और मैं उसे बार बार पलटकर देख रही थी।उस लड़की ने लाल जोड़ा पहन रखा था। और माथे पर सिन्दूर... मतलब शादीशुदा थी वो।एक नव विवाहिता यूं स्टेशन पर आंखों में आंसू लिए किसी बुजुर्ग महिला से कुछ कहती फिर रोती हुई...मेरे लिए यह बड़ा अप्रत्याशित दृश्य था। मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।पर...

बुरा हो इस ट्रेन का जो एकदम वक्त पर आ पहुंची।वैसे तो इस इंडियन रेलवे को ट्रेन ऑन टाइम चलाने पर कई डिग्री बुखार आ जाता है पर उस दिन कमबख्त सही समय पर आ गई।मैं मन मसोसकर ट्रेन में चढ़ गई। मैं जानना चाहती थी कि वह लड़की उदास क्यूं थी? उसके साथ वाली महिला कौन थी? और... भी बहुत कुछ।

खैर... मेरे पास सामान ज्यादा था नहीं। अपनी बुटीक का कुछ सामान, एक फाइल और कुछ सैंपल ... बस इतना ही एक बैग में डाल लाई थी मैं।

एक सूटकेस और बैगपैक के अलावा एक हाथ मैं मोबाईल के लिए हमेशा फ्री रखती थी। मेरे फ़ोन बहुत आते हैं ना।उस दिन भी मेरी सहेली अंतरा का फ़ोन आ गया। उसे बड़ी उत्सुकता थी कि मेरा इंटरव्यू कैसा रहा,?इसलिए मेरे फ़ोन पकड़ते ही पहला सवाल यही किया कि,"तेरा ट्रिप कैसा रहा निम्मी?"मैंने भी कुछ ज़्यादा ही उत्साह में आकर कह दिया,"बहुत अच्छा रहा अंतू! उन्हें मेरा काम बहुत पसन्द आया। अब देखते हैं कितना ऑर्डर आता है !""मिल जायेगा ढेर सारा आर्डर तुझे। तू इतनी क्रिएटिव जो है!"अंतरा से अपनी प्रशंसा सुनकर मैं इतनी खुश हो गई कि वह लाल जोड़ेवाली लड़की मेरे दिमाग़ से निकल गई। और मैं ट्रेन में बैठ गई।ट्रेन खुली तब मुझे उसका ध्यान आया। मैंने स्टेशन पर नज़र दौड़ाई पर वह लड़की वहां नज़र नहीं आई।

आज भी सोचती हूं कि पता नहीं वो लड़की कौन थी और उसकी आंखों में आंसू क्यों थे?ट्रेन खुलने में अभी देर थी, तो मैंने सोचा कि पानी की एक बोतल और चिप्स ले लिया जाए।इसलिए मैं जब चिप्स और पानी का बोतल लेकर आई तो यह देखकर चौंक गई कि जो मेरे सामने वाली बर्थ पर वह दोनों औरतें बैठी हुईं थीं।

वह दुल्हन के लिबास वाली लड़की और उसके साथ एक प्रौढ़ा जो जरूर उसकी मां थी, क्योंकि एक मां के साथ ही एक बेटी इस तरह से हाथ पकड़ कर बैठती है।..मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि अगर यह नव विवाहिता है तो उसका पति कहां है ? और यह दुखी क्यों लग रही है?

खैर...मैंने बड़ी मुश्किल से लोअर बर्थ में टिकट कराया था, और इंटरव्यू के भाग दौड़ में बहुत थक भी गई थी इसलिए थोड़ी देर में मैंने अपना बिस्तर लगाया और लेट गई। ना जाने कैसे मेरी आंख लग गई।

बमुश्किल मुझे सोए हुए आधे घंटे ही हुए होंगे कि सामने वाली बर्थ की लड़की की सिसकियां थोड़ी तेज हो गईं और उसकी मां की आवाज मैंने पहली बार सुनी। वह बेटी को हल्के डांटने वाले अंदाज में कह रही थी।"बस ...बस... कर प्रीति! तू अब नहीं रोएगी। और ध्यान से मेरी बात सुन!जो तेरे गलत हुआ है, उसे सही भी किया जा सकता है!"मैं उठकर बैठने वाली थी कि इस एक वाक्य ने मुझे रोक दिया।मैं समझ गई कि अगर मैं अभी चादर हटाकर उठकर बैठ जाऊंगी तो दोनों मां बेटियां कुछ बात नहीं करेंगी और मुझे उनके बारे में जानने में इतनी उत्सुकता बढ़ गई थी कि मैं सिर तक चादर ओढ़कर यूं ही लेटी रही और उनकी बात सुनने की कोशिश करती रही। हालांकि किसी और की बात सुनना सही नहीं है। लेकिन यहां मेरी उत्सुकता और कुछ उन दोनों की हरकतें अटपटी थी कि मुझे पूरी बात जाने बिना चैन नहीं था।मैंने कान लगाकर सुनने की कोशिश की तो सुना उसकी मां उस लड़की को जिसका नाम शायद प्रीति था, उसे कह रही थी,"प्रीति अगर तुझे लगता है कि तेरी शादी किसी गलत लड़के से हो गई है तो बेटा! अब कुछ नहीं हो सकता । क्योंकि हमारे समाज में शादी के बाद लड़कियां मायके में रहती हैं तो बुरी बात मानी जाती है। और इस बात पर तलाक लेने जाएंगे तो लोग बातें बनाएंगे और इससे हमारी खानदान की बदनामी होगी दो अलग।

और लोग सोचेंगे कि...कैसी लड़की है? और इसे यह कैसी आग लगी है जो इस छोटी सी बात के लिए एक लड़की अपने पति को तलाक दे रही है । और इसके बाद तुम्हारी दूसरी शादी तो मुश्किल है ही तुम्हारी छोटी बहन निक्की की शादी भी मुश्किल में पड़ जाएगी। अब जैसा है, जो है, बस तू निभा ले बेटा! तुझे वापस ससुराल जाना ही पड़ेगा!"

" पर... मां! आपको नहीं लगता कि इस शादी से मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई है। भला एक पति के प्यार के बिना मैं पूरी जिंदगी कैसे काटूंगी?"बोलते बोलते प्रीति की सिसकियां तेज हो गईं। और मेरी उत्सुकता इतनी बढ़ गई थी कि मन कर रहा था कि चादर सिर से हटाकर उन दोनों मां बेटी से पूरी बातें साफ-साफ जानूं।जितना कुछ देखा और सुना उससे इतनी बात तो समझ में आ गई थी कि शायद प्रीति की शादी किसी ऐसे लड़के से हो गई है वह या तो नपुंसक है या फिर किसी और से प्यार करता है, और वह प्रीति को प्यार नहीं करता।इसने में ट्रेन की पेंट्री का शाम का नाश्ता आ गया था। और मैं अपनी भूख को और दबा नहीं पा रही थी। समोसे और कटलेट की ऐसी सुगंध आ रही थी कि अब मुझे अपने आप को रोकना मुश्किल हो रहा था। इसलिए चादर हटाकर मैं उठकर बैठ गई और पेंट्रीवाले से अपना प्लेट ले लिया।मुझे यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि सामने वाली लड़की ने भी पैंट्री का नाश्ता ले लिया था और समोसा कुतर कुतरकर खाने लगी… उसके गाल पर अभी भी उसके आंसू सूख रहे थे। उसकी मां बहुत चिंतित दिखाई दे रही थी। इतनी चिंतित कि वह कुछ खा नहीं रही थी। बस एकटक खिड़की से बाहर न जाने क्या देख रही थी।

अब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने बहुत ही मुलायम स्वर में प्रीति की मां से कहा,

" आप भी कुछ लीजिए ना? कम से कम चाय पी लीजिए, आपको अच्छा लगेगा!"

उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ देखा और कहा,"मुझे कुछ भी खाने या पीने का मन नहीं है!"बोलते बोलते उनकी आंखों में आंसू की बूंदे साफ दिखाई दे रही थीं।ना जाने कैसे मेरे मुंह से निकल गया,"आप कुछ खा लीजिए। चिंता मत कीजिए। सब कुछ ठीक हो जाएगा!"मेरा इतना कहना था कि वह फूट-फूट कर रोने लगी और बोलीं....." अब कुछ ठीक नहीं होगा ! सिंदूर फिराया नहीं जाता है। मेरी बेटी की शादी हो गई है और उसकी जिंदगी बर्बाद हो गई है। अब कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता!"मां को रोते देखकर प्रीति ने भी हाथ में पकड़े समोसे का टुकड़ा ट्रे में रख दिया और वह भी मां से लिपटकर जोर-जोर से रोने लगी। ट्रेन में आसपास के लोग भी उन दोनों मां बेटी को गौर से देखने लगे थे।अब मैंने झिझक छोड़कर पूछा," क्या हुआ है? मुझे कुछ बताओगे भी? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है आप दोनों मां बेटी इतनी दुखी क्यों हैं ? और यह दुल्हन के लिबास में क्यों है? क्या इसकी नई नई शादी हुई है?"मेरे इतना कहते ही दोनों मां बेटी ने आश्चर्य से मुझे देखा और दोनों इतना तो समझ ही गई कि मैंने उनकी बातें कुछ कुछ सुन ली हैं।तब वह महिला जिसका नाम जानकी था, और जो प्रीति की मां थी। उन्होंने अपनी बात कहनी शुरू कर दी। और मैं भी ध्यान से सुनने लगी।

दरअसल जानकी और गिरीश जी की तीसरी संतान थी प्रीति!उससे एक छोटी बहन और थी। चार बहनों को उन्होंने बड़ी मुश्किल से पढ़ा लिखा कर बड़ा किया था। प्रीति की शादी के लिए उन्हें ज्यादा दहेज नहीं देना पड़ा था। लड़के वाले खुद आकर लड़की का हाथ मांगकर ले गए थे। बाद में पग फेरे के समय भी प्रीति उदास ही रही थी। और कुछ बोलते बोलते भी नहीं बोल पाई थी। करवा चौथ के एक दिन पहले उसने अपनी मां को कहा था कि,,

"माँ! मुझे आकर यहां से ले जाओ… क्योंकि मेरे ससुराल वाले मुझसे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं!"संजोग ऐसा था कि गिरीश जी नहीं आ सकते थे क्योंकि उसकी छोटी बहन की तबियत ठीक नहीं थी।प्रीति को ससुराल आकर मालूम पड़ा कि प्रीति का पति शुरू से किसी और से प्यार करता था और प्रीति को बिल्कुल अपना नहीं पा रहा था। उसकी सास ने उसकी हालत नौकरानी जैसी बना रखी थी। पर प्रीति ने इस बात के लिए मना कर दिया था कि अगर उसके पति ने उसे नहीं अपनाया या उस लड़की को नहीं छोड़ा तो वह यह घर छोड़ कर चली जाएगी!"बस... अब प्रीति ससुराल नहीं जाना चाहती थी और उसकी माँ उसे ज़बरदस्ती भेज रही थी.मैंने उसे समझाया कि,"प्रीति को वह घर छोड़ देना चाहिए और अपने पैर पर खड़ा होना चाहिए!"

प्रीति ने कहा,

" लेकिन मैं अपने पैरों पर खड़ी कैसे हो सकती हूं? मैंने तो सिर्फ ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की है. आगे मैं क्या करूं कुछ नहीं समझ में आ रहा है!"

अब तक मेरा दिमाग बहुत कुछ सोच चुका था। मैं तो खैर अपना बिजनेस बढ़ाने की कोशिश कर ही रही थी और अब मेरा काम बहुत आगे बढ़ने वाला था। और मुझे सहायिका की जरूरत पड़ती। तो मैंने प्रीति को कहा कि,

" मेरी बुटीक में तो सहायिका का काम कर सकती हो। मेरे बुटीक में कई तरह के काम है मैं कोई ऐसा सेक्शन जहां तुम अच्छे से काम कर सकूं वहां का काम तुम्हें संभालने दे दूंगी!"

फिर मैंने प्रीति की मम्मी से भी कहा कि," तब तक आप प्रीति के तलाक की प्रक्रिया जारी रखिए और तलाक के बाद एलीमनी की रकम से प्रीति का काम और पढ़ाई आगे बढ़ाइए। कल को प्रीति चाहे तो दूसरी शादी भी कर सकती है। यह बात अपने दिमाग से निकाल दीजिए कि एक बार शादी हो गई तो हो गई। एक बेटी आपकी दुखी रहेगी तो दूसरी बेटी को भी आप खुश नहीं देख पाएंगी।बेटियां आपस में जुड़ी होती है। आपकी छोटी बेटी अगर बड़ी बेटी को दुखी देखेगी तो वह भी कैसे खुश रह सकती है?इसलिए सबसे पहले तो प्रीति को अपने पैरों पर खड़ी कीजिए। फिर आप चाहे तो छोटी बेटी की शादी पहले कर सकती हैं। आगे चलकर प्रीति भी अपनी मनपसंद जीवनसाथी के साथ जीवन बिता सकती है!"

मेरी इस बात से जानकी जी को बहुत हिम्मत मिली।

जानकी जी और प्रीति ने भी मुझे बार-बार धन्यवाद कहा।

ट्रेन अपने गंतव्य तक पहुंचने को थी और दोनों मां बेटी मुझे बार-बार धन्यवाद देते हुए एक ही बात कह रही थी कि," बस कुछ पल की मुलाकात में बना दी बात "दोस्तों,

कई बार हम सफर में जैसे लोगों से मिलते हैं जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

तो कभी-कभी हमारी सीख किसी के काम आ जाती है।तो अगली बार आप जब सफर करें तो अपने आप को मोबाइल में लगाकर ना रखें बल्कि आसपास के लोग और माहौल का जायजा लें।शायद किसी को आपके द्वारा बोले गए मोटिवेशन के कुछ शब्द उनकी जिंदगी बदल दे।

जिस तरह मेरी मुलाकात प्रीति और उसकी मम्मी से हुई थी। और आज प्रीति मेरी सहायिका के रूप में काम कर रही है।

वैसे ही...

हो सकता है आप भी किसी परेशान व्यक्ति की आवाज बने और अपने उल्लास भरे शब्दों से किसी के जीवन में रोशनी ला दें।


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