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Saroj Verma

Abstract


4.5  

Saroj Verma

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एक मुट्ठी इश्क़--भाग(४)

एक मुट्ठी इश्क़--भाग(४)

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इन्हीं दंगों की आग गुरप्रीत और सरबजीत के गांव तक भी जा पहुंची थी,पूरा गांव जैसे दहशत और डर के साए में डूबा था,हर जगह मातम ही मातम था।।

बहुत ही मनहूस घड़ी थी वो, कोई सुरक्षित नहीं था उस समय ना सलमा ना सीता,कुरान और गीता में लिखे संदेश को लोग भूल गए थे,बस हर छुरे और तलवार पर खून ही खून नजर आ रहा था।

अबलाएं डर रहीं थीं, घूंघट में छुपी हर दुल्हन सोच रही थी कि उसकी चूड़ियां सुरक्षित रहें,हर बहन का आंचल दुहाई दे रहा था, लोगों के खिड़की दरवाजे नहीं खुल रहे थें,रात को तो रात को दिन को भी सन्नाटा पसरा रहता,बस शोर सुनाई देता तो सिर्फ दंगाइयों का।।

 ये वही देश था,जहाँ आजादी के लिए लोगों ने इतनी कुर्बानियाँ दी थीं, अपना खून ये सोच कर तो नहीं बहाया होगा ना कि आगे चल कर देश का ये अंजाम होगा, इतनी बार मुसीबत आने पर भी सबने एक साथ उसका समाधान किया, पर जो हालात थे उस समय थे उन्हें देखकर लग रहा था कि दंगाइयों ने दरिंदगी की हदें पार कर दीं हैं, अल्लाह् और भगवान के बनाएं हुए इंसानों का खुद इंसान मजहब के नाम पर मजाक़ उड़ा रहा था,कोई भी घर सुरक्षित नहीं था,ऐसे वतन की तो किसी ने भी कामना नहीं की थीं।।

इसी बीच रात के समय कुछ दंगाइयों ने सरबजीत के किवाड़ की सांकल खटखटाई ही थीं कि सरबजीत के पिता ने अपने बेटा और बहू को फौरन इशारा किया कि पीछे के दरवाजे से निकल जाओं, सरबजीत की मां ने बेटा बहु को जबरदस्ती पीछे के दरवाज़े से भगा दिया और खुद दंगाइयों की भेंट चढ़ गए।।

रात का घुप्प अंधेरा, कहीं कोई रोशनी नहीं, चारोँ ओर सन्नाटा पसरा था,कच्चा ऊबड़खाबड़ रास्ता, घने घने पेड़ और झाड़ियां,डर था कि कहीं कोई इनमें ना छुपा बैठा हो,बस कहीं झींगुरों या जंगली जानवरों की आवाज़ सुनाई दे जाती तो दोनों डर के मारे सहम से जाते,बस साइकिल के पहिए जिसका जमीन के साथ घर्षण हो रहा था उसकी आवाज़ आ रहीं थी या तो सरबजीत के तेज रफ्तार साइकिल चलाने से हृदय मे पड़ रहे दबाव से तेज सांसों की,इक्कीस साल का सरबजीत,सत्रह साल की गुरप्रीत को साइकिल के कैरियर मे बैठाकर गुरप्रीत के मायके जा रहा था,क्योंकि इस खतरें की घड़ी मे एक वहीं सुरक्षित जगह दिमाग मे आ रही थीं।।

दोनों के मन में एक अजब़ ही उधेड़बुन चल रही थीं कि क्या होने वाला हैं, सरबजीत पसीने से लथपथ हो चला था,उसका दिल धौंकनी की तरह चल रहा था और अगर दिमाग मे उलझन ,दिल मे डर हो तो इंसान तो वैसे ही थक जाता हैं, गांव का आधा से ज्यादा रास्ता लगभग दोनों पार कर चुके थे,इतने मे सरबजीत को बहुत जोर की प्यास लगी,क्योंकि तेज रफ्तार मे साइकिल चलाने से उसका गला सूख गया था,अब इतनी रात मे ना कोई तालाब नजर आ रहा था और ना कोई पोखर।तभी गुरप्रीत बोली___

"बस थोड़ी दूर पर एक पीपल का पेड़ हैं हमारे गाँव से थोड़ा पहले,वहां बिल्कुल छोटा सा पीपल के पेड़ के नीचे माता का मंदिर हैं, वहां एक एक छोटा सा कुआँ हैं, मंदिर के नाम पर बस तीनों ओर से मिट्टी की फलांग जाने वाली दीवारें हैं,वहां पानी मिल सकता हैं, कुएँ मे हमेशा रस्सी और बाल्टी रहती हैं।"

सरबजीत बोला,"ठीक हैं, इतना दूर आ गए हैं तो थोड़ी दूर और सही।"और दोनों थोड़ी देर मे उस पीपल के पेड़ तक पहुंच गए।।

सरबजीत एक तरफ साइकिल खड़ी करके,धम्म से जमीन पर ही बैठ गया, गुरप्रीत ने जल्दी जल्दी कुएँ से बाल्टी भरी और सरबजीत के पास लार बोली, पानी पी लीजिए।।सरबजीत ने अपनी अंजुली मे भर भरकर पानी पिया, फिर गुरप्रीत ने पिया।।

गुरप्रीत बोली, "ये साइकिल दीवार की आड़ मे खड़ी करके आप भी दीवार की आड़ मे ही बैठकर सुस्ता लीजिए फिर घर चलते हैं", दोनों दीवार की आड़ में बैठकर सुस्ताने लगें, तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया, देखा तो कुछ लोग मशालें लेकर तलवारों के साथ मंदिर की ओर बढ़े चले जा रहें हैं।।

अब सरबजीत और गुरप्रीत घबरा उठे कि ना जाने अब क्या होगा?लेकिन वो सब भी पानी पीने आए थे और सब सरदार ही थें, उनके साथ औरतें और बच्चे भी थें।।दोनों को डरे हुए देखकर एक ने पूछा___

"कौन हो तुम दोनों पुत्तर?"

"जी,गांव जा रहें, बलवंत जी के घर",सरबजीत बोला।।

"लेकिन पुत्तर! वहां जाने से कोई फायदा नहीं हैं, पूरा गांव तहस नहस हो चुका है, शायद सरदारों का एक भी परिवार ना बचा हों,हम सब भी डर के मारे गांव छोड़कर आए हैं, अब सबने सोचा हैं कि दिल्ली वाली बस पकड़ कर दिल्ली जाएगें,अगर तुम भी चलना चाहते हो तो चल सकते हो",उनमें से एक बोला।

"लेकिन चाचाजी हमारे पास ना रूपए हैं और ना सामान",सरबजीत बोला।।

"ओय !कोई ना पुत्तर, इंसानियत के नाते इतना तो कर ही सकते हैं" उनमे से एक बोला।।

गुरप्रीत को ये सब सुनकर बहुत निराशा हुई कि पता नहीं उसके मां बाऊजी का क्या हुआ होगा और उधर बूढ़े सास-ससुर भी ना जाने किस हाल मे होगें और हम दोनों भी अनाथों की तरह इधर उधर भटक रहे हैं, पता नहीं रब को क्या मंजूर हैं? कैसे दिन गुजर रहें हैं, अभी बंटवारे का दर्द लोग बड़ी मुश्किल से भुला पाए और फिर से इंसान की इंसानियत खत्म होती दिख रही हैं।।सरबजीत और गुरप्रीत के पास उन लोगों के साथ जाने के सिवाय और कोई चारा भी नहीं था,और वो भी उस झुंड के साथ हो लिए,एक दो घंटे में सब पैदल चल कर बसअड्डे तक पहुंच गए, जिसको जहाँ जगह मिली बस मे ठुस गया,क्योंकि भीड़ इतनी ज्यादा थी,आसपास के और भी गांवों से लोग भागकर उस बसअड्डे आएं थे ,क्योंकि आसपास के इलाके में वहीं सबसे बड़ा बसअड्डा था,ऊपर नीचें बस बिल्कुल भर चुकी थी।

आधी रात हो चुकी थीँ,ड्राइवर ने बस स्टार्ट की और बस चल पड़ी,सुनसान रास्ते पर बस बढ़े जा रही थीं,बस मुश्किल से कुछ ही दूर जा पाई होगी कि पता नहीं कहाँ से दंगाइयों का हुजूम आन खड़ा हुआ और बस को चारों से घेर लिया।।

सब बुरी तरह से डर गए, दंगाइयों ने सबको बस से नीचें उतारा, सब बारी बारी से डरे सहमें से बस से नीचे उतरे, औरतें कुछ ज्यादा ही भयभीत थी अपने लिए और अपने बच्चों के लिए भी,भीड़ में सरबजीत और गुरप्रीत भी एकदूसरे से अलग अलग जगह पर खड़े थे,दंगाईयों ने सबकी तलाशी शुरू कर दी।।

इसी मौके का फायदा उठाकर सरबजीत ने दंगाई को धक्का देकर उसका हथियार छीन लिया, सरबजीत को ऐसा करते देख और भी लोगों मे हिम्मत आ गई और सबने ऐसा ही करना शुरू कर दिया, आदमियों ने औरतों से कहा कि वो लोग बच्चों को लेकर भागना शुरू करें, वो लोग आ जाएगें,औरतों ने ऐसा ही किया लेकिन गुरप्रीत,सरबजीत को छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं, तब तक औरतें आगें पहुंच गई, सरबजीत ने चिल्ला कर कहा___

"गुरप्रीते...भाग गुरप्रीते..मैं आता हूँ।"

गुरप्रीत को मजबरी मे सरबजीत की बात माननी पड़ी और जैसे ही भागने को हुई एक दंगाई उसके पीछे पड़ गया, गुरप्रीत भागती रही....बस भागती रही,बहुत देर तक भागती रही और खुद को छुपाने के लिए एक घनी झाड़ी में छुपकर बैठ गई, कुछ देर के बाद उसे जब किसी की आहट सुनाई देती ना पड़ी तो वो झाड़ियों से निकलकर बाहर आई।।

रात अभी बाकी थी,अंधेरा अभी भी पसरा था,उसे पता ही नहीं था कि वो कहाँ हैं, वो अकेली सुनसान जंगल मे भटक रही थीं, सरबजीत भी पता नहीं कैसा होगा, कहां होगा, अब मैं क्या करूँ, कहां जाऊं, बस यहीं सोचते हुए गुरप्रीत आगे बढ़ती जा रही थीं लेकिन उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था ।तभी एकाएक गुरप्रीत को चक्कर आ गया और वो गिर पड़ी,रातभर वहीं बेहोश पड़ी रही।।

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से उसकी नींद खुली,उसने आंखें खोली तो सुबह तो हो चुकी थी लेकिन अभी सूरज का प्रकाश चारों ओर नहीं फैला था,तभी किसी ने उससे पूछा।।

"आप कैसी हैं? तभी गुरप्रीत ने घबराते हुए अपना दुपट्टा ठीक किया और बोली।।

"ठीक हूँ।।"

"कल रात आप बेहोशी की हालत में यहाँ पड़ी थीं, मैंने आपको देखा तो मैं भी यहीं रूक गया।"उस शख्स ने कहा।।

"जी बहुत मेहरबानी", गुरप्रीत बोली।।

"लगता हैं आप भी मेरी तरह हालातों की मारी हैं",उस शख्स ने फिर से गुरप्रीत से पूछा।।

गुरप्रीत ने कहा_

"हां! कल रात मेरा सबकुछ तबाह हो गया, हर कोई मुझसे बिछड़ गया।"

"जी,मैं समझ सकता हूँ, मैने भी तो अपनी बीवी को खोया हैं, ये एक साल का बेटा और तीन साल की बेटी उसकी,अमानत हैं", बस इतना ही बचा पाया और इतना कहते कहते उसकी आंखें भर आईं।।

"जी,आपका नाम जान सकता हूँ", शख्स ने पूछा।।

"जी,मैं गुरप्रीत", गुरप्रीत बोली।।

"बहुत बढ़िया, जी मैं इख़लाक़", उस शख्स ने कहा।।

इतना सुनकर गुरप्रीत घबरा गई।।

"आप घबराएँ नहीं मोहतरमा!ख़ुदा के लिए मुझे गल्त ना समझे,मै भी तो आपकी ही तरह इस नफरत का शिकार हुआ हूँ, आप कुछ नहीं तो इंसानियत का रिश्ता तो रख ही सकतीं हैं मेरे साथ,अल्लाह पर भरोसा रखिए, वो सब ठीक करेंगा,इन नासमझों को पता नहीं कब अक्ल आएंगी,याह..ख़ुदा रहम कर",इख़लाक़ बोला।।

"गुरप्रीत ने एक नज़र इख़लाक़ की ओर डाली,यही कोई चौबीस पच्चीस साल उम्र होगी,चेहरे पर दाढ़ी और उदास चेहरा और गोद मे दो बिन मां के बच्चे, उसकी हालत देखकर गुरप्रीत का मन भर आया....

क्रमशः___



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