एक ख़तरनाक दीवाली
एक ख़तरनाक दीवाली
बात बहुत पुरानी है 1980 की दीवाली की रात की बात है। मैं छत पर दीपक जला रही थी तभी किसी का छोड़ा गया रॉकेट आ कर दुकान के बोर्ड को जलाने लगा मैं उसे बुझाने की कोशिश करने लगी तो मेरे कपड़ों में भी आग पकड़ ली मैं एक बार जोर से चिल्लाई थी तभी पड़ोस का एक लड़का जो उम्र में मुझसे छोटा था लेकिन बड़ी बहादुरी से उसने आग बुझाई बोर्ड की भी और मुझे भी बचाया। मुझे कुछ समझ में नहीं आया मैं बहुत देर तक खड़ी रही अपनी आंखों को मूंद कर दोनों हाथों से। तब तक सभी लोग छत पर आ गये थे मुझे उतार कर घर ले गये फिर मैंने दूसरा ड्रेस पहना और वापस दुकान के पूजा में सम्मिलित होने आ गई। लेकिन मेरी हंसी गुम हो गई थी सदमे में थी। मुझे बचाने में उस पड़ोसी का दोनों हाथ जल गया था। सप्ताह भर वो गायब रहा उसके बाद एक दिन एक पेंटिंग लेकर आया जिसे देखकर मैं हैरान हो गई। बिल्कुल उस रात की घटना को इस तरह रेखांकित किया था जैसे किसी ने फोटो खींच ली हो। अधजले कपड़ों में दोनों हाथों से अपनी आंखों को मूंदकर खड़ी थी मैं कुछ दीपक जल रहें थे और एक आम के पेड़ की डाली वहां तक पहुंच रही थी .....। मैंने कहा ये क्या तस्वीर बनाई है बेवकूफों जैसा ये भी कोई दृश्य है जिसकी याद संजोकर रखी जाएं ? उसने कहा था "हां मेरे जीवन का पहला अनुभव है एक एहसास है एक याद है जिसे हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रखना चाहता हूं।" मैंने वो तस्वीर फेंक दी थी। उसने उठाया और चुपचाप चला गया। उस वक्त वो आठवीं कक्षा में था उसकी उम्र 12/14 साल की रही होगी। उसके बाद फिर कभी नहीं मिला। एक दिन खत भेजा था जिसमें लिखा था "मैं एक दिन लौट कर आऊंगा उस दिन जब आपके बाल पूरे सफ़ेद हो चुके होंगे , झुर्रियों से मुखड़ा सुसज्जित हो चुका होगा , दांत सारे गायब हो चुके रहेंगे। पोपली गालों वाली बुढ़िया बन जाएंगी झुकी हुई कमर अखरोट की छड़ी लिए खट खट करती हुई आएंगी दरवाजा खोलने तब यह तस्वीर चांदी के फ्रेम में करवा कर लाऊंगा। उस वक्त आपको बहुत अच्छा लगेगा। तब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच जाएंगी कि मुझसे कोई खतरा भी महसूस नहीं होगा। बस इतना रहम कीजिएगा अपने बच्चों से मामा बोल कर परिचय नहीं करवाइएगा।" 41 साल हो गए उस पेंटिंग का। पता नहीं वो होगा भी या नहीं ? आज अनायास उसकी याद आ गई। आंखों में वो दीवाली की रात अभी भी सहमा जाती हूं।
अब तो सचमुच मेरे बाल चांदी के तारों से सुसज्जित हो गए हैं , कमर झुक गई है , दांत गायब होने के कगार पर हैं , अख़रोट की छड़ी लाकर रख दी गई है , बोली पोपली होने लगी है मगर उस चित्रकार का कहीं कोई पता ठिकाना नहीं है। न जाने वो कैसा होगा ? कहां होगा ? होगा भी या नहीं ...... नहीं नहीं होगा तो जरूर कहीं न कहीं क्योंकि वो मुझसे उम्र में छोटा था।
