एक छोटी सी प्रेम -कथा
एक छोटी सी प्रेम -कथा
न जाने सच क्या है ?विश्वास नहीं होता कि तुम ऐसा भी कुछ कह सकते हो मेरे बारे में, पर सभी लोग झूठ तो नहीं बोल सकते ...फिर उन चीजों के बारे में जिन्हें सिवाय तुम्हारे कोई नहीं जानता। तुम इतना बदल क्यों गए सदा ?तुम तो बहुत प्यार करते थे मुझसे ...रात-दिन मेरी सुरक्षा की चिंता किया करते थे। कितने आश्वासन दिए थे तूने मुझे। याद है एक दिन जब मैं बहुत उदास थी ...रात-भर रोने से मेरी आँखें सूज गयी थीं ...तो तुमने पूछा था –क्या हुआ है ?जब मैंने तुम्हारे कई बार पूछने पर भी कुछ नहीं बताया तो तुम रूआसे हो गए और रूठकर चले गए। उस दिन तुमने खाना भी नहीं खाया तो फिर मुझे ही मनाना पड़ा।
याद है जब मैं तुम्हारे मुंह में निवाला ठूंस रही थी तुमने कसकर जबड़े भींच लिए थे, तब मैंने तुम्हारे होंठों पर अपने होंठ रख दिए थे। दोनों के अधरों ने जब आपस में मधुर संलाप किया तो तुम्हारा सारा गुस्सा उड़न छू हो गया। पर तुमने मुझसे वादा लिया कि मैं फिर न रोऊँगी, न तुमसे कोई बात छुपाऊँगी। कैसे भूल जाऊँ वे बातें सदा ...वे प्यार के क्षण ...वे एहसास ...।
अब तुम यह जानकर भी कि तुम्हारे लिए दिन-रात रो रही हूँ ...तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ...तुम निश्चिंत हो ...कोई मित्र जब तुम्हें मेरी परेशानियों के बारे में बताता है तो झुँझलाकर कहते हो –दुखी है तो क्या करूं ?मुझे उससे कोई मतलब नहीं।
तुम मुझसे दूर चले गए हो दूसरे शहर ...शायद मुझसे बचने के लिए ही। जाने से पहले तुमने मुझ पर जो इल्जाम लगाया था, उसकी तकलीफ से मैं रो पड़ी थी और तुम मुझे रोता देखकर भी चले गए थे ...कम से कम मेरी सफाई तो सुन लेते सदा...पर कैसे सुनते ...सुन लेते तो जा कैसे पाते ?खुद को अपराध -बोध से मुक्त कैसे कर पाते ?है न यही बात सदा।
पहले जब मैं मरने की बात करती थी, तुम नाराज हो जाते थे ...कई बार मेरे घर की तलाशी ले चुके थे कि मैंने नींद की गोलियां कहाँ छुपा रखी हैं पर अब तुम खुलेआम कहते हो –मर जाती तो अच्छा होता ...।
मैं तुम्हारे लिए इतनी बुरी कब से हो गयी सदा ...।
ये सच है कि मैं तुमसे उम्र में बड़ी हूँ पूरे आठ साल बड़ी ...पर यह बात तो तुम हमेशा से जानते थे। मैंने ये बात तुमसे कहाँ छुपाई थी ...शुरू में तो मैं तुमसे बड़ों जैसा ही व्यवहार करती थी । पर तुम ही थे न जो इस बात से चिढ़ते थे। तुम मुझे बच्ची कहते थे और ऐसा ही व्यवहार भी करते थे। अपने हाथ से खाना खिलाते थे ...दुलारते थे पुचकारते थे ...दो चम्मचों को जाने कैसे जोड़कर तुम मुझे खाना खिला लेते थे। हमेशा कहते-तुम खाओ मैं देखूंगा ....। कौन करता था यह सदा तुम ही न ...। मैं बार-बार कहती थी कि हमारा क्या जोड़ ?पर तुम हमेशा ऐसे उदाहरण ढूंढ लाते जिसमें लड़की की उम्र लड़के से अधिक होती। कितना हँसी थी मैं, जब तुम दाढ़ी बढ़ाकर और ऊंचे जूते पहनकर मेरे जितना बड़ा दिखने की कोशिश में लग गए थे।
तुम मुझे अच्छे लगते थे। तुम्हारा गोरा, गोल, सुंदर बच्चों –सा चेहरा, गुलाबी होंठ, घुंघराले बाल मेरे मातृत्व को तृप्त करते थे ...तभी तो मैं तुमसे बातें करने लगी और धीरे-धीरे तुमसे काफी खुल गयी थी, जबकि आफिस में और भी लोग साथ काम करते थे। मुझे तुमसे दूसरे पुरुषों जैसा डर भी नहीं लगता था। तुमसे किसी भी तरह के खतरे की संभावना नहीं थी मुझे। तुम्हें भूखा देख मैं तड़प उठती थी और अपना टिफिन खिला देती। घर से ज्यादा खाना लाने पर तुम्हारी उम्र के ही छोटे भाई को शक होने लगा और जब तुम पहली बार जिद करके मेरे घर आए तो उसका शक पुख्ता हो गया। तुम उसे बिलकुल अच्छे नहीं लगे। शायद एक लड़का दूसरे लड़के को पहचान लेता है । दोनों की फितरत एक –जैसी जो होती है। तुम्हारे जाने के बाद भाई ने कहा-इस लड़के को घर क्यों दिखाया ...अब देखना, यह बार-बार आएगा।
मैंने कहा-नहीं, बच्चा है ...घर देखना चाहता था, इसलिए बुला लिया...अब थोड़े आएगा।
भाई ने गुस्से में कहा-आप तो सबको बच्चा ही समझ लेती हैं। बाईस साल का लड़का बच्चा नहीं होता। उसकी नजर अच्छी नहीं थी ...और आप भी उसे ज्यादा ही भाव दिए जा रही हैं ...कह रहा हूँ पछताएंगी एक दिन। मैं तो छुट्टियों में आया हूँ यहाँ, फिर चला जाऊंगा। जब अकेली रहेंगी तो इसे आने से रोक नहीं पाएगी।
मैंने भाई को गुस्से में थप्पड़ मार दिया क्योंकि मैं उस समय तक तुम्हें पुरुष रूप में नहीं देख पा रही थी। तुम्हारी बातों को बचपना समझकर टाल देती ...तुम्हारी जिद मान लेती। कई बार हमने साथ फिल्में देखीं। मुझे इसमें कहीं कुछ अनुचित लगा ही नहीं। तुमने भी कभी मुझे बेवजह छूने की कोशिश नहीं की।
कभी –कभी तुम कहते –हमारी जोड़ी कितनी अच्छी लगती है।
मैं हँस देती-हाँ बिलकुल माँ- बेटे की तरह ...। तुम आँख तरेरते तो कहती-नहीं ...नहीं बड़ी दीदी और छोटे भाई की तरह। और सच भी था कि तुम्हें देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि हमारे बीच रक्त-संबंध नहीं है। काफी समानता थी हमारे रूप-रंग में। मैं तुमसे किसी अन्य रिश्ते की कल्पना भी नहीं कर पाती थी। स्त्री-पुरुष की तो तौबा-तौबा !
मैंने अपने बारे में तुम्हें सब-कुछ बता दिया था। राजदार थे तुम मेरे। मेरे हर दुख-सुख से वाकिफ थे। मुझे वकूफी समझते थे। तुमसे अच्छी मित्रता हो गयी थी। तुम मेरी तरफ उठने वाली आँखों को निकाल लेने की बात करते। तुम इतनी सुलझी हुई समझदारी की बातें करते कि मैं खुद को ही छोटा समझने लगती। तुम पर आँख मूंदकर भरोसा करती थी और खुद को भूलने लगी थी कि मैं कौन हूँ ...मेरी जिम्मेदारियाँ क्या हैं। मैं भाव-स्तर पर तुम्हारी उम्र की ही लड़की बन गयी थी ?वैसा ही कच्चापन, अल्हड़पन भर गया था मुझमें । तुम्हें मेरा यह रूप ही अच्छा लगता था।
पर एक तरफ मैं जहाँ कमउम्र लड़की के रूप में तबदील हो रही थी, दूसरी तरफ तुम पुरुष में, यह बात मैं देख ही नहीं पाई। जब एक दिन तुमने कहा कि तुम मुझे प्रेमिका की तरह प्यार करते हो तो मैं जैसे आसमान से गिर पड़ी। अब मैंने चारों तरफ देखा, फिर खुद को और तुम्हें भी पूरे यथार्थ-बोध के साथ और दृढ़ता से कह दिया-यह असंभव है। तुम जिद पर उतरे- क्यों नहीं ?
मैंने कहा-हमारी उम्र हमारे जीवन की स्थितियाँ...परिस्थितियाँ एक –जैसी नहीं हैं। ये समाज हमारा साथ नहीं देगा।
तुमने कहा-मुझे इसकी परवाह भी नहीं है।
मैंने कहा-पर मुझे है । तुम जानते हो मैं एक विधवा हूँ और मेरा पंद्रह साल का बेटा पूना में पढ़ रहा है।
तुमने कहा-नया क्या है इसमें ...तुम बता चुकी हो यह सब बहुत पहले ही ...तुम्हारा बेटा मेरा बेटा...।
-पर वह तुम्हें कभी स्वीकार नही करेगा । वैसे भी देखने में तुम उसके बड़े भाई ही लगते हो ...आठ साल ही तो उससे बड़े हो ...वह तुम्हें अपने पिता की जगह नहीं देख पाएगा। और यह समाज क्या कहेगा और तुम्हारा परिवार ?वे तो यही समझेंगे कि मैंने तुम्हें फंसा लिया है।
-लोगों को गोली मारो। परिवार, समाज की मुझे चिंता नहीं और बेटे को मैं मना लूँगा ...बस तुम हाँ कह दो...मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। वैसे भी हम सिर्फ साथ रहने वाले हैं, विवाह –संस्था में मेरा विश्वास नहीं है।
मैंने कहा-और कल को तुम बदल गए तो ...।
-सादे कागज पर लिखवा लो सब कुछ..!
मैंने लाख समझाया पर तुम मानने को तैयार नहीं थे! प्यार यह नहीं देखता, प्यार वह नहीं देखता ...मैं घबरा गयी । तुम जिद पर अड़े थे । मैं भी पिघलने लगी थी। तुम मेरे घर आने की डेट फिक्स करके चले गए और मैं घोर धर्म-संकट में फंस गयी।
एक तरफ मैं तुम –सा दोस्त खोना नहीं चाहती थी, दूसरी तरह तुम्हारे साथ लीव इन में रहना मुझे अटपटा लग रहा था। मैं किशोर उम्र की अपरिपक्व लड़की तो थी नहीं तीस साल की अनुभवी स्त्री थी। मैं जानती थी कि तुम ज्यादा दिन समय और समाज की मार को झेल नहीं पाओगे। और मैं अपने बीच के रिश्ते को कोई और नाम नहीं देना चाहती थी पर तुम्हें मना करती भी तो कैसे ?मैं इतनी कठोर नहीं बन पा रही थी कि एक झटके से तुमसे अलग हो जाऊँ और न ही इतनी कमजोर थी कि तुम्हारे आवेग में अपना विवेक भी खो दूँ।
शायद तीन ज़िंदगियों में तूफान आ ही जाता पर इसी बीच मेरा बेटा छुट्टी लेकर घर आ गया। उसे मेरी बहुत याद आ रही थी शायद मेरी परेशानी की तरंगें उस तक पहुँच गईं थीं। वह तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता था और मैं किस मुंह से उसे बताती ?वह क्या सोचता कि उसकी माँ इस उम्र में उससे कुछ साल ही बड़े लड़के के साथ ...छी: सोचने में ही बुरा लग रहा था।
इस बीच तुमसे बात नहीं हो पाई। तुम अपने गाँव गए थे। नियत दिन तुम आए तो मैं घर पर नहीं थी। दरवाजा मेरे बेटे ने खोला। तुम अपने सामने अपने से भी ज्यादा सुंदर युवा लड़के को देखकर चौंक पड़े। मेरे बेटे को तुम नहीं पहचानते थे। वह हाइट पर्सनाल्टी में तुमसे बीस दिखता है। तुम वापस लौट गए।
तुम्हें लगा कि मैंने तुमसे बचने के लिए यह सब जानबूझकर किया है। तुम नाराज हो गए और मुझसे सारे रिश्ते तोड़ लिए। तुमने दूसरे शहर के ब्रांच में अपना ट्रांसफर करा लिया था।
तुम्हारे चले जाने के बाद मुझे लगा कि मैं कितनी गहराई से तुमसे जुड़ी हूँ । मैं छटपटाने लगी ...तुमसे जुड़ी घटनाएँ मुझे याद आ-आकर तड़पाने लगीं । मैंने कई बार तुमसे मिलने की कोशिश की पर तुम नहीं मिले। मैंने एक मित्र से संदेश भेजा तो उससे तुमने मुझे –बहती गंगा और बाजारू कह दिया। साथ ही मेरी उम्र का ताना देकर कहा कि मुझे नए लड़कों का शौक है।
छि: अदा, तुमने यह क्या कह दिया ?तुम्हारा प्यार घृणा में क्यों बदल गया ...तुमने मुझे गाली दी ...विश्वास नहीं होता ...। काश मैं वैसी ही होती जैसा तुमने कहा था, तो शायद मुझे इतना दुख न होता। सदा, क्या तुम नहीं जानते कि किसी स्त्री का इमेज बिगाड़ना उसकी हत्या से ज्यादा खतरनाक है और तुम किसे बुरा कह रहे थे जिसने तुम्हें इतना स्नेह दिया।
वह तुम ही न थे, जो कहते थे कि मैं अपना अतीत किसी को न बताऊँ और उसे भूल जाऊँ और आज तुम ही सभी से मेरा अतीत बताते फिर रहे हो।
वह तुम ही न थे, जो खुद को बड़ा कहने पर रूठ जाते थे और आज तुम ही मेरी उम्र की खिल्ली उड़ा रहे हो।
कितना अजीब है न यह सब। सदा, मैंने तो तुमसे कभी कुछ नहीं छिपाया था। यह भी कि दस साल पहले मेरा एक घोंसला था, जिसमें मेरा एक छोटा-सा सुखी परिवार रहता था पर बदकिस्मती की आँधी ने एक दिन घोंसले के एक-एक तिनके को बिखेर कर रख दिया और अभागी मैं अपने अभिशप्त जीवन को जीने के लिए बच गयी। एक-एक दिन किस तरह मर-मरकर गुजारा होगा मैंने । समाज में बिलकुल अकेली, जवान और सुंदर स्त्री ...। गिद्ध नोचने को तैयार, भाई-बंधु सबके सब स्वार्थी। किस तरह लड़ाई लड़ी होगी मैंने जिंदगी की। दस साल कम नहीं होते। वक्त ने सारे जख्मों को भर दिया था। तभी तुम आए ...जख्मों के निशान भी मिट गए।
पर मुझे क्या पता था कि तुम मेरे जख्मों को इसलिए देख रहे थे कि जान सको कि वे कहाँ-कहाँ से खुल सकते हैं और आज तुमने मेरे सारे जख्मों को कुरेद डाला है । सारे जख्म हरे हो गए हैं ...टीसने लगे हैं ...गड़े मुरदे जिंदा होकर अपनी कथा कहने लगे हैं। काश, तुम सोच सकते कि तुमने क्या किया है ?सदा तुमने मेरी भावनाओं का सुराख़ कर उनका सार्वजनिक परचम बनाया है। आखिर तुमने ऐसा क्यों किया सदा क्यों ?बाद में मुझे पता चला कि हम दोनों को दूर करने में आफिस के बॉस का हाथ है। उसने ही तुम्हें भड़काया। मेरे बारे में तमाम उल्टे-सीधे किस्से सुनाए यहाँ तक कि उसने यह भी कह दिया कि मेरा उसके साथ भी ...। छि:, सदा तुम ये सब कैसे सुन सके !तुम तो इतने दिनों से मुझे जान रहे थे और मेरे बारे में बॉस से ज्यादा जानते थे। बॉस तो मेरे अतीत के बारे में अटकले ही लगा सकता था, पर तुम तो सच्चाई जानते थे फिर तुमने मुझपर विश्वास क्यों नहीं किया ?उसने तुम्हें दूसरे शहर भेजकर मेरा शिकार करना चाहा, पर मैंने उसकी नौकरी ही छोड़ दी। तुम्हारे जाने के बाद मुझ पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा...हर तरह की दिक्कतें उठानी पड़ीं। तुम्हारे मित्र तक मेरा लाभ लेने की कोशिश में लगे रहे ...मैंने सबका सामना किया पर तुम्हारे आरोप ने मुझे बहुत चोट पहुंचाई है सदा।
मैं तुम्हें यह देह न सौंप सकी ...यही अपराध है मेरा। क्या स्त्री पुरुष में सिर्फ मित्रता नहीं हो सकती सदा !

