Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Inspirational


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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दो जून का भोजन ..

दो जून का भोजन ..

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स्कूल में कक्षा 7 एवं 8 में नारायण, मेरे साथ पढ़ा था। फिर उसके पिता की मृत्यु हो गई, उसका पढ़ना छूट गया था।

तब पता चला था कि उसके पिताजी ज्यादा जमा पूँजी नहीं छोड़ गए थे। माँ और एक छोटी बहन के उदर पोषण के लिए उसका कमाना जरूरी हो गया था। उसने मेहनत से कमाना शुरू किया था। वह, सबेरे दो घंटे अखबार बाँटता, फिर दिन में एक पंचर बनाने वाले के सहायक की तरह काम करता था। 

मैं उसे ऐसा करते अक्सर देखता था। छोटी ही उम्र में उस पर आई जिम्मेदारी से मुझे, उससे अत्यंत सहानुभूति होती थी।

कभी कभी उससे मिलना होता तो, स्कूल के लिए मम्मी का लगाया अपना टिफिन, मैं उससे शेयर करता था। मैं, इतनी आत्मीयता से खिलाता कि मेरे साथ खाने में, उसे झिझक नहीं होती थी। उसे तन्मय हो, स्वाद ले लेकर, खाते देखता तो मुझे बड़ी संतुष्टि मिलती थी।

दो साल मैं उस कस्बे में, और पढ़ा था। फिर पापा की बदली हो गई थी। नए शहर में बड़ी क्लासेज और फिर कॉलेज में पढ़ते हुए, अध्ययन को ज्यादा समय देने से, इधर उधर की बातों पर ध्यान देने का, मुझे समय नहीं मिलता। ऐसे में मैं नारायण को भूल गया था।

फिर 15 साल समय व्यतीत हो गया।

कल, अन-लॉक-1 घोषित होने के बाद, बंद पड़ी अपनी फैक्ट्री फिर चालू करने के विचार से मैं, फैक्ट्री गया था। मेरे आठ श्रमिकों में से 2 ही बचे थे। बाकी 6 अपने परिवारों सहित, अपने गृह ग्राम लौट गए थे।

मैंने लगभग 70 दिनों से बंद पड़ी फैक्ट्री में, 2 श्रमिकों से साफ़ सफाई करवाई थी। फिर अगले दिन से थोड़ा ही काम आरंभ करेंगे, यह तय कर दोपहर कार से लौट रहा था। मन में चिंता यह चल रही थी कि बाकी श्रमिक कैसे और कब मिल सकेंगे।

मैं चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल, हरा होने का इंतज़ार कर रहा था। तब मेरी दृष्टि बाजू से गुजर रहे, व्यक्ति पर गई। यद्यपि उसके मुख पर मॉस्क था तो भी, मुझे लगा यह नारायण है। मैंने डोर का शीशा गिरा कर, कन्फर्म करने के लिए, दो बार नारायण नाम पुकारा।

दूसरी बार पुकारे जाने के बाद, वह व्यक्ति रुका था। मैंने हाथ हिलाया तो उसकी आँखों में, मुझे पहचान लिए जाने के भाव दिखे। ट्रैफिक बत्ती, हरी होने ही वाली थी। अतः मैंने इशारे से उसे, आने कहा और साइड वाला डोर खोल दिया। वह साथ वाली सीट पर आ, बैठ गया था। मैंने, कार आगे बढ़ाई एवं आगे की पार्किंग में ले जा कर, कार खड़ी कर दी।

फिर उससे यूँ अचानक मिलने की ख़ुशी जताई। हँसते हुए, उससे हाल चाल पूछे।

नारायण ने बताया - पिछले छह वर्षों से, मैं इस महानगर में रह रहा हूँ। एक स्टील इंडस्ट्री में काम करता हूँ। अपनी बचत से, छोटी बहन का विवाह करवा दिया है। वह अपने ससुराल में खुश है। इस तरह एक बड़ी जिम्मेदारी मैंने निभा दी है। अब माँ के साथ एक कमरे में रहता हूँ। 

सत्तर दिनों से इंडस्ट्री बंद है। जमा किये बहुत से रूपये, इन दिनों खर्च हो गए हैं।

सरकार के आदेश होने पर भी, इंडस्ट्री मैनेजमेंट ने इन दिनों का, वेतन नहीं दिया है, अतः मन खट्टा है। अब आज से पुनः खुल रही, उस इंडस्ट्री में मैं फिर काम नहीं करना चाहता। मैं, दूसरे काम की खोज में निकला हूँ। 

 यह सुन मैं, मन ही मन शर्मिंदा हो रहा था। सोच रहा था कि मैंने भी, अपने श्रमिकों को बंद की अवधि में, आधा ही सही, वेतन दिया होता तो वे अपने गाँव नहीं लौटे होते और आज मुझे, श्रमिक समस्या नहीं हो रही होती। 

झेंप छुपाते हुए, मैंने प्रकट में कहा- हाँ, नारायण, प्रधानमंत्री के आह्वान पर देशवासियों ने, अपनी अपनी मानवता का परिचय दिया होता तो, देश में यूँ अफरा तफरी का वातावरण नहीं बनता।

फिर आदेशात्मक स्वर में कहा- नारायण, अभी लंच तुम मेरे साथ करोगे। साथ ही मैंने अपनी रईसी दिखाने को कहा- चलो आज मैं, तुम्हें फाइव स्टार में लंच करवाता हूँ। 

नारायण ने कहा - तुम्हारी भावना का आभार, मैं लंच तुम्हारे साथ लेने तैयार हूँ मगर किसी सस्ते रेस्टारेंट में, लेना पसंद करूँगा। 

मैंने कहा- नारायण छोड़ो यह झिझक, आज तुम्हें, यह पुराना मित्र, मजे करवाना चाहता है।

उसने जवाब दिया - यह मेरी झिझक नहीं है अपितु सिद्धांत है, जो मुझे बताता है कि बुरे दिनों में मिली सहायता से मजे नहीं बल्कि मूलभूत जरूरतों की पूर्ति करना उचित होता है। अतः मेरी भूख के समय, उदर पूर्ति के लिए तुम, मुझे सादा भोजन करवा दो। 

कुछ पल मैं उसका मुहँ ही देखता रह गया, सोचने लगा यह कम पढ़ा लिखा व्यक्ति तो, इंसान बचा रह गया। मैं पढ़ा लिखा रईस, खुद में ख़ुदा का भ्रम पाल कर, ना तो ख़ुदा हो सका और ना ही इंसान रह गया हूँ। 

फिर उसकी मर्जी अनुसार मैं उसे एक साधारण भोजनालय में ले आया और हम साथ, थालियों में दिया गया, भोजन ग्रहण करने लगे। खाते हुए मैंने, उसे अपनी फैक्ट्री में काम का प्रस्ताव किया। उसने सहर्ष मान लिया। मैंने कहा- मैं तुम्हारे लिए वेतन निर्धारित नहीं करूँगा अपितु, तुम्हें यह विशेषाधिकार रहेगा कि तुम मासिक रूप से जितनी चाहो राशि, स्वयं के लिए आहरित करो। ठीक उस तरह से, जैसे फैक्ट्री तुम्हारी ही है।

उसने यह मंज़ूर कर लिया।

यह कहते हुए मुझे विश्वास है कि नारायण न्यायसंगत राशि ही लिया करेगा और तब, मुझे यह प्रतीत होने लगा कि नारायण के आने से फैक्ट्री के जरिये इसमें आय दोगुनी हो जायेगी ...



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