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Kumar Vikrant

Comedy


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दद्दा का गद्दा

दद्दा का गद्दा

5 mins 101 5 mins 101


"क्यों बे कहाँ चले आ रहे हो मुँह उठाये?" पुस्तक प्रसाद ने मोबाइल दास और इंटरनेट चंद को अपनी दालान की और आते देख गुर्रा कर पूछा।

"तमीज से बात करो दद्दा; अब ये साहित्य रूपी गद्दा जिसपे तुम मुद्द्त से जमे हो छोड़ दो; अब मैं इसपर इंटरनेट चंद के साथ बैठूंगा।" मोबाइल दास पूरी बेअदबी के साथ गुर्रा कर बोला।

"अबे फर्जी लाइक, कमेंट, कॉपी, पेस्ट, चोरी-चकारी, ट्रोलिंग के दम पर इस फर्जी साहित्य की दुकान चलाने वालो तुम्हारी औकात नहीं जो मुझे इस गद्दे से हटा सको; जिन पैरो से चलकर आये हो उन्ही पैरो से वापिस चले जाओ नहीं तो अच्छा नहीं होगा।" पुस्तक प्रसाद आग बबूला होता हुआ बोला।

"दद्दा मुँह न खुलवाओ तुम और तुम्हारा गद्दा मुद्द्तो से पुस्तकालयों की धूल चाट रहा था न कोई पढ़ने वाला न कोई खरीदने वाला, अब कम से कम लोग मेरे जरिये साहित्य पढ़ भी रहे है और रच भी रहे है।" मोबाइल दास पूरे अभिमान के साथ बोला।

"अबे देखा है तुम्हारा साहित्य भी मैंने, कोई फर्जी साहित्यकार चार द्विअर्थी लाइन लिख कर पोस्ट कर दे और फिर देखो उसके साहित्यिक मित्रों की फौज कैसे चाटुकारिता करती है उस द्विअर्थी पोस्ट के महान रचियता की.......कोई सवाल कर दे तो जवाब- अरे इतना तो चलता है। अबे लानत है ऐसा लिखने वाले पर और धिक्कार है, 'इतना तो चलता है,' कहने वालो की सोच पर; क्योंकि वही तो इस द्विअर्थी साहित्य को बढ़ावा दे रहे है । अबे ऐसी की तैसी कर के रख दी तुम लोगों ने साहित्य की........चल अब बकवास न कर दफा हो जा यहाँ से।" पुस्तक प्रसाद अपना जूता हाथ में लेते हुए बोला।

"दद्दा जूते का ताव न दिखाओ जूता मेरे पास भी है, और मैं ये भी जानता हूँ किस तरह तुम्हारे निर्माता सेल्फ पब्लिशिंग के नाम पर बेचारे लेखकों से मोटी उजरत वसूल के कुछ सौ किताबें छाप कर या तो ऑनलाइन पोर्टल पर पटक देते है तक़दीर हुई तो एक आध बिक भी जाती है या उन लेखकों के सिर पर पटक देते है और कह देते है- ले बेच ले बेटा। अब वो लेखक भी तमाम तिकड़म चल कर अपनी पुस्तक बेचने के चक्कर में लग जाते है और भिड़ा देते है कुछ अक्ल के अन्धो और गांठ के पूरो को। यही है साहित्य सृजन……….? लूट का अड्डा बना रखा इस गद्दे को तुम्हारे आकाओ ने।" मोबाईल दास गुर्रा कर अपना जूता हाथ में लेकर बोला।

"अबे ये क्या जूतपतरम चल रही है यहाँ……...? कहते हुए पुस्तक प्रसाद का चेला कलम दास भी वहाँ आ धमका।

"चुप कर बे बिना स्याही के कलम दास, दो बड़े बात कर रहे तू चुप बैठ जा।" इंटरनेट चंद भी ताव में आता हुआ बोला।

"अबे इंटरनेट के बच्चे थोड़ा कम ताव में आ कही तुम्हारे आका मोबाईल दास की बैटरी चूक गई तो यही पड़े रहोगे मुर्दो की तरह।" कलम दास पुस्तक प्रसाद के बगल में बैठता हुआ बोला।

"अबे जुबान पर लगाम दो हम ही बात कर ले अभी......." पुस्तक प्रसाद और मोबाइल दास एक ही सुर में कलम दास और इंटरनेट चंद को डांटते हुए बोले।

"अबे कोई पब्लिशर नहीं जा रहा किसी लेखक की जेब से पैसा निकालने। तुम देखो तुम्हारी मेहरबानी से कैसे अंट-शंट नाम के अखबारों ने बेचारे साहित्यकारों से वार्षिक शुल्क वसूल कर उनकी रचनाएं छापने का धंधा चला रखा है.......ये साहित्य सेवा कर रहे हो तुम? अबे हम तो इतना दिल भी रखते है कि अगर लेखक की पुस्तकें उसके अच्छे लेखन की वजह से बिक जाती है तो हम उन्हें तय की गई रॉयल्टी की रकम भी दे देते है।" पुस्तक प्रसाद उपहास भरे स्वर में बोला।

"दद्दा लिमिट क्रॉस मत करो नहीं तो आज तुम्हे तुम्हारे गद्दे सहित दफन कर दिया जायेगा, अबे इंटरनेट चंद चल खोद एक कब्र अभी ले के आता हूँ इस पुस्तक प्रसाद को कब्र में दफ़नाने के लिए........." मोबाईल दास हुंकार भरते हुए बोला।

"अबे धमकी देता है.......कौन डरता है तेरी धमकी से.........आजा आज तुझे देख ही लेता हूँ........." पुस्तक प्रसाद ने कलम दास को भाले की तरह लेते हुए बोला।

उसके बाद जो जंग हुई वो देखने लायक थी। पुस्तक प्रसाद ने कलम दास रूपी भाले से मोबाईल दास की स्क्रीन पर स्क्रेच दाल दिए और मोबाइल दास ने पुस्तक प्रसाद का कवर फाड़ डाला और कुछ पेज भी फाड़ दिए उसके बाद उसे धकेलते हुए इंटरनेट चंद द्वारा खोदी कब्र तक ले आया और इंटरनेट चंद की मदद से उसने पुस्तक प्रसाद को उस कब्र में धक्का दे दिया।

"चल बे इंटरनेट चंद चल मिटटी डाल इस कब्र में और जिंदा दफन कर दे इस पुस्तक प्रसाद और कलम दास को।" मोबाईल दास थकावट की वजह से हांफ़ता हुआ बोला।

"जो हुक्म मेरे आका........" कहते हुए इंटरनेट चंद कब्र की और बढ़ा लेकिन तभी मोबाईल दास उसकी बैटरी खत्म होने की वजह से भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। उसका ये हाल देख इंटरनेट चंद चिल्ला कर बोला, "हिम्मत न हार अभी पॉवरबैंक लेकर आता हूँ।

तब तक थका हुआ पुस्तक प्रसाद भी कलम दास के साथ कब्र से निकल आया और अपनी दालान की और बढ़ चला लेकिन थकावट इतनी थी कि वो भी भरभरा कर मोबाईल दास की बगल में गिर कर बेहोश हो गया।

दस मिनट बाद जब पुस्तक प्रसाद की आँख खुली तो मोबाईल दास भी पावर बैंक के दम पर सांस लेने लगा था।

"दद्दा वो गद्दा मुझे दे दो......" मोबाईल दास रिरिया कर बोला लेकिन अब उसकी आवाज में पहले वाला आत्म्विश्वास न था।

"नहीं........" पुस्तक प्रसाद थके स्वर में बोला लेकिन आत्मविश्वास तो उसकी आवाज में भी न था क्योकि मोबाईल दास के प्रसार को रोकना उसके बस का न था।

उनकी हालत देख इंटरनेट चंद बोला, "अबे क्यों लड़ते हो तुम दोनों; चलो आज साहित्य के वर्तमान हालात से दो चार कराता हूँ तुम्हे। पुस्तक प्रसाद को घबराने की जरूरत नहीं क्योंकि हमारे देश में आज भी हर वर्ष चार सो से अधिक पुस्तकें छपती है जिसमे सेल्फ पब्लिशिंग वाली बुक्स का बहुत बड़ा हिस्सा है, लेकिन ये पुस्तकें व्याकरण और वर्तनी की अशुद्धि के साथ अर्थ का अनर्थ कर रही है।

और अब सुनो हाल मोबाईल दास के साहित्य का; बहुत से लेखक लेखिकाएँ सोप ओपेरा छाप कहानियां लिखकर और दिन रात औरत मर्द के रिश्ते की बखिया उधेड़ कर सस्ती लोकप्रियता बटोर रहे है, कोई व्याकरण नहीं, कोई विराम चिन्हो की शुद्धि नहीं, सुर न ताला सब बेहाला ही बेहाला।

लेकिन अच्छी खबर ये है कि इस सबके बावजूद अच्छी पुस्तकें भी छप रही हैं और मोबाइल पर भी अच्छी रचनाएँ देखने को मिल रही है, बस इन्हीं खूबियों के सहारे अपने-अपने गद्दों पर जमे रहो, झगड़ो मत और करते रहो साहित्य की सेवा।"

इंटरनेट चंद की बाते सुनकर पुस्तक प्रसाद और मोबाईल दास खिसियानी हंसी हंसने लगे।


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