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दादी सास

दादी सास

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जब से सुना था दादी सास आ रही है मन में बहुत उथल-पुथल चल रही थी कि कैसे मैं घर और ऑफिस दोनों एक साथ संभाल पाऊंँगी। अपनी दादी सास को मैंने अपनी शादी में ही देखा था, लेकिन उनके बारे में हमेशा अपनी सासू मांँ से फ़ोन पर बातें होती रहती थी। दादी सास एक कड़क और बहुत ही अनुशासित महिला थी। घर की सभी महिलाओं के सिर पर पल्लू होना चाहिए, साथ ही घर के सभी पुरुषों के खाने के बाद ही सभी महिलाएँ खा सकती है, कुछ इस तरह के नियम दादी सास के राज में चलता था।

इस विषय में मेरे पतिदेव पहले ही मुझसे निवेदन कर चुके थे-

"यार, कुछ दिन की बात है प्लीज़ संभाल लेना।"

देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिस दिन दादी सास का मेरे घर में आगमन हुआ। मैंने उनके स्वागत में साड़ी के पल्लू को अपने सिर पर डाला और झुक कर उनके पैर छुए।

दादी सास ने मुझे आशीर्वाद देते हुए मेरे सिर से पल्लू हटा दिया फिर मुझसे बोली-

"बेटा, इस औपचारिकता की जरूरत नहीं है जब वक्त इतनी तेजी से बदल रहा है तो थोड़ा हमें भी बदलना चाहिए। आज की देश-दुनिया को देखते हुए अब बेटी के साथ ही बहू को भी खुला आसमान देना चाहिए जिससे वो अपने सपनों की उड़ान भर सके।

यह सुनते ही मैंने दादी मांँ को गले से लगा लिया।


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