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चुनावी मुनादी

चुनावी मुनादी

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रामरती जल्दी चल बाहर पार्टी वाले साड़ी बांटने आए हैं।

रामरती हल्दी मसाले के सने हाथ साड़ी के पल्लू से पोछती हुई दशरथ ‌के पीछे हो ली। बड़ी भीड़ जुटी हुई थी। स्त्री-पुरुष भागम भाग से धूल ऊपर छा रही थी।

क्यों जी हमारा नंबर आयेगा ?

आप भी साथ में रहें ऐसा न हो कोई हमारे हाथ से साड़ी पिछली बार की तरह छीन कर भाग ना जाए।

अरे रामरती ! डरो नहीं देखो दूरदर्शन पर समाचार में जो दिखाई देते हैं वो भी सूंघते हुए आते ही होंगे। इस‌ बार ऐसा कुछ हुआ तो उन्हीं के पास पहुंच जायेंगे। सब बता देना की इधर साड़ी बाँटते हैं और उधर गुंडों से छिनवा लेते हैं।

ऐ जी, सुनो साड़ी ले तो ली हैं, लेकिन पार्टी वाले वोट के लिए भी बोल रहे हैं हमे किसे देना चाहिए ? पिछले दिनों साइकिल बटी थी आज साड़ी बटी रही हैं। परसों कुछ और बटेगा किस किस को वोट देंगे।

तुम बुरवक चुप रहो अभी मुंह मत खोलो नहीं तो समझो साड़ी हाथ से गई ।

वोट का समय आयेगा तब सोचेंगे किसे दे किसे ना दे।

हमारी जिंदगी में तो इलेक्शन ही त्योहार है। इसी समय कुछ मिल जाता है वर्ना कोई नहीं पूछता। पाँच साल तक मध्यावधी चुनाव हो जाए तो समझो बोनस मिल गया। हम मर्द लोग थोड़ा पीने पिलाने को साथ में सभा में ताली बजाने का और माला पहनाने का पैमेंट मिल जाता है।

माइक वाले से दूर ही रहना मीठा मीठा बोल कर, ना जाने टी वी पर क्या क्या चला देता है ?

रामरती हमरी प्यारी हमें तो आप ने काम से काम रखना है, आँख से न देखो ना कान से सुनो, न‌ मुंह से कुछ बोलो अपने राम की तो ...ना काऊ से दोस्ती ना काऊ से बैर........


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