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Prabodh Govil

Classics

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Prabodh Govil

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चोर निकल कर भागा

चोर निकल कर भागा

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"चोर निकल कर भागा"- प्रबोध कुमार गोविल
मैंने रिसेप्शन पर पुरानी चाबी लौटा कर नई मिली चाबी का छल्ला अंगुलियों में घुमाया ही था कि वो आ गया।
काउंटर पर मैनेजर और उसके इर्द - गिर्द दो चार कस्टमर्स होने के कारण वो मुझसे सीधे कुछ पूछ तो नहीं सका लेकिन आंखों में एक खूंखार सा खालीपन लिए हुए वो चुपचाप फर्श साफ़ करता रहा जिसका आदेश उसे अभी - अभी मैनेजर ने दिया था।
उसकी खाली वीरान सी आंखों में उपेक्षा का एक ऐसा बौखलाया सा भाव था मानो कह रहा हो - बस, डर गए? अरे, डर के आगे ही जीत है।
दरअसल, मैं उस होटल में दो दिन पहले ही आया था। आते ही मैंने जो कमरा लिया, उसे आज सुबह ही बदल कर मैं दूसरे कमरे में आ गया था। यही बात उस लड़के को नागवार गुजरी थी।
दो दिन पहले जब रात भर की रेल यात्रा के बाद हारा- थका मैं इस साधारण से होटल में पहुंचा तब काउंटर पर कोई नहीं था। यही लड़का काउंटर पर खड़ा था। उम्र कम थी और लड़का देखने में काफ़ी युवा और आकर्षक सा था। मेरे पूछने पर बोला - मैं मैनेजर साहब को बुलाता हूं, कमरा वही देंगे।
लड़का जाते- जाते कुछ अजीब सी नज़रों से मुझे देख रहा था। उसके इस तरह देखने से मैं कुछ सकपका गया।
लड़का कुछ पल ठहर कर मेरे एकदम पास आ गया और फुसफुसा कर मिन्नत सी करते हुए बोला - सर, आप कमरा नंबर 101 ही मांगना। मैनेजर पहले कुछ आनाकानी करेगा, पर आप ज़ोर दोगे तो मान जाएगा। कह कर वो मैनेजर को ढूंढने चला गया।
मैं उससे यह भी नहीं पूछ सका कि उस कमरे में खास ऐसा क्या है? और मुझे क्या पड़ी है कि उसके मना करने पर भी मैं वही कमरा मांगूं। वो मुझसे पूछेगा नहीं कि मैं वहीं क्यों रहना चाहता हूं?
लेकिन जब मुझे एक बार कहते ही वही कमरा एलॉट हो गया और मेरा सामान उठा कर लड़का आगे - आगे उत्साहित सा होकर मुझे रास्ता दिखाता हुआ मेरे साथ आया तो वो मुझसे खुल कर किसी पुराने परिचित या दोस्त की तरह बात करने लगा। उसने मुझे बताया कि यह कमरा पिछवाड़े में बिल्कुल एकांत में है और आख़िरी छोर पर होने के कारण वहां अजनबियों की आवाजाही न के बराबर ही रहती है।
मुझे कुछ अजीब सा लगा। आख़िर चाहता क्या है ये लड़का? मैं उदासीन सा उसके पीछे- पीछे चलता रहा।
कमरे में मेरा सामान रखवा कर उसने मुस्तैदी से बिस्तर पर बिछी चादर को ठीक- ठाक किया, पानी के जग में दोबारा पानी भर के लाकर रखा, मुझसे चाय के लिए पूछा फ़िर बोला - सर इस कमरे का गीजर ख़राब है, पानी गरम नहीं होता, आपको नहाने के लिए जब भी पानी की ज़रूरत हो तब मुझे बता देना, मैं बाल्टी में भर के पानी लाकर दे दूंगा।
मैं उसकी शक्ल देखने लगा फ़िर हंस कर बोला - फ़िर तूने मुझे बेकार में ही ये कमरा क्यों दिलवा दिया?
वह कुछ न बोला, चुपचाप चाय लेने चला गया। मैं भी जूते उतार कर आराम से कुर्सी पर बैठ गया।
मैंने सोचा, एक कप चाय पी लूं, तब आराम से कपड़े बदल कर बैठूंगा।
कुछ ही देर में वह चाय का कप एक ट्रे में उठाए आ पहुंचा।
तब तक मैंने कमरे का कुछ मुआयना सा कर डाला था। मुझे कमरे में ऐसी कोई खासियत नज़र नहीं आई जिसके कारण इसी कमरे को लेने की सिफ़ारिश उस लड़के ने मुझसे की थी। जबकि होटल का सन्नाटा बता रहा था कि अभी यहां कई कमरे खाली होंगे।
मैंने चाय का प्याला उठा कर उससे कहा - कमरे में टीवी नहीं है क्या? दीवार पर निशान तो बना हुआ है, इधर - उधर कनेक्शन के तार भी झूल रहे हैं।
लड़का शांति से बोला - टीवी खराब हो गया था इसलिए हटा दिया। आप कहोगे तो पीछे स्टोर रूम से दूसरा लाकर लगा दूंगा।
मैंने पूछा - बाकी कमरे भी टीवी के बिना ही हैं क्या?
- नहीं सर, बाकी कमरों में तो सब में टीवी है। वह बोला।
मैंने बौखला कर पूछा - फ़िर क्या इस कमरे का किराया कुछ कम है बाकी कमरों से?
- नहीं - नहीं, किराया तो सभी का बराबर है। लड़का तपाक से बोला।
अब मुझसे रहा नहीं गया। मैं झुंझला कर बोला - तू पागल है क्या? फ़िर ये कमरा मुझे दिलवा क्यों दिया?
वो वैसे ही सपाट सा चेहरा लिए खड़ा रहा।
रात को जब मैं सोने लगा तो मेरे दिमाग़ में एक हल्की सी कौंध हुई। मन ही मन मैं सोचने लगा कि उस लड़के ने मुझे यही कमरा लेने की पेशकश क्या सोच कर की थी, ज़रूर इसमें कोई राज है। क्या कारण हो सकता है?
लड़के ने जिस तरह मुझे ये कमरा लेने के लिए उकसाया था और मेरे यहां आते ही वह जिस तरह उत्साहित होकर खुश हो गया था उससे तो यही लगता है कि इस कमरे में कोई न कोई विशेष सेवा ज़रूर दी जाती होगी।
लड़का कैसे कह रहा था कि यह एकांत में है, यहां कोई अजनबी आता- जाता नहीं... तो क्या लड़का इसीलिए मुझे यहां लाना चाहता था?
हो सकता है कि लड़के को इससे कोई कमीशन मिलता हो। क्या वो खूबसूरत भोला सा लड़का किसी औरत का दलाल है? क्या किसी संपन्न सुंदरी ने जिस्म की तिजारत करने के लिए यह अड्डा बना रखा है और लड़के को उसमें अपना हिस्सेदार दलाल बना रखा है?
यदि ऐसी कोई औरत है तो वह ज़रूर संपन्न और शातिर तो होगी ही। क्योंकि मजबूरी में बदन बेचने वाली कोई ग़रीब औरत इस तरह शान से दलाल तो नहीं ही रखेगी। यह काम तो किसी शौकीन धंधेबाज का ही हो सकता है।
मेरा मन हुआ कि इस बारे में सीधे ही लड़के से कुछ पूछूं। कमरे में रूमबॉय को बुलाने के लिए घंटी तो थी ही, साथ ही उस लड़के ने मुझे अपना मोबाइल नंबर भी दे दिया था कि कोई काम हो तो मैं उसे बुला लूं।
मैंने एक बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी में समय देखा। दस बजने वाले थे। कुछ देर तो ज़रूर हो चली थी मगर ऐसे कामों के लिए तो ये सूर्योदय ही था। ऐसे धंधे दिन की चहल - पहल में तो परवान चढ़ते नहीं।
लड़के ने यह भी कहा था कि इस कमरे से ज़रा आगे एक पुरानी छत पर बनी छोटी सी कोठरी में ही वह रहता भी है। हो सकता है कि अपनी ड्यूटी ख़त्म करके अब वह वहां आ भी गया हो।
मान लो, सच में किसी लड़की को ही यहां लाने की बात होगी तो रास्ता तो और कोई है नहीं। लड़की कैसे आती होगी? रिसेप्शन के पास सीढ़ियों या लिफ्ट से आने में कोई न कोई रिसेप्शन पर बैठा कर्मचारी या फ़िर कस्टमर उसे देख भी सकता है। पिछवाड़े से और कोई ख़ुफ़िया रास्ता तो दिखता नहीं।
क्या लड़का ढक - छिपा कर उसे यहां लाता होगा? ये भी तो हो सकता है कि रिसेप्शन पर ड्यूटी पर रहने वाले आदमी की जानकारी और सहमति से ही सारा कारोबार होता हो। वह भी इस कमाई में हिस्सेदार हो। उसने भी तो कैसे एक बार ही मांगने पर मुझे फ़ौरन कमरा दे दिया था।
मुझे याद आया कि एक बार मध्य प्रदेश की एक लॉज में रुकते समय मैंने गलियारे में कुछ लोगों को अजीबो- गरीब लिबास में स्कार्फ से चेहरे ढके हुए आते - जाते हुए देखा था, जिनके बारे में मुझे बाद में किसी अन्य मुसाफ़िर से पता चला था कि वो अनैतिक काम के लिए वहां आने वाली लड़कियां ही थीं। कहीं- कहीं स्पा या मसाज के लिए कमरों में आने वाले लोग भी इस तरह आते थे।
इतना तो तय था कि इस होटल में आम तौर पर खुले रूप से तो इस तरह का कारोबार नहीं होता होगा। यदि ऐसा होता तो लड़का ख़ुफ़िया तरीके से इस एक ही कमरे को लेने की बात क्यों करता।
मुझे लगा, यहीं, इसी कमरे में दाल में कुछ काला है।
क्या मैं कमरे से निकल कर लड़के की कोठरी तक जाऊं या फिर फ़ोन करके उसे ही यहां बुला लूं? क्योंकि कॉलबैल बजाने से तो उसकी जगह कोई दूसरा लड़का भी आ सकता है। उससे क्या कहूंगा?
लेकिन मेरे मन में एक खलबली और शुरू हो गई। पहले ये तो तय करूं कि क्या सचमुच में मुझे आधी रात को इस अजनबी शहर में कोई ऐसी सेवा लेनी भी है या नहीं? या महज़ लड़के की बात की सच्चाई जानने के मकसद से ही मैं उसे बुला रहा हूं।
यदि इतनी रात को उसे यहां बुला कर मैंने उससे ऐसी कोई बात नहीं की तो वह क्या समझेगा? पूछेगा कि क्यों बुलाया।
पर अगर बात की और जैसा कि मैं सोच रहा हूं, वो किसी लड़की का जानकार न निकला तो वो क्या सोचेगा?
कुछ भी हो, आख़िर उसे मुझे ये तो बताना ही चाहिए कि उसने मुझे ज़ोर देकर इस कमरे में आने पर क्यों विवश किया।
लेकिन ये सब तो मैं बाद में उसे दिन में भी पूछ सकता हूं। या फ़िर आज ही दिन में पूछ लेता।
अब इतनी रात को अकेले में एक अंजान से किशोर लड़के से इस तरह की बात करने से कोई संकट न खड़ा हो जाए। वो जाकर मैनेजर से कह दे। आधी रात को नाहक बात का बतंगड़ बन जाए।
मैं वापस अपने बिस्तर की ओर लौटने लगा।
लेकिन अभी मैंने एक पैर बिस्तर पर रख ओढ़ने की चादर खोलने की कोशिश ही की थी कि मन में फ़िर से एक लहर सी उठी।
आख़िर इतना डरने की क्या ज़रूरत है? सुख और आनंद की भी तो कुछ कीमत होती ही है। यदि सच में लड़के की मदद से ऐसी कोई बात बन गई तो मेरी रात बन जाएगी। मेरी लॉटरी लग जाएगी। मुझे शिद्दत से लगने लगा - ये रात फ़िर न आएगी।
मुझे कल्पना में वो भोला - भाला किशोर लड़का किसी देवता सा लगने लगा जो मानो मासूमियत से मुझसे कह रहा हो - बच्चा, मैं क्या करूं तूने कोई वरदान मांगा ही नहीं!!! चांदनी रात तेरी "खामरात" बन गई।
वैसे मैं ऐसी किसी हरकत का आदी कभी नहीं रहा था न ही मैंने इस तरह कभी किसी बाजारू लड़की से संपर्क किया था, केवल दोस्तों से सुनता ज़रूर रहा था कि होटलों में इस तरह के धंधे होते हैं। अतः  ये मौका मिलते ही इतना लगता था कि बहती गंगा में हाथ धोने में क्या हर्ज़ है। ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा... इसमें क्या है, क्या नहीं, कम से कम देखा तो जाए।
नहीं - नहीं, मुझे संकोच छोड़ कर उस लड़के के पास जाना ही चाहिए। ज़रूर वो मेरे कहने पर ऐसा कोई खुफिया बंदोबस्त कर देगा जिसमें मुझे सुख मिले और उसे कमीशन।
आख़िर वो कोई मंदिर में बैठा भक्त नहीं, होटल में काम कर रहा मुलाज़िम है। ये सब उसके रोज़गार का हिस्सा है।
इस कल्पना से ही मेरे तन- बदन में राग बजने लगे।
मैं फ़िर बिस्तर से कूद कर स्लीपर पहनने लगा।
एक क्षण के लिए मैंने सोचा - क्या मुझे रात के इस प्रहर में होटल के अपने कमरे से बाहर निकल कर कुछ दूर तक जाने के लिए अपने रात को पहनने के कपड़े बदल कर सलीके के औपचारिक वस्त्र पहनने चाहिएं? फ़िर तत्काल ही मेरे मन ने समाधान किया, इसकी कोई ज़रूरत नहीं।
दिन और रात तो कुदरत का सुभीता है, हमें तो अपने शरीर का आराम देखना चाहिए। इतना औपचारिक होने की कोई ज़रूरत नहीं है।
फ़िर मैं कोई घोड़ी चढ़ने थोड़े ही जा रहा था जो अपना पहनावा देखूं। बस एक बार उस लड़के को टटोल कर देखना था कि कुछ कर सकता हो तो कर दे, मुझे एकांत में कमरा क्यों दिलवाया है! इसका कुछ तो लाभ हो।
मन में हल्का सा भय ये भी था कि न जाने वो किस को पकड़ कर ले आए।  ऐसी लड़की से कहीं किसी रोग - बीमारी की चपेट में न आ जाऊं।
लेकिन कहते हैं कि सपना और हक़ीक़त जब आपस में लड़ते हैं तो जीत हक़ीक़त की ही होती है। वो सपने की गर्दन मरोड़ देती है। मुझे भी लगा कि हारी- बीमारी कौन सी लाइलाज है आजकल? एक बार देखें तो सही, रातों को गुलज़ार करने वाला ये कारोबार चलता कैसे है।
क्या आदमी बीमारी के डर से जीना छोड़ दे? बीमारी तो कहीं भी, कैसे भी आ सकती है।
मैं किसी विद्युत आवेशित रोबोट सा उस लड़के को ढूंढने की ठान कर उठा।
कमरे से निकल कर इधर - उधर झांका।
देखा, सामने के लंबे गलियारे से उनींदा सा वही लड़का चला आ रहा था। लेकिन इस समय उससे बात कर पाना मुमकिन नहीं था क्योंकि वो किसी दूसरे कस्टमर को लेकर उनका सामान उठाए नज़दीक के एक कमरे की ओर बढ़ा चला आ रहा था।
मैं सकपका कर पीछे हट गया क्योंकि वह मेरे कमरे से थोड़ी ही दूरी पर अपने नए कस्टमर को छोड़ रहा था और कस्टमर भी एक अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार था - मियां, बीवी और दो बच्चे। थोड़ा बड़ा लड़का और ठुमक- ठुमक कर संग चलती छोटी सी लड़की, उसकी बहन।
पल भर में ही वातावरण घरेलू सा हो गया। शायद लड़का उनका सामान रखवा कर वापस नीचे लौट गया। जब तक बच्चों के माता- पिता कमरे का मुआयना करते हुए कमरे में कुछ व्यवस्थित हुए तब तक दोनों भाई- बहन भी एक दूसरे के आगे- पीछे भागते गलियारे में दौड़ लगाते रहे।
मैं भी अपने दिमाग़ के फितूर को ख़ारिज कर के वापस अपने बिस्तर में आ लेटा।
मैंने दरवाज़ा और बत्ती, दोनों को बंद किया और चादर ओढ़ कर लमलेट हो गया। मेरी रात मेरी नींद के साथ अगले सवेरे के सफ़र पर निकल पड़ी। जल्दी ही मुझे नींद आ गई।
सवेरे मेरी आँख दरवाज़े पर हुई दस्तक से खुली।
वही लड़का था, ट्रे में चाय का कप लेकर हाज़िर हुआ था। उसी ने बताया कि मैं काफ़ी गहरी नींद में था। दो बार घंटी बजाने पर भी जब दरवाज़ा नहीं खुला तो उसने हाथ से दरवाज़ा खटखटाया।
जैसे ही मैंने चाय का प्याला उससे लिया वो बोल पड़ा - नहाने को गरम पानी ले आऊं साहब?
मैंने उसकी ओर देखा, सोचा अजीब लड़का है, अभी आँख भी ढंग से खुली नहीं कि नहाने की बात कर रहा है।
मैंने अपना लहज़ा कुछ सख़्त करके उससे पूछा - क्यों रे, तूने मुझे ये ही कमरा क्यों दिलवाया?
मेरे सीधे पूछते ही शायद उसे किसी बहानेबाज़ी का मौक़ा नहीं मिला। उसे सच बोलना ही पड़ा। वह कुछ घबराते हुए बोला - साहब, इस कमरे का गीजर ख़राब है न, तो मुझे नीचे से गरम पानी भर कर लाने पर होटल से बीस रुपया रोज़ एक्स्ट्रा मिलता है।
कह कर वह तो चुप हो गया पर मेरी इच्छा हुई कि पास की दीवार पर अपना सिर फोड़ लूं।
मैं ज़ोर से चिल्लाया - चल भाग यहां से, नहीं नहाना मुझे!!!
इतना कह कर मैं चाय का प्याला आधा ही छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और कमरा बदलने के लिए अपने कपड़े समेटता हुआ अपना सूटकेस उठाकर गलियारे की ओर दौड़ा। मेरे पीछे- पीछे चुपचाप वह भी चला आया। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं गुस्सा किस बात पर हुआ?
थोड़ी ही देर में रिसेप्शन पर मुझे नए कमरे की चाबी मिल गई और वह लड़का फैली आँखों से मुझे घूरता हुआ देखता रहा।
मैं सामान उठाने के लिए उससे कुछ भी कहे बिना अपने आप अपना सूटकेस उठाए हुए इस नए कमरे में चला आया और मैंने धड़ाक से कमरा भीतर से बंद कर लिया।
परंतु अपने नए कमरे में आते ही मुझे उस लड़के की मासूमियत पर तरस आने लगा जिसके रोज़गार में थोड़ी सी बढ़ोतरी पर बेरहमी से लात मार कर मैं यहां चला आया था।
फ़िर भी मेरा मन अब बेहद हल्का सा हो गया था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे नहाए बिना ही मेरा बदन निर्मल पावन हो गया हो और गुजरी हुई काली रात का जो मैलापन मेरी रगों में बह रहा था वो अपने आप ही अदृश्य हो गया है।
- प्रबोध कुमार गोविल
बी 301 मंगलम जाग्रति रेजिडेंसी
447 कृपलानी मार्ग, आदर्श नगर
जयपुर - 302004 ( राजस्थान )
मो.9414028938
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