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Sushma s Chundawat

Drama


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Sushma s Chundawat

Drama


छत

छत

3 mins 27 3 mins 27

तीन से चार साल पहले गर्मी के मौसम में इस इमारत का निर्माण कार्य आरम्भ हुआ था और वर्ष 2020 में जून महीने के अंत तक कार्य समाप्ति कर उद्घाटन करने का विचार था।

बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं, बिज़नेसमैन इत्यादि के फ्लैट बन रहे थे,इस बहुमंजिला इमारत में।

जब से निर्माण कार्य शुरू हुआ था, मजदूरों ने एक दिन भी चैन की सांस नहीं ली थी। भरी गर्मी में वे रेत, सीमेंट और ईंटों का बोझ ढोते। ठेकेदार का आदेश था कि जल्द से जल्द निर्माण कार्य खत्म हो ताकि तय समय पर उद्घाटन किया जा सके।

कई मजदूरों की भीषण गर्मी की वज़ह से तबियत भी खराब हुई लेकिन निर्माण कार्य में कोई शिथिलता नहीं आयी।

गर्मी में लू बजती मगर फिर भी मजदूरों ने लगातार काम किया... बारिश के मौसम में कड़कड़ाती बिजली और मुँह पर कोड़ों की तरह बरसते पानी के बीच भी निर्माण कार्य चलता रहा तथा सर्दी के समय मजदूरों के ठिठुरते हाथों ने ईंटें चढ़ायी।

अथक परिश्रम की वज़ह से इमारत मार्च माह के आस-पास ही बनकर तैयार हो गयी थी। चमकती टाइलों युक्त फर्श, चिकनी दीवारें...सचमुच इमारत नयी नवेली दुल्हन के समान जगमगाती लग रही थी, बस केवल छत निर्माण का थोड़ा कार्य बाकी था। सभी मज़दूर जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे कि तभी कोरोना महामारी के चलते सभी जगह लॉकडाउन लग गया !

कार्य ठप्प हो गया। मजदूरों के सामने खाने, पीने, रहने की भयंकर समस्या उठ खड़ी हुई।

मजदूरों ने मार्च, अप्रैल माह जैसे-तैसे गुजारे लेकिन लॉकडाउन और लंबा खिंचता ही चला गया।

विवश होकर मजदूरों के प्रतिनिधि ने इमारत बनाने वाले ठेकेदार से विनती की-"मालिक हम लोगों के रहने के लिए इमारत के कुछ फ्लैट खोल दिये जाये ताकि इस महामारी में निवास हेतु इधर-उधर भटकना नहीं पड़े।"

ठेकेदार ने दिलासा दिया और कहा-"मैं फ्लैट्स के मालिकों से पूछ कर तुम्हारे रहने की व्यवस्था करवाता हूँ।"

मगर अफ़सोस ! कोरोना पीड़ितों के लिए दान-पुण्य करने, सहायता सामग्री वितरित कर अपनी फोटो खिंचवाने वाले नेता, अभिनेता, व्यवसायी..सभी एक स्वर में मुकर गये !!

उनके अनुसार कीमती फ्लैट मजदूरों की वज़ह से खराब हो जाने का भय था। जगह-जगह उनके पसीने की बदबू फ्लैट का वातावरण दूषित करेगी जिससे बाद में फ्लैट मालिकों को रहने में समस्या आएगी !

मजदूर ये सुनकर हतप्रभ रह गये।

-"पसीने की बदबू ! इस इमारत के निर्माण में रात-दिन मेहनत कर पसीना बहाया, यहाँ के चप्पे-चप्पे में हमारा पसीना ही तो समाया है, मगर तब तो बदबू नहीं आयी किसी को भी ! आज जब हमारे सिर पर छत का इन्तज़ाम करने की बारी आयी तो सबने हाथ खिंच लिये !!"

व्यथित मजदूरों ने मिलकर एक निर्णय लिया और उसके बाद कोई भी मज़दूर उस इमारत के बचे हुए निर्माण कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हुआ !

ख़ूबसूरत मगर पथरीली इमारत अधूरी छत के साथ, एक अधूरा ढाँचा बनकर रह गयी !

उसके निर्माणकर्ता तो जा चुके थे, भरी गर्मी में पैदल ही, अपने-अपने गाँवों की ओर...जहाँ कच्ची-पक्की ही सही, सिर छुपाने के लिए एक छत तो थी।



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