बूढा वृक्ष
बूढा वृक्ष
"सुमति सुनती हो क्या? अनर्थ हो गया, तुम्हारा लाडला बेटा हमारे पुश्तैनी घर का सौदा कर आया" .. हांफते हुए रतनलाल ने यह दु: खद समाचार अपनी पत्नी को सुनाया।
"नहीं, मेरा बेटा भले नालायक हो लेकिन वह कभी ऐसा काम नहीं कर सकता, क्या वह अपनी पहचान को यूँ दूसरे के हवाले कर सकता है। कह दो कि यह सब झूठ है" .. सुमति को अपने बेटे पर पूरा विश्वास था।
"इतना विश्वास कैसे रख सकती हो उसपर जिसने हमें घर से निकाल दिया हो, क्या वह चंद रुपयों की लालच में मकान नहीं बेच सकता.." रतनलाल ने अपनी बीवी को अपने बेटा का असल चेहरा दिखाया।
चार साल पहले जब विनय ने अपने माँ - पिता को पुश्तैनी मकान से निकाल दिया तो भी वह चुपचाप से निकल गये। उन्होंने मान लिया था कि अब इस मकान की जिम्मेदारी विनय के कंधों पर है, साथ ही यकीन था कि वह इस मकान को जैसे आजतक हमारे पुश्तों ने सलीके से संभाल कर रखा ठीक उसी प्रकार मकान की रक्षा करेगा। किन्तु क्या ऐसा हो पाता है? यह सवाल उनके दिल पर घाव भर गया।
सोचते - सोचते उन्हें अपने पूर्व के दिन याद आये, जब उन्हें अपने मकान के बीचों- बीच खड़ा एक वटवृक्ष हटाना पड़ा था। कितना भयंकर मंजर था वो, कितनी ही पिढ़ीयाॅं उसकी छत्रछाया में रहकर खुद को सुरक्षित और उल्लासित महसूस करतीं। लेकिन जब वही बूढ़े पेड़ को जब सहारा देने का समय आया तो हम लोगों ने उसकी तरफ देखा भी नहीं, उसे नजर अंदाज कर दिया। वह चिखता - चिल्लाता रहा पर हम विकास करने के खातिर बूढ़े बरगद की छाॅंव को भूल गए और काटकर उसे फेंक दिया।
उसके बाद रतनलाल कभी चैन से जी नहीं पाये। उन्हें अपना दिल बार - बार कचोटता ताकि उस वृक्ष का जतन इसी एक उद्देश्य से किया गया था कि वह हमें छाया दे। रतनलाल ने काफी कोशिश करी मगर परिवार के इस सदस्य को नहीं बचा सके। उन दोनों को समझ आ गया कि जबतक परिवार के बुजुर्ग सदस्य घर पर बोझ नहीं बनते तब तक उनसे कोई शिकायत नहीं करता , अगर एक बार जब हाथ - पैर थक गए तो उनके शब्द का भी कोई मोल नहीं रहता। विनय का पुश्तैनी मकान बेचने का फैसला सुनकर रतनलाल और सुमति को दु: ख तो हुआ पर वो शांत ही रहे ताकि वह जान चुके थे कि हमारी स्थिति उसी वटवृक्ष की तरह है जिसे एक समयावधि के बाद दूर हो जाना बेहतर है।
