Renu Poddar

Tragedy


4.8  

Renu Poddar

Tragedy


बोझ

बोझ

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मुनिया भागती हुई आयी और अपनी फ्रॉक की जेब में से एक कागज़ कि पुड़िया निकाली जिसमें उसने लड्डू छुपाये हुए थे। जल्दी से पुड़िया अपनी अम्मा(दादी) को पकड़ाते हुए बोली "अम्मा बहुत छुपते-छुपाते हुए तुम्हारे लिए लायी हूँ जल्दी से खा लो, अगर माई आ गई तो आज हमारी खैर नहीं।" जर्जर हुए शरीर को किसी तरह समेटते हुए, उस नन्ही सी, चंचल सी मुनिया की दादी भीगी हुई आँखों के साथ धीरे-धीरे उठी और मुनिया को गले लगा कर बोली "ना जाने कौन से अच्छे कर्म किये थे मैंने, जो इतनी प्यारी बिटिया मिली मुझे"।


मुनिया अम्मा को अपने से अलग करते हुए बोली "लड्डू खा काहे नहीं लेती हो, आज हमारी पिटाई करवाने का सोची हो का"? 


बुढ़िया माई बिलख उठी "ना बिटिया, तोहरे हिस्से का लड्डू खा कर पाप का भागिरदार ना बनना है मुझे। तू खा कर दिखा और बता कैसे हैं। मेरा पेट तो तुझे खाते हुए देख कर ही भर जायेगा"। 


मुनिया ने आँखें तरेरते हुए कहा "माई ठीक कहती है, बुढ़ापे में सब सठिया जाते हैं। कल तो तुम्हारा कुछ मीठा खाने का मन कर रहा था। आज माई के साथ उनके काम पर गयी थी, तो मलकाईन के घर में कोई पूजा थी। उन्होंने ही सब को लड्डू बाटें, मुझे चार लड्डू मिले थे। दो तो माई ने ले लिए थे, बाबू को देने के लिए। दो बचे थे वो मैं तोहार वास्ते ले आयी, तो तुम्हारी तो नौटंकी शुरू हो गयी"।


इतने में कम्मो (कमला) मुनिया की माई कि आवाज़ आ गयी दोनों दादी-पोती की तो जान ही निकल गयी। अम्मा ने जल्दी से लड्डू कि पुड़िया अपने सिराहने फटे हुए कम्बल के नीचे सरका दी क्यूंकि कम्मो उन्हें चार बातें सुनाती तो वो बर्दाश्त कर लेती पर मुनिया को डांट पड़ते उनसे देखा नहीं जाता, उनका जी रोनियो में आ जाता।


कम्मो अंदर आ पाती तभी पड़ोस कि जानकी आ गयी और कम्मो को बताने लगी कि "उसकी दादस भगवान को प्यारी हो गयी है इसलिए वो अपने परिवार के साथ आज शाम की ट्रैन से गाँव जा रही है"।


जानकी ने कम्मो से उसकी झुग्गी का ख्याल रखने को कहा।


कम्मो ने दुःख प्रकट करने की बजाये जानकी से कहा "तेरे तो भाग खुल गए, जो बुढ़िया दुनिया से कूच कर गयी। एक हमारी बुढ़िया को देख भगवान जैसे इसकी मरने की तारीख लिखना ही भूल गया। बुढ़िया मर जाये तो वो कोना खली हो जाये"।


जानकी ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलते हुए कहा "हाँ तेरी इतनी छोटी सी तो झुग्गी है, तुम पाँचों को कितनी मुश्किल होती होगी, एक साथ ज़मीन पर सोने में। कितनी जगह तो बुढ़िया की चारपाई ही घेर लेती है"।


बुढ़िया माई यह सब सुन रही थी उनकी आँखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। धीरे-धीरे बुदबुदा रही थी "मेरे हाथ में होता, तो कब की इस दुनिया से चली गयी होती। क्या मिला है मुझे इस ज़िन्दगी से"।. तभी कमला की आवाज़ से बुढ़िया माई घबरा गयी। कमला कह रही थी "कब तक खटिया तोड़ती रहोगी, अब थोड़ा-थोड़ा चलने कि कोशिश किया करो"। कम्मो सेठानी के घर से खाना लायी थी। बच्चे बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे और मोहन काम पर गया हुआ था। कम्मो अकेले ही खाना खाने बैठ गयी और बुढ़िया माई को पहले दिन की बासी रोटी हरी मिर्च से दे दी। कम्मो खुद बहुत आनंद लेकर खाना खा रही थी। कम्मो सोच रही थी की बुढ़िया उसे खाते देख चिढ़ेगी पर उसे माँ के मन की बात माँ बनने के बाद भी नहीं समझ आ पायी थी की माँ तो अपने बच्चों को खाता देख कर ही तृप्त हो जाती है। वो तो बच्चे ही ऐसे होते हैं जो माँ-बाप का किया हुआ सब भुला कर उनके मरने के दिन गिनने लगते हैं।

बुढ़िया माई को इस बात कि तस्सली थी कि मुनिया और मोहन उसका बहुत ख्याल रखते थे।


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