Gulafshan Neyaz

Abstract

3.0  

Gulafshan Neyaz

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बनूँ मैं तेरी विधवा

बनूँ मैं तेरी विधवा

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पूरा घर दिया की रौशनी से जगमगा रहा था।आज रूपा की मेहंदी जो ठहरी,रूपा की सखी कुसुम उसे मेहंदी लगा रही थी।

"वाह क्या सुन्दर मेहंदी रचाती है" कुसुम रूपा की माँ ने हँसते हुए कहा।ढ़ोल बज रहे थे।ठोल की थाप पर कुछ लड़कियां कमर मटका रही थी।औरते मंगल गीत गा रही थी.

"बोल रूपा इस दिल पर किस का नाम लिखू।उसका जिसका नाम तेरे दिल पर लिखा है. मोहन या जिसे तेरे घर वाले जबरदस्ती तेरे हाथों मे लिखना चाह रहे हैं गोपाल।

रूपा ने धीरे से कहा गोपाल।

रूपा मत कर ये शादी तू ख़ुश ना रह पायेगीऔर मोहन मर जायेग तेरे बिना पागल सा हो गया है कुछ सुध बुध ही नही ,उसका कुछ सोच

तभी रूपा की भाभी आ गई।कुसुम खामोश हो गई।मेहंदी की रस्म हो गई।क़ल हल्दी थी।पुरे घर मे ढेरो मेहमान भरे थे।सब लोग शादी के कामो मे वयस्त थे।रूपा अपने कमरे मे अकेली यादों मे गुम थी।उसके आँखों से आंसू की लड़ी बह रही थी।तभी उसके कानो मे कुसुम की आवाज़ गई।

रूपा ऐ ले चिट्ठी मोहन ने दिया।और एक बार तुझ से मिलना चाहता है।

रूपा ने दो टूक कहा "कह देना उस से अब हम कभी नहीं मिलेंगे भूल जाय मुझे और अपने ज़िन्दगी मे आगे बढे" कुसुम उसे एक टूक देख ने लगी रूपा मुझे ना पता था की तू इतनी पथर दिल है।

ऐ कहते होइ कुसुम पाऊं पटकते होए कमरे से चली गई।रूपा ने जल्दी से कमरे की कुण्डी बंद की और ज़मीं पर बैठ कर हाथों मे खत लेकर रोने लगी उसके आंसू से उसके खत भीग गई उसने खुद को सँभालते हुए खत खोला

"मेरी प्यारी रूपा उम्मीद करता हु. तुम कुशल होंगी।मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।जरूर मेरे ही प्यार मे कमी होगी।इसलिए तुम मुझे छोड़ किसी और से बयाह रचाने जा रही हो।तुम मुझ से प्यार करो ना करो पर तुम मुझे मजबूर नहीं कर सकती की मे तुमसे प्यार ना करों।और क्या लिखूं कोई शब्द ही नहीं।अपना ख्याल रखना, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा मोहन रूपा बूत बनी बैठी रही.

बेटा छोड़ दो बहिन है तुम्हारी मर जायेगी वो।हाँ तो मर जाय वैसे भी कुल का नाक कटाने से तो अच्छा है की मर जाय।नहीं बिटवा छोड़ दो इसकी शादी कर देंगे सब झंझट खत्म हो जाए गा नहीं माई मैं मोहन के अल्लावा किसी और शादी नहीं करूंगी मार ही दो मुझे तो ठीक है ऐसा है तो लाओ पहले उस मोहन को और उसके घर वालो को मारूंगा उसके बाद तुम्हे नहीं भैया मोहन मत कुछ कीजिए आप जैसा कहेंगी मे वैसा करूंगी।आज रूपा की शादी थी पुरे गाँव के लोग बारात के सवागत की तयारी कर रहे थे।शादी बहुत धूम धाम से हो .

तभी कुसुम ने रूपा को एक तोफहा दिया।जिसे रूपा ने अकेले मे खोला तो उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गई ये क्या मज़ाक है कुसुम ये मोहन ने दिया उसमे एक चिट्ठी थी।रूपा मे तुम्हे मन से अपनी पत्नी मान चुका था।एक औरत की दूसरी शादी अपने पति के मृत्यु के बाद ही होती है।आज से तुम किसी और की हो गई।आज से तुम्हारी ज़िन्दगी मे मेरी मृत्यु हो गई।ऐ उसी की निशानी है।रूपा के हाथ थरथराने लगे।कुछ समय वाद उसकी विदाई हो गई।उसके ससुराल का रास्ता बहुत दूर था।और जंगल से होकर जाता था रास्ते मे छिटपूट ही आबादी थी. रूपा की डोली उठ गई मोहन सुर्ख आँखों से देखता रहा।जाते जाते अंधेरा हो गया अचानक कुछ डाकू ने हमला कर दिया।सारे बाराती मे भगदड़ मच गई सब अपनी जान बचा कर भागने लगे. रूपा भी सहमी सी खड़ी रही तभी एक डाकू उसके पास कर कुटिल हसीं हसने लगा उसे अजीब नज़रो से घूरने लगा वाह क्या चीज है।नई नवेली दुल्हन सोने से लदी उठा लो. और उसके साथ जबरदस्ती करने लगा।वो गोपाल से मदद मांगने के लिए चिल्लाये, सब देख गोपाल डर गाया और भाग खड़ा हुआ ।वो लोग ठहाका मार कर जैसे ही रूपा के कमर मे हाथ डालना चाहा उसे किसी के चीखने की आवाज आई।ये तो मोहन था।उसके हाथ मे लाठी थी. बिना सोचे समझें वो डाकू पर टूट परा। रूपा उसे बूत बनी देखती रही।वो फिर से जोर से गुस्से मे चिल्ल्या तो कुछ डाकू रूपा की तरफ झपटे तो रूपा बेतहाशा भागने लगी

कुछ देर बाद भोर हो गाया,शोर शराबा सुन कर आस पास के गाँव के लोग इकठ्ठा हो गए।जिसे देख डाकू भागने मे ही भलाई समझने लगे. रूपा भागते हुए मोहन के पास आई मोहन खून मे लथपथ था।रूपा जोर जोर से चिल्लाने लगी .और मोहन का सर अपने गोद मे रख लिया. गोपाल मूक दर्शक बना खड़ा था।रूपा चिल्ला कर कहने लगी. मैं किसी कायर की पत्नी बनने से अच्छा तुम्हारी विधवा बनना पसंद करूंगी मोहन के प्राण पखेरू उर चुके थे, उसका निर्जीव शरीर रूपा की गोद मे परा था।रूपा ने मोहन के शरीर को एक किनारे रखा और डोली से उसकी दी हुई सफ़ेद साडी निकाल कर पहन ली।गोपाल हक्का बक्का देखता रहा 


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