Mukul Kumar Singh

Tragedy


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Mukul Kumar Singh

Tragedy


भूत

भूत

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“ओ माट् सा-ब” की आवाज सुनकर मैं रुक गया। यह आवाज मेरे हीं एक परिचित का था। पीछे मुड़कर देखा एक दुबला-पतला शरीर, साँवला रंग का व्यक्ति मेरे सामने उपस्थित। मैं इन्हे पहचान गया। ये मेरे एक मित्र के चाचाजी हैं। आधे सर के गंजे, आँखे कोटरों में धँसी हुई और एक तूत रंग का टी शर्ट काला फूलपैंट तथा पैरों में स्लीपर डाले हुए। मैंने पूछा – कहिए, कोई सेवा हो तो व्यक्त करें।

ज्यादा कुछ नहीं माट् सा-ब बस......। पाँच-छ: करते-करते उत्तर मिला। मैंने इनके चेहरे एवं शब्दों से हीं ताड़ लिया की महाशय कुछ याचना कर रहे हैं। उन्होने कहा –

माट् सा-ब, संभव हो तो चाय पिलायेंगे। मैंने तुरन्त हामी भर दी और बगल की चाय की दुकान की ओर उन्हे साथ ले चल पड़ा। वैसे चाय की दुकान पर आज आने में देर हो गई थी। इसी दुकान पर प्रतिदिन अखबार पढ़ा करता था। दुकान पर पहुँचने में देर हुई क्योंकि मेरे साथ-साथ ये भी चल रहे थे और इनकी चाल स्वाभाविक न थी। चलने में उन्हे परेशानी हो रही थी। बेन्च पर हम दोनो हीं बैठे। दुकानदार से मैने कहा –

संजय दो चाय बनाओगे और हाँ इन्हे एक बिस्कूट भी देना ।

दे रहे हैं मास्टरजी, बैठिए। एकबारगी संजय ने उन्हे देखा फिर अपने काम में व्यस्त। मैं भी दुकान में रखी अखबार को उठाकर पढ़ने लगा। संजय एक बिस्कूट इनके हाथ में थमाया और चाय की एक गिलास मेरे हाथ में तथा दूसरा उनके बगल में। गिलास से गर्म-गर्म भाप निकल रही थी और मैं तो दो-दो कार्य अखबार पढ़ना-चीय पीना एक साथ कर रहा था सो मेरी चाय अभी खत्म नहीं हुई पर इनको न तो बिस्कूट खाकर पानी पीने मे देर लगी और न चाय पीने में। मैं अवाक रह गया उनका चाय पीना देखकर क्योंकि संजय ने खौलते चाय को छानकर दिया था । लेकिन ये श्रीमानजी उस गर्म चाय को ठण्ढे पानी की भाँति फौरन हीं डकार गये। मैं केवल इतना हीं कह पाया –

बड़ी जल्दी आपने चाय खत्म कर दी। मेरे हाथ की गिलास अभी भी गर्म है।

अब क्या कहे माट् सा-ब। हँसते हुए उन्होने जबाब दिया। कुछ क्षण रुकने के बाद उन्होने हीं बात छेड़ी,

अच्छा माट् सा-ब, हमारे भाई साहब की नाती-नतनी को पढ़कर कितना मिल जाता होगा?

कोई खास नहीं। मैंने एक बारगी उनकी तरफ देखा और नजरें वापस अखबार पर गड़ा दी। इसके बाद उन्होने मेरे पढ़ाने का ढंग का ऐसा प्रशंसा किया कि मैं अपना होशो-हवाश खोने लगा। वैसे प्रशंसा के शब्दों ने मेरे कर्ण-पट को बड़ा सकून पहुँचाया। इसके बाद वे मेरे प्रतिक्रिया का इन्तजार कर रहे थे पर मैं शब्दों का बड़ा कंजूस निकला, अपनी जुबां हीं न खोली। मुझे निरुत्तर देख ये उठ खड़े हुए। “ अच्छा माटस्साब मैं चलता हूं।“ कहते हुए वहाँ से प्रस्थान कर गये और मैं “ठीक है” कहकर उन्हे जाते हुए देखता रहा। मेरा कुछ उन्हे जाते हुए देखना संजय के लिए नया नहीं था क्योंकि वह जानता था कि मेरी तरह न जाने कितने हीं मुर्गी उनके द्वारा हलाल होते रहते हैं। वैसे मेरा आज शुभारंभ था।

अब इनसे प्राय: मेरी मुलाकात होती रहती है पर एक-दो दिन के अन्तराल पर। एक खास बात इनमें थी कि यदि इन्हे चाय पीना रहता तभी ये मुझे टोकते अन्यथा एकदम सामना-सामनी हो जाने पर भी अनदेखा कर जाया करते थे और मेरे श्रवणेन्द्रिय को इतना फुला देते कि मेरे हाथ की उँगलिया स्वत: हीं पतलून की जेब में घुस जाते थे तथा चाय-बिस्कूट का भुगतान कर दिया करती थी।

इनके जाने के बाद इनके जीवन के साथ अपनी तुलना करता था तो मेरा मन उदासी में डूब जाता है। मैं भी इन्हीं की तरह एक प्राईवेट ट्यूटर हूं। हम दोनो में अन्तर सिर्फ इतना हीं कि यह श्रीमान अविवाहित और मेरे कंधों पर घर-संसार के बोझ हैं। य़े जीवित रहने के लिए ट्यूशन पढ़ाते हैं। हमदोनो ने हीं नौकरी पाने के लिये अनगिनत आवेदन किया तथा लिखित में फेल तो कभी इन्टरव्यू में गोल । हाँ एक विशेषता थी कि वे मुझसे पन्द्रह साल उम्र में बड़े एवं मैट्रिक पास जबकि मैं एक ग्रेजुएट। जो भी हो इनको देखकर मुझे अपने स्वयं को हीं जीर्ण-शीर्ण, फटेहाल कपड़ों में मुर्गियाँ तलाशता हुआ नजर आने लगता और अपने भविष्य को देखकर डर जाया करता था। इन्हे मेरा बीना लाग-लपेट के बोलना बड़ा अच्छा लगता था। अच्छा लगता भी क्यों नहीं! आखिर समाज में ट्यूशन पढ़ाना एक आलसी और मूर्ख की छवि तो बना हीं देती है। भले हीं शिक्षागत योग्यता की डिग्री पर डिग्रीधारी शिक्षक क्यों न हो? छात्रों का परीक्षाफल जितना भी उज्जवल हो , कोई फर्क नहीं पड़ता है अभिभावकों को। ट्यूशन की फीस देने में आनाकानी करते हैं, आज-कल करते रहेंगे पर जब आपसे बातें करेंगे तो उनके ऐसा सरल-सहृदय, विवेकवान कोई भी इस पृथ्वी पर हो हीं नहीं सकता है। अरे भाई, ट्यूशन की फीस देते समय वह नियोक्ता और ट्यूटर एक मजदूर बन जाता है और नियोक्ता की नजर में मजदूर सदैव कामचोर हीं होता है इसलिए मजदूरी देने के नाम पर खूब परेशान करो। अभीभावकों जब वेतन मिलती है तो पहली प्राथमिकता होती है घर में बच्चों के लिए सायकल, कैरमबोर्ड, कहीं टूर पर ले जाना, कपड़े खरीदना आदि और ट्यूटर की फीस अगली महिने दे देंगे ना। शायद अभिभावकगण सोचते हैं कि प्राईवेट शिक्षक का ना तो पेट है और ना हीं परिवार। परन्तु जैसे हीं बच्चों के परीक्षाफल में थोड़ी सी खोट दिखी की फौरन हीं कहेंगे-माटस्साब, सोच रहे हैं कि एक और ट्यूशन ठीक कर दूं अर्थात आपकी छुट्टी। पीठ पीछे माटस्साब अयोग्य हैं का तकमा लगा देते हैं। कभी-कभी तो बाकी के फीस को डकार जायेंगे। इन परिस्थितियों से रूबरु होते-होते तीस वर्ष गुजर चुकें हैं।

         हाँ तो, मित्र के चाचाजी चार भाई थे। पिता रेलवे कर्मचारी। मित्र के चाचाजी भाईयों में दुसरे नम्बर पर थे एवं मैट्रिकुलेट। इनके पिताजी जब रिटायर हुए तो रेलने ने इनके ज्येष्ठ भ्राताश्री को अनुकम्पा के आधार पर चतुर्थ श्रेणी के पद पर नियुक्ती प्रदान कर दी। इनके लिए इनके पिताश्रा ने जोड़-तोड़ लगाकर एक प्राईवेट कम्पनी में व्यवस्था कर दिये। चुंकि इन्हे अपने मैट्रिकुलेट होने का गरूर था, ये सपने देख रहे थे कि हम तो साहब बनेंगे। फिर होना क्या था, साहब बने परन्तु रेलवे में नहीं बल्कि रास्ते पर दर-दर की ठोकर खानेवाले। इनके हमउम्र या पड़ोस में रहनेवाले फब्तियाँ कसा करते या मजाक उड़ाते, बच्चे इनका मजाक उड़ाया करते हैं और ये खिंसियानी बिल्ली की भाँति खम्भा नोचते हैं। इनके बड़े भाई चतुर्थ श्रेणी से उन्नति कर बी ग्रेड के पद पर पहुँच परलोक वासी हुए। उनके परिवार में एक पुत्र जो मेरा मित्र है बाकी के मित्र की मां,तीन बहने ससुराल में। मेरे मित्र की मां अति उन्नत विचारोंवाती महिला सो पति कि कमाई पर सास-ससुर-देवर का दृष्टि न पड़े सदैव ख्याल रखी। उनका सिद्धांत है मैं-मेरा पति और मेरे बच्चे हीं मेरी दुनियाँ है। अक्सर बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात ये श्रीमानजी उनके मकान पर जाया करते थे।चूंकि बड़ी भाभी से इनकी पटती नहीं सो कभी मेरा मित्र तो कभी इनकी माँ एक कप चाय और बिस्कूट या रूखा-सूखा भोजन सामने रख देते पर मुँह से कुछ बोलते न थे। जैसे लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो अर्थात मानविय भावना मृत। अपमानित होते हुए भी आर्थिक तंगी के कारण उनलोगों का दिया हुआ अन्न ग्रहण करते एवं बड़ी भाभी का बिना छिला हुआ नुकीला बाँस की तरह चुभने वाली शब्दवाण- सारा ट्यूश्न का कमाई अपने दोनो भाईयों पर बुड़ाया है और सर पटकने के लिए यही दरवाजा मिलता है- सुनने को मिलता है

अब तो इनसे मेरी मुलाकात दो-दो दिन के अन्तर पर होने लगी तथा “माटस्साब, हो सके तो चाय पीलायेंगे” का उदघोष सुनकर मैं दानी बनने का मौका नहीं गँवाता। परिणाम ये मेरी दानशीलता का लाभ उठाने लगे। चाय-बिस्कूट के साथ-साथ दस रुपया, पाँच रुपया भी हस्तगत करने लगे। प्रारम्भ में तो मुझे बड़ा अच्छा लगता था पर आगे चलकर असहनीय लगने लगा क्योंकि मैंने जब हिसाब करके देखा कि प्रति मास इनके पीछे मेरा डेढ़-दो सौ रुपया खर्च हो जाया करता था। एक तो मेरा स्वयं का कोई स्थाई आमदनी नहीं, उपर से घर-संसार का खर्च। सुबह से लेकर रात दस बजे तक घर-घर जाकर ट्यूश्न पढ़ाता और बदले में लगभग दो हजार प्रति माह आमदनी होती थी। इस मँहगाई के बाजार में चावल पन्द्रह से बीस रुपये किलो, तेल सत्तर रुपये किलो और बाजार की सबसे सस्ती वस्तु नमक वह भी आठ रुपये किलो बिक रही है। चार सदस्यों का परिवार की गाड़ी कैसे खींच रहा हूं यह तो मैं और मेरा परिवार हीं जानता है। ऐसे में यदि प्रति माह डेढ़-दो सौ रुपयों का सदाव्रत बाँटने लगा तो मेरा कल्यान अवश्यम्भावी है, जिनके पास स्थायी आमदनी है वे तो किसी को डेढ़ पैसा भी देना नहीं चाहते हैं और एक मैं हूं जो की........।इसलिए मैंने मैदान छोड़ने का मन बना लिया। मैं और अधिक अपनी आत्महत्या करना नहीं चाहता था। मन हीं मन ठान लिया कि अब खैरात न बाटूंगा। पर जब वे मेरे सामने आ जाते , उनका रुआँसा भूखा-प्यासा चेहरा देखता तो मेरी आत्मा जबाब दे जाती और मै अपनी आत्महत्या कर हीं डालता। कुछ दिन तक यह दौर चलता रहा लेकिन जब मेरी ट्यूश्न गड़बड़ाने लगी तो घर पर नून है तो तेल नहीं वाली परिस्थितियां सामने आ खड़ी हुई और मुझे बाध्य होकर मुँह खोलना पड़ा परन्तु प्रत्यक्ष रुप में मैं इन्हे मना नहीं कर पाया। इसलिए मैने झूठ बोलना तथा बहाना बनाने लगा। परन्तु यह भी कम न थे, शनि ग्रह की तरह मुझ पर चढ़े रहते थे। मेरा कोई भी मंत्र कार्य नहीं करता था।

एक दिन संजय की दुकान पर ये मेरा इन्तजार बड़ी बेकरारी से कर रहे थे और मेरी नजर इन पर पड़ी की मेरा दिल डूबने लगा। मुझे देखकर इन्होने हाथ जोड़कर कहा-“नम्स्कार माटस्साब”। मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया पर कृत्रिम हँसी दिखाते हुए कहा-“कोई बात नहीं है, हमारा तो जन्म-जन्मान्तर का सन्धि हो हीं चुका है। फिर संजय को चाय बनाने के लिए कह चुपचाप बैठा रहा। पहले तो वह इधर-उधर देखता रहा ,मुझे चुप्पी लगाये देख पूछा-“क्या बात है माटस्साब, बड़ा परेशान सा दिख रहे हैं”

-क्या करूं जब अपनी टांग पर स्वयं हीं कुल्हाड़ी चलाउँगा तो दर्द दूसरा कोई थोड़े हीं झेलेगा? मेरा जबाब सुनकर बड़े खुश हुए तथा बोले

-ए माटस्साब, बूरा मत मानियेगा। आप बात लेकिन बड़ी दूर की करते हैं और यही मुझे आपकी प्रशंसा करने को बाध्य करता है। ना-ना,ये मत सोचिये कि आपके मुँह पर प्रशंसा कर रहा हूं। ऐसा बात नहीं है बल्कि किसी से भी पुछकर देख लीजिएगा।

कहने को तो मैने हाथ के इशारे शे उन्हे मना किया पर अपनी प्रशंसा सुनकर बड़ी खुशी हुई और जैसे मेरे डूबते हुए दिल को सकूं मिला। संजय चाय लाकर दिया। बस हाथ में आने भर की देर थी पेय पदार्थ का गैस एवं द्रव वाला रुप उन्होने पलक झपकते हीं उदरस्थ कर लिया। पता नहीं इनके मुँह एवं आहारनाल किस पदार्थ के बने हैं जिस पर उष्णता का कोई प्रभाव हीं न पड़ा। खैर अन्य दिन चाय खत्म होने के साथ हीं साथ मुझसे विदा ले लिया करते थे पर आज बैठे हैं जबकि मैं अखवार से चोंच लड़ा रहा था। एक व्यक्ति तभी मेरे पास आकर बैठ गया और अखबार से नयन मटकाने लगा। मुझे विरक्ति होने लगी क्योंकि अखबार का एक कोना उसने थाम लिया था जिससे अखबार के पृष्ठ को पलटने में असुविधा हो रही थी। बड़ा बेकार आदमी है, मान न मान मैं तेरा मेहमान बन गया है वह भी जबरदस्ती सो मुझसे सहन नहीं हुआ। यह तो सोचने की बात है भला एक म्यान में दो तलवार साथ-साथ रह हीं नहीं सकती है। इसलिए मैंने विरक्ति भरे स्वर में कहा- आप भी दूसरा पृष्ठ को हीं पढ़े तो ज्यादा अच्छा होगा। वह व्यक्ति सकपका गया तथा अखबार का कोना छोड़ दिया एवं मेरी नजर मित्र के चाचाजी पर पड़ी। अभी तक बैठे थे,इनका चेहरा देखकर लगा जैसे कुछ कहना चाहते हों। मैंने हीं पुछा- कुछ कहना चाहते हैं क्या ?

-बात है माटस्साब....। रुक गये चुप लगा गये। इस पर मैंने हीं जोर दिया तथा कहा –

“ बोलिए-बोलिए, रुक क्यों गये ? संभव होगा तो कुछ कर दूंगा”। शायद मेरे इस उक्ति को सुनकर उन्हे कुछ भरोसा हुआ और बोले – माटस्साब सुबह से केवल चाय बिस्कूट हीं नसीब हुआ है। रात होने को आ गई है एवं अनाज का एक दाना मयस्सर नहीं। एक ट्यूश्न फीस आज मिलनेवाली थी पर क्या कहूं, गार्जियन ऐसे हो गये हैं न प्राईवेट पढ़ानेवालों की फीस देना हीं नहीं चाहते हैं। गाँव चला गया है, अब आपहीं बताईए कि मेरा एक सौ बीस रुपया रोक देने से उनका गाँव जाने का खर्चा कम पड़ जाता। मन में तनिको विचार नहीं है, जी में आता है कि यदि भगवान सामने मिल जाय खबर लेते और पूछते कि अरे शैतान मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो सारा कमिनापन मुझी पर उतार रहे हैं। उनकी बातों को आस-पास बैठे लोग बड़े हीं ध्यान से सुन रहे थे। मैंने उन्हे टोका

-छि:। आप भी शिक्षक होकर अपनी जुबां गन्दा कर रहे हैं। भगवान ने थोड़े हीं आपको कहा है जाकर ट्यूश्न पढ़ाओ। वह तो स्वयं असुरक्षित है, देखते नहीं हैं खुद मन्दिर में छुपे रहते हैं और उनका भोजन आँखों के सामने से चिंटियां-चूहे खा जाया करते हैं। एक निर्जीव पत्थर है भगवान। आप मानों या न मानो कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसे क्या जरुरत पड़ी है आपके यंत्रणाओं को सुनने की। मेरी बातों का खण्डन नहीं कर सके तथा आत्मसमर्पण करते हुए बोले – आपहीं बताईए न मैंने ट्यूश्न पढ़ाकर कौन सा अपराध किया जो गार्जियन सब पैसा देने से जी चुराते हैं। खुद सरकार से आठ-दस हजार का तलब उठाते हैं और हम शिक्षकों का........फीस नहीं देना चाहने हैं यहीं न(मैंने उनकी बात बीच में हीं काट दिया)। अरे भैया , “वो लोग तलब उठाते हैं अपनी बीबी-बच्चों के लिए नहीं”। इसपर सभी लोग हँसने लगे। संजय चायवाला भी इन बातों को सुन रहा था। मुझसे कहा-सरजी इनको यहाँ से विदा किजिए तो मेरा कई खुद्दर इन्हे यहाँ बैठा देखकर वापस लौट गया है। मेरे मित्र के चाचाजी ने संजय को खा जानेवाली निगाह से घूरकर देखा। पर शायद मेरी वजह से कुछ नहीं बोले। मैंने दस रुपये का एकनोट जेब से निकाला और किसी कि ओर न देखते हुए उनकी मुठ्ठी में दबा दिया तथा कहा- अभी आप पढ़ाने जायेंगे न, मैं थोड़ी देर और बैठूंगा। रुपया हाथ में लेकर वे अपने जेब के हवाले किये एवं “ठीक है माटस्साब-ठीक है” कहते हुए अपनी पाँव घसिटते हुए चले गये।मैंने चारो तरफ नजर दौड़ाई तो पाया कि सभी उन्ही की ओर देख रहे हैं। मैं पुन: अखबार पर नजर जमाने का प्रयास किया पर मन नहीं बैठ रहा था। पास बैठे हुए लोगों में से एक ने कहा- सरजी, बूरा न मानना तो एक बात कह दूं इन्हे आप ज्यादा प्रश्रय मत दो क्योंकि आगे चलकर ये तगादा करनेवालों की तरह आपके पीछे पड़ जायेंगे और आप इनसे अपना पिण्ड नहीं छुड़ा पायेंगे। उस भले इन्सान की बात एकदम सत्य थी पर मैं अपने आपको ज्यादा आदर्शवादी दिखाना चाहता था। एकबार उसकी ओर पलक झपकाई और फिर अखबार से दिल जोड़ने का कोशीश किया। अभी एक शब्द भी नहीं पढ़ पाया था कि एक अन्य ने कहना शुरु कर दिया- कई घरों के बच्चों को पढ़ाता है पर पता नहीं ट्यूश्न की फीस का क्या करता है जो सबके सामने हाथ पसारे रोनी सूरत बनाये खड़ा हो जाया करता है। पता नहीं इस व्यक्ति की बात मुझे क्यों बूरी लगी? फलत: थोड़ा रूखे स्वर में कहना शुरु किया- “आप अपने बच्चों को ट्यूश्न पर दिए हैं”।

-हाँ जी।

-अच्छा मान लिजीए आपके बच्चे को बूखार हो जाये तो आपको क्या करना चाहिए?

-क्या मतलब, डाक्टर के पास ले जायेंगे और क्या।

-और जो शिक्षक उसे पढ़ा रहा था उनका फीस नहीं न देंगे।

-क्यें नहीं देंगे?

-कब देंगे,क्या आपका बच्चा स्वस्थ होने के बाद?

-आपका बात हमारा समझ में नहीं आया सरजी।

-नहीं समझ में आने की क्या बात है, ट्यूश्न का माह लग चूके हैं पर प्राईवेट शिक्षक भले भूखे रहे पर पहले बच्चे को डाक्टर के पास ले जायेंगे या नहीं? अरे मेरे भाई उस शिक्षक का भी तो पेट है या नहीं,न की शिक्षक बनने का मतलब शिक्षक को भूख-प्यास नहीं लगना चाहिए यही ना। वह मेरे व्यंग्य को समझ गया और उसका ज्ञान देने का सारा उत्साह ठण्ढा पड़ गया तथा चुप लगा गया। मुँह फेर लिया था उसने। संजय इस तर्क से उत्साहित हो चुप लगा जानेवाले व्यक्ति के सम्मान में एक बड़ा सुन्दर वक्तव्य व्यक्त किया- जानते हैं सरजी, ये भी कम नहीं हैं। रेल से तलब उठाते हैं पर तीस-पैंतीस रुपये की चाय का दाम बाकी रखे हुए हैं और देने में आज-कल करते हैं। सब लोग आपकी तरह थोड़े हीं होते हैं जो उधारी पर चाय पीते हीं नहीं हैं। इसकी प्रतिक्रिया बड़ी अच्छी हुई। लच्छेदार बातें करनेवाला फौरन हीं जेब में हाथ डाला और पचास रुपये का नोट निकाल कर संजय के हाथ में थमा दिया। संजय भला क्यों चूकता, चालिस रुपये काटकर बाकी लौटा दिया और वह भलामानुष वहाँ से खिसक लिए। कई ग्राहकों को चाय देने के बाद संजय ने मुझसे पुछा- अच्छा सरजी, वो गुरुजी तो आपसे उठौना तय कर हीं लिया है। उसके पिछे एक माह में आप कितना दे देते हैं? मैंने संजय की ओर देखा और कहा कि किसी को दी गई वस्तु का हिसाब नहीं करना चाहिए वह भी उस स्थिती में जब तुम किसी को सहायता कर रहे हो क्योंकि वह एक प्रकार की दान की राशि है। फिर मेरे पास है हीं क्या जो किसी को देता फिरुं। बस यह समझ लो एक प्राईवेट ट्यूटर का दूसरे के प्रति सहानुभूति है।

उसके बाद कई मौके आये मैंने उन्हे ना कहना शुरु कर दिया था। पर यह श्रीमानजी ऐसे थे कि जैसे हीं सामने आते बस महाजन की भाँति तगादा कर बैठते। कभी चाय-कभी पाँच रुपये तो कभी दस रुपये वसुल हीं लेते। आखिर बाध्य होकर उन्हे देखकर  कन्नी काटने लगा। मेरे पास पैसों के पेड़ तो नहीं लगे थे जब जरूरत पड़े तो हाथ बढ़ाउं और तोड़ लिया करुँ। इन्हे ना कहने के बाद मुझे अपने आप पर शर्म आती थी क्योंकि मैं साफ-साफ झूठ बोलने लगा था। पर बाद में अपने मन से समझौता कर लिया क्योंकि इसमें शर्म की कोई बात नहीं है, पहले अपने परिवार का पेट भरना आवश्यक है और उससे उबरे तो अन्य का । इसलिए निष्टूर बनने में कोई बूराई नहीं है। ऐसा अपने मन के साथ तर्क-बितर्क करके सहज हुआ करता था। इन दिनों सभी स्कूलों की वार्षिक परीक्षाफल घोषित हो चुकी थी एवं प्रति वर्ष की भाँति मुझ जैसा शिक्षक को भँवर में डूबे रहना हीं बदा था। पुराने छात्र बीन कुछ कहे या बताये किसी अन्य के कोचिंग सेन्टर की शोभा बढ़ाने चले जाते हैं और साथ में बाकी का ट्यूश्न फीस भी गायब। वर्तमान में चारो तरफ  कुकुरमुत्ते के छत्ते की तरह कोचिंग सेन्टरों की भरमार हो चुकी है तथा मन हीं मन इन्हे खूब कोसता हूं। जैसे हीं बच्चे क्लास आठवीं में कदम रखे कि भागे इन सेन्टरों की ओर। वैसे बच्चे क्यों न जायेंगे? कमरों में टी.वी., डी.वी डी. सेट लगा रखे हैं तथा रिमोट रहे छात्रों के हाथों में और लड़के-लड़कियाँ साथ एवं किशोरावस्था का उफान स्वभाविक रुप से बच्चों को स्वप्नलोक में पंख लगा उड़ने को उतावला हो तो दोष किसे देंगे? इन सेन्टरों में ट्यूश्न एक-एक बैच का चार घंटे जबकि शिक्षक महोदय टॉनिक पीलाते हैं केवल आधे घंटे फिर शिक्षक गायब, उपर से सरकार के द्वारा छात्रों को जीवन-शैली (यौन-विज्ञान) पढ़ने को कह दिया है। इस विषय से छात्रों को लाभ होता हो या नहीं बता पाना संभव नहीं पर बच्चों को रास्ते पर चलते समय अशोभनीय हरकते करने की आँधि अवश्य तीव्र हो चली है। भगवान हीं जाने अपने देश का भविष्य क्या करेगा!

खैर जो भी हो कोचिंग सेन्टरों ने मेरे जैसे गृह-शिक्षकों की हालत खराब करके रख दी है। ऐसी स्थितियों में ये महाशय मेरे लिए आतंक बन चूके थे। प्रतिदिन भगवान से प्रार्थना करता हूं कि हे भगवान इनसे भेंट न हो पर ये तो यम की भाँति सामने आ खड़े हो जाते हैं और मुझे दिन में तारा दिखाई देने लगता है। दिन तो दिन है, रात में मेरे सपनों में पीछा करने लगे। जैसे हीं पलके बन्द हुई कि देखता हूं कि ये अट्टहास करते हुए कह रहे हैं- कहाँ भाग रहे हो बच्चू, मैं तुम्हे छोड़नेवाला नहीं। और मैं पुरी शक्ति के साथ दौड़ रहा हूं पर लगता है मेरे पैर जमीन से चिपक गये हैं तथा अब पकड़ा की तब पकड़ा। उनके हाथ लम्बे होते जा रहे हैं मेरी गर्दन दबोचने को। वो देखो मेरी गर्दन दबोच ली गई है तथा लाल-लाल आँखों से घुर रहे हैं, अचानक उनके होंठों के किनारे के दो दाँत बड़े होकर बाहर आ गये एवं उनकी जीभ से लार टपक रही है। देखते हीं देखते मेरी गर्दन में उनकी दाँत चूभ गई और मुँह के अन्दर की गर्मी का अहसास हो रहा है,दर्द के मारे मैं चीखना चाहा पर आवाज नहीं निकला तथा घबड़ाकर मेरी आँखे खुल गई तो अपने को बिस्तर पर सोया हुआ पाया और सारा शरीर पसिने से तर-बतर।

इस तरह की न जाने कितनी रातें मैंने गुजारी बयां नहीं कर सकता। आर्थिक तंगी से परेशान न घर में चैन और न बाहर। घर में पत्नी से खीच-खीच एवं बाहर मित्रों का उपहास दोनो ओर खाई । जब इस महाशय को देखता हूं मन हीं मन अपने-आपको अभिशाप देता हूं, अपनी करनी पर पछताता हूं कि यदि प्रथम दिन हीं मैं दयावान न बनता तो आज यह नौवत न आती। मेरे द्वारा इन्हे ठूकरा देने से दुनियाँ थोड़े हीं बदल जाती पर मुझ पर तो उस समय दयावान बनने का भूत सवार था एवं सहानुभूति दिखाने के चक्कर में आज एक दहशत को गले ढो रहा हूं। कभी-कभी तो सोचता हूं कि दया और सहानुभूति एक अबला नारी है जिसका हर कोई शोषण करता है। परन्तु धनवानों को देखो जल्द किसी पर दया नहीं दिखाते हैं और समाज में विभिन्न अवसरों पर प्रधान अतिथि बन अपनी रूढ़ता को छिपा कर दया का प्रकाश फैलाते नजर आते हैं जबकि कोई स्थानीय साहित्यकार दो रुपये मुल्य की पत्रिका लिए उनके पास पहुंचता है तो पालतु अल्सेसियन भौंकने लगता है बाद में वह स्वयं और साहित्यकार महोदय का “सागरमाथा” हिन्दमहासागर में।

वे भी कभी-कभार मुझे चाय पीने को कहा करते। मैं संकोचवश या आनेवाली पारी की कल्पना कर मारे डरके अस्विकार कर देता। ऐसे समय में इन्हे ट्यूश्न फीस मिली हुई होती और जेब भारी तथा चेहरे पर दयनियता के स्थान पर स्वभिमान झलकता था। यदि कोई इनके बारें में मुझसे पुछता कि क्या सरजी, आपके प्रशंसक श्रीमान का बाजार गर्म है। मैं प्रत्युत्तर में कहता – हाँ भाई मेरे, आप भी कम से कम ईश्वर से प्रार्थना करो ताकि इनका बाजार हमेशा गरम हीं रहे। उस समय मन में सोचता हूं जैसे हीं इनका बाजात ठण्ढा होगा और मुझ जैसे हमदर्दी रखनेवालों की शामत आ जाएगी। वही चिर-परिचित दयनीयता, दुखभरी आपबीती से सामना होगा। मेरे ट्यूश्न बाजार पर तो शनि ग्रह सवार थे सो एकदिन कहने लगे –माट साब मैंने आपके लिए एक ट्यूश्न की बात की है, आज हीं चलकर बात कर लें। “अन्धा को और क्या चाहिए बस दो आँखे”। मैंने तुरन्त हामी भर दी। निश्चित समय पर मुझे ले गये, अभीभावक महोदय से मेरा परिचय कराया और मेरे बारें में इतने कसिदे पढ़े की मैं अवाक हो इनका मुँह देखता रह गया। अभीभावक महोदय भी कम न थे, इनके वार को बड़ी आसानी से झेल गये तथा अंत में मुझसे बात किए। चार सौ रुपये फीस, सप्ताह में चार दिन एवं फीस अग्रीम । पढ़ाई शुरु करने के बारे में अभीभावक ने कहा कि आज अपनी बच्ची से बात कर लूं, क्लास एइट में उठ गई है और आधूनिक समय तो इन्ही लोगों का है ना।“ किस टीचर को पसंन्द करेंगे? यह तो वही जाने”। मैंने ठीक है-ठीक है कहते हुए वहाँ से प्रस्थान किया और मेरे साथ-साथ श्रीमानजी भी। मुझसे कदम मिलाने का भरसक प्रयास कर रहे थे पर इनके पैर बड़े जालीम थे। दोनो तलवे में गुड़खुल आसन जमाये हुये था और शायद इन्हे भी गुड़खुल से प्यार था। इसलिए मैंने हीं अपने कदमों को छोटा कर लिया। रास्ते में इन्होने कहा- माट साब, आपहीं ठीक करते हैं जो अग्रिम फीस माँगते हो पर फीस थोड़ा ज्यादा हो गई न। मैंने आश्चर्य से कहा- फीस ज्यादा! आज बाजार कहाँ से कहाँ पहुँच गया है पर हम ट्यूटरों की फीस जहाँ से शुरु वहीं पर धक्के खाती रहती है परन्तु बच्चों की रीजल्ट मे कोई कमी नहीं होनी चाहिए। यहीं बगल में रेलवे गार्ड को तो आप पहचानते हीं है, जिनके तीन बच्चे पढ़ते हैं फीस देते हैं केवल पाँच सौ रुपये। आज तीन वर्ष होने को आ गये उनकी सैलेरी बढ़ गई,गाड़ी- बाड़ी सब खरीद लिए लेकिन हमारी फीस न बढ़ाई। उल्टे फीस देते वक्त रोता है कि सरजी यदि अगले महिने फीस दूं तो कोई असुविधा होगी। शर्म भी नहीं आती इनको। मेरे अन्दर के ज्वालामुखी को अन्दर से फटते देख ये मात्र हूं-हाँ करते रहे। बात करते-करते हमलोग संजय की चाय दुकान पर पहुँच चुके थे। संजय को चाय के लिए बोलकर बेन्च पर बैठ गया। मेरा आवेश अभी भी ठण्ढा नहीं हुआ था। संजय चूल्हा ठीक कर रहा था। देर होगी जानकर इनके चेहरे पर निराशा छा गइ थी क्योंकि दो मुर्गी इनके सामने से चली गई। मेरे आवेश के ठण्ढा होने तक मैं शब्दहीनता की स्थिती मे था। अभीभावको की मानसिकता के बारे में सोचकर मैं क्षुब्ध था। संजय चाय लाकर दिया। पहला चाय की गरम घुंट जब हलक में उतरी तब जाकर मैं सहज हुआ। उसके बाद मैने इनसे कहा- देखा आपने किस तरह से बाजार कर रहा था और आते समय कहा कि बच्ची से पूछेगा। उन्होने मेरा समर्थन करते हुए कहा- जी मैंने भी तो यही सुना पर......। अभी उसकी बात पुरी नहीं ही थी कि मेरे अन्दर का भड़ास एकबार पुन: अग्निवर्षन करने लगी-जानते हैं वह हमलोगों को पढ़ा रहा था, अरे श्रीमानजी वह किसी अन्य ट्यूटर से बात करेगा तथा उसकी कोशीश होगी कि तीन सौ रुपये पर हीं उसकी बच्ची का ट्यूश्न पक्की हो जाय। उन्होने फिर मेरा समर्थन करते हुए कहा-ठीक हीं कह रहे हैं माट साब। उनके गिलास की चाय समाप्त हो चुकी थी जबकि मैं अपनी रौ मे बड़बड़ा रहा था-जरा सोचिए, आखीर वह बच्ची से क्या पुछेगा। मैं कहता हूं कि माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं न कि बच्चे माता-पिता को! मेरे चाय भी मेरी गले की तरावट को तर कर चुकी थी और मुझे ख्याल आया कि मुझे तो ट्यूश्न पढ़ाने जाना है।

अगली शाम को हम फिर मिले। वे बड़े खुश दिख रहे थे। वही पुराना राग –माटस्साब चाय। मन तो किया इनका सर फोड़ दूं पर गुस्सा को जाहिर होने न दिया। मैंने कहा- माफ करें, आज लाल बत्ती जली हुई है। इस पर उन्होने ऐसा अभिनय किया कि मेरा सारा गुस्सा हीं हवा हो गई। उन्होने कहा- क्या बात करते हैं महाराज, चलिए मैंने आपका काम कर दिया है। कसम से कहता हूं माटस्साब,आपके मुँह पर प्रशंसा नहीं कर रहा हूं बल्कि एकदम सच कह रहा हूं भगवान सबका ख्याल रखता है। आपके अन्दर देवताओं सा गुण है। आपने कभी भी कड़ुवे शब्दों का प्रयोग मेरे लिए नहीं किया। इतना कहकर जेब से साढ़े तीन सौ रुपये मेरे हाथ में रख दिए तथा विनयी स्वर में बोले- माटस्साब, मैं जानता हूं आप बड़े नेकदिल इन्सान हैं बूरा नहीं मानेंगे। पचास रुपये इसमें से मैं होटलवाले को दे दिया हूं.......न-न, मैं आपको लौटा दूंगा। बस मेरा फीस मिल जाने दीजिए। मेरा दिल बैठने लगा, मुझे देवता बनाकर स्वयं हीं असुर का रुप धारण कर चुके हैं। पता नहीं मुझ पर कितना अधिकार रखते हैं जो मुझसे बीन पुछे हीं मेरा ट्यूश्न फीस उठा लाए और अपने लिये खर्च भी कर दिये। तभी तो ये मेरे लिए उतने चिन्तित थे। मन मसोस कर रह जाना पड़ा। इस समय मुझे ट्यूश्न की सख्त जरुरत थी। अत: कमिशन खिलाना हीं पड़ेगा। यह तो मैं अच्छी तरह से जानता था कि उन्होने जो पचास रुपये ले लिए वह मिलने से रही और उपर से चाय-बिस्कूट तथा पाँच-दस रुपये देते रहना को नियती मान लिया।

एक दिन संजय ने बताया कि जानते हैं सरजी, आपके महाजन ने तो आज कमाल कर दिया। मुझे आश्चर्य हुआ भाई ऐसी कौन सी बात हो गई सो पूछ हीं लिया- क्यों संजय किसी झड़प हो गई!

-नहीं सरजी।

-तो फिर?

-बीस गिलास गरम चाय पीकर एक सौ इक्यावन रुपये की बाजी जीता है।

-क्या कह रहे हो संजय!

-एकदम सत्य कह रहा हूं सरजी। यहाँ और लोग भी बैठे हुए हैं, पुछकर देख लो।

कुछ पल के लिए मैं अवाक रहा। एक घड़ी के लिए इनके लालचीपन पर तरस आया। चंद रुपये के लिए अपनी आंत को जलाने से भी पीछे नहीं हटे। प्रति माह मेरा सौ-डेढ़ सौ डकार जाते हैं। उनका अपना ट्यूश्न फीस भी मिल हीं जाता है। आखिर इतने सारे रुपये करते क्या हैं? मैं सोचता हीं रह गया। इस सोच से मुक्ति मिली शाम को। मोड़ पर खड़े थे। मैंने अपनी सायकल रोक दी और बीन भूमिका बाँधे हीं पुछा,

-सुना है आज आपने एक सौ इक्यावन रुपये की बाजी जीता है।

-हाँ माटस्साब।

-वह भी अपनी आँत जलाकर।

-क्या करूं माटस्साब, मृत्यु भी नहीं आती है। रोज-रोज घुट-घुटकर मरने से अच्छा है एक हीं दिन मर जाउँ।(एकदम गम्भीर हो गये) पर जानते हैं माटस्साब, मौत तो मुझे भी पसन्द नहीं करता है। इस निर्दय समाज ने मुझे एक छोटी सी गलती की इतनी भयंकर सजा दी कि मैं पल-पल थोड़ा-थोड़ा करके मरता हूं। मेरी हालत आज ऐसी हो गई है कि सोने की जगह भी नसीब नहीं, कुत्ते की तरह घर के बाहरी बरामदे बिस्तरहीन दुबका रहता हूं। भोजन कहाँ पकाकर खाउँ, भाई-भभु खर्च के लिए बारह सौ रुपये माँगते हैं। मेरी ट्यूश्न केवल पाँच-छ: सौ रुपये की हीं है। परिणाम मुझे होटल का सहारा लेना पड़ता है, आप तो जानते हीं है ट्यूश्न की फीस लोग बढ़ाते ही नहीं हैं और हमारे पढ़ाये हुए बच्चे भी ट्यूश्न पढ़ाने लगे हैं। अब आपहीं बताओ क्या इन बच्चों को मैं मना कर सकता हूं? बेकारी चारो तरफ ऐसी बढ़ती जा रही है जैसे सुरसा का मुँह । उपर से कल-कारखाने खुलने की जगह धड़ाधड़ एक के बाद एक बन्द होते जा रहे हैं। सरकार नये-नये उद्योग स्थित करने की घोषणायें हीं करके रह जाती है। एक लुंगी,गमछा तथा एक बीस रुपये की चप्पल खरीदा बाकी जो बचा सब होटलवाले को दे दिया नहीं तो वह उधारी में रोटियाँ नहीं देने की बात कह चूका था। सच कहता हूं माटस्साब, परिस्थितियों ने मुझे गरम चाय पीने का आदि बना दिया है लेकिन खोलते हुए चाय पीलानेवाला क्या मनुष्य हैं? यदि उन्होने मुझे मनुष्य समझा होता तो क्या ऐसा करने को कहता! जिस समय मैं गिलास पर गिलास अपने मुखबिवर में उड़ेल रहा था मेरे गले की पेशियाँ तड़तड़ा रही थी। उफ्फ! एक सौ इक्यावन रुपये का सवाल था। इतना कहते-कहते आँसू के अमुल्य बूंद पिचके हुए गालों पर क्रॉस-कंट्री की दौड़ लगा दिया। उनका सर झुका हुआ था। मैंने देखा उनके पाँव के पास अश्रु के कण टप-टप करके गिर रहे थे। मुझे कुछ सूझा नहीं कि इन्हें क्या कहकर सान्तावना दूं। मैंने उनके कन्धों पर हाथ रखा और कहा –हिम्मत से काम लिजीए, जीवन का तीन हिस्सा गुजार चूके हैं तथा अंतिम हिस्से के लिए तैयार रहें।

-अभी भी कह रहें हैं! इतनी मानसिक यंत्रणा भोग चूका हूं फिर भी साहस रखूं। उनकी अश्रुपुरित नजरे मेरे चेहरे पर टिक गई। मैं निरुत्तर क्योंकि मुझे कोई ऐसा शब्द नहीं मिल रहा था जो उनकी यंत्रणा को कम करता।

-ठीक है माटस्साब। कहकर आगे बढ़ गए। पता नहीं क्यों मैंने उन्हे रोका और कहा – आईए , आपको चाय पीलाता हूं। संजय की दुकान पर जा पहुँचा। रास्ते में उन्होने जेब से रूमाल निकाल अपने नयनों को थपकियाँ दे शायद आंसूओं को बहने से मना कर दिया हो। ये चाय पीकर चले गये । अन्य दिनों की तरह कोई भी बात न उठाई। मुझे अपने आप पर धिक्कार आने लगा आखिर बीना कुछ जाने सुने हीं इन्हे लालची,औरों के सामने हाथ पसारनेवाला आदि समझ बैठा था। सबकी अपनी-अपनी परेशानियां होती है और उसका समाधान उसे हीं करना पड़ता है। अब से ऐसा किसी के बारें में न सोचुंगा और जहाँ तक संभव हुआ मदद करने का प्रयास करूंगा।

इतना सब कुछ देखने के बाद भी मुझे मुक्ति न मिली। बाध्य होकर मैंने रास्ता बदल दिया ताकि इनसे भेंट न हो । यही कोई एक माह गुजरे होंगे, इन्होने मुझे देख हीं लिया और नये रास्ते मोड़ पर मैं इनके द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया । इन्हे देखकर मेरी सांसे उपर-निचे होने लगी, पसीने से भींग गया एवं कोई उपाय न देख चाय-बिस्कूट के साथ-साथ एक बण्डल बीड़ी व एक पैकेट खैनी का भूगतान करके मुझे मुक्ति मिली। पर यह प्रक्रिया भागने और पकड़ाने की रुकी नहीं बिल्कूल चोर-पुलिस की आँख- मिचौली खेली जाने लगी। इस खेल के बीच इन्होने मेरी तीन महिनो के फीस खैरात में ले ली और उसी के संग मेरी एक ट्यूशन चली गई। मैंने इनसे शिकायत की तो चुप्पी साध ली। दो दिन के बाद हीं एक नई ट्यूश्न की व्यवस्था भी करवा दी जिसकी फीस आठ सौ रुपये थे और अग्रीम भूगतान में से सौ रुपये पहले हीं कमिशन काट लिया इन्होने। जो भी हो ट्यूशन का आने-जाने का धारावाहिकता बन गई। जब अग्रीम फीस मिलती तो मैं बड़ा खुश होता पर यह खुशी क्षणिक हीं रहता। इससे मैं इनके उपर विक्षुब्ध रहने लगा और अन्तत: मेरे लिए ट्यूश्न देने से मना कर दिया। इससे मुझे थोड़ी सी शान्ति अवश्य मिली पर केवल सूर्य के प्रकाश में क्योंकि जैसे हीं तमस के काले चादर से मित्रता करता कि ये भूत बनकर मेरा पीछा करते और मैं भागा-भागा फिरता पुरी शक्ति के साथ लेकिन इनके लम्बे-लम्बे हाथ मेरी गर्दन को दबोच लिया करता था एवं मेरे गर्म-गर्म लहू का पान करते थे।

बहुत दिनों के बाद तब भी छ: महिने तक इनसे मेरी मुलाकात न हुई। होली के उपलक्ष्य में अपने छात्रों को ट्यूटर नामक दहशत से मुक्ति दी थी कि चलो कम से कम दो दिन तो बच्चों को पंख पसार कर खुली हवा में सांस लेने का मौका तो मिले। हम बड़े लोग कभी भी बच्चों को अपनी इच्छा से कुछ कहने या सुनने का अवसर देना पसन्द नहीं करते हैं इससे माने या न माने वे कूंठाग्रस्त हो जाते हैं। अत: सभी प्रकार के भेदभाव मिटाने वाले रंगों के त्यौहार का आनन्द उठा बच्चे नई उर्जा भरे फिर खुशी-खुशी मेरे सामने उपस्थित आज हुए हैं। अर्थात मैं पुन: उन्हे जंजीरों में जकड़ने निकला था। संजय की दुकान पर बैठा हुआ था । मेरे पास में एक व्यक्ति आकर बैठ गया इसका भान भी मुझे न हुआ क्योंकि मैं अखबार पढ़ने में तल्लिन था। अचानक चौंक उठा – ओ माटस्साब,कुछ हमरा भी ख्याल करें।

-अरे आप! कब आकर बैठें?

-थोड़ी देर तो जरुर हुई है। मैंने सोचा माटस्साब शायद मुझसे खफा हैं। सो परसो होली खत्म हुई है उससे क्या फर्क पड़ता है क्यूं न हम लोग भी अपने मन के मैल को साफ कर लें। बड़े हीं प्रफुल्लित दिखाई दे रहे थे।

-अरे ना-ना मैं भला आप के उपर क्यों खफा रहूंगा। थोड़ा झेंपते हुए कहा। ओ भाई संजय चाय पिलाओ इनको।

-चाय से नहीं मानने वाला हूं। वैसे तो चाय पीउंगा हीं।

-तब क्या चाहिये, बोलिए तो सही।

इतने दिनों के बाद ये मेरे सामने आये हैं। इसलिये इन्हे खुश रखने के लिए मैंने भी तोर पर मोर लगाया।

-भई, होली की मिठाई अभी बासी थोड़े हीं हुई है। बस दिलों में मैल न हो,कलुषित न हो। यह त्यौहार रंगों के द्वारा समाज के भेदों को मिटाकर समानता का संदेश देता है। फिर हम क्यों वंचित रहे। इतना कहकर उन्होने अपनी जेब में हाथ डाला और जब हाथ बाहर निकला तो हाथ में एक ठोंगा थी जिसमें गुलाबी रंग की अबीर थी उसे मेरे सर पर डाल दिया। प्रत्युत्तर में मुझे भी उन्ही के ठोंगे से चुटकी में अबीर ले उनके कपाल पर तिलक लगाया। आस-पास बैठे हुए लोगों ने बड़े हीं जोश के साथ “होली है......जोगीरा.....सा...रा....रा” का उदघोष किया।

मैं हैरान था इनकी जिन्दादिली पर। इतने भूख-प्यास-अपमान सहकर ,कटुक्तियाँ सुनकर भी इतने खुश। बड़े जीवट हैं । कौन कहेगा कल जिस व्यक्ति ने अपनी व्यथा कथा व्यक्त करते वक्त रो पड़ा था वह आज खुशियों का सौगात लिए फिर रहा है। इनके हिम्मत की दाद देनी हीं पड़ेगी। सिने के अन्दर दुखों के थपेड़े-घावों के दर्द दबाए खुशियों की बागवानी करनेवाले ये महाशय वास्तव में प्रशंसा के पात्र हैं।

बीच-बीच में इनसे मुलाकात होती रहती थी और मुझसे अपना तोला वसूला करते थे। मैं इच्छा न रहने पर भी बलि का बकरा बन जाया करता था। बकरा बनने के सिवाय मेरे पास दूसरा कोई उपाय भी न था क्योंकि इससे मेरे झूठे आदर्शों की पोल खुल जाने का डर था। सो उपर से मैं मुस्काता और अन्दर से खून के आँसू बहाया करता। मेरी भी असुविधा हो सकती है या फिर मेरे परिवार को भी एक-एक रुपये के लिए मानसिक अग्नि की ज्वाला में झुलसना पड़ेगा, शायद ऐसा न सोचते हों। कितनी हीं बार अपनी बेटी की कॉपी खरीदने के पैसे इनके पीछे खर्च हो गई और घर लौटकर झूठे बहाने बना पत्नी की अशांति से बचता रहा। खैर कई दिन तक इस भूत के दर्शन तो न हुए पर मेरे अन्दर बैठा हुआ भूत हर वक्त मुझे डराये रहता था। जैसे हीं रास्ते पर निकलता तो लगता कि अब सामने आ खड़े होंगे या सामने मोड़ पर खड़े होंगे। कहीं ऐसा तो नहीं मेरे पीछे आकर खड़े हों, मैं अखबार भी ठीक से न पढ़ पाता,सदैव दायें-बायें देखता, सचमुच में नहीं हैं न। मेरे पीठ पीछे यदि कोई खड़ा हो जाता तो लगता मेरे हृदय की धड़कन बढ़ गई है।

ऐसे हीं घबड़ाहट से दबा अखबार पढ़ रहा था कि संजय ने मुझे कहा- जानते हैं सरजी, गुरुजी का एक्सीडेन्ट हो गया है।

- अरे भाई संजय ,क्या अनाप-शनाप मजाक करते हो।

-नहीं सरजी, एकदम सच। आज सबेरे दस बजे यहीं पर रास्ता पार करते समय कार से टकरा गये । कार ड्राईवर की भी गलती नहीं थी और गुरुजी भी ख्याल नहीं किया एवं लड़ गये तथा सामनेवाला पोस्ट से टकरा गये। हम सबने मिलकर उनको उठाया तथा उसी कार में लेकर उनको अस्पताल पहुँचाया। कारवाला सारा खर्च का दायित्व लिया है।

             मेरे लिए यह एक अनहोनी खबर थी। उनका चेहरा मेरी आँखों के सामने घुम गया। क्या सारे कष्टों का लगता है ठेका ले रखा था इन्होने? वाह रे ईश्वर! तुम्हारा बनाया हुआ विधान भी गजब का है, कैसे लोग तुम पर विश्वास करते हैं? जिसके जीवन में दुख आती है तो सिर्फ दु:ख हीं। लोग कहते हैं कभी धूप-कभी छाँव, परन्तु मैं तो देख रहा हूं यह सरासर झूठ है। यह केवल शब्दों का संयोजन मात्र है। मेरे मन में तर्क-वितर्क की लहर उठ रही थी और किनारों से टकराकर लौट जा रही थी। मैंने संजय से पूछा

-अच्छा संजय ज्यादा चोट लगी है क्या?

-क्या बताएं सरजी, चोट तो लगेगी हीं। उतना दूर फेंका गए थे।

अगले दिन दोपहर के संजय से पता किया कि उन्हे किस हॉस्पिटल में ले जाया गया है और बेड नम्बर कितना है तथा अभी उनकी क्या पोजिशन है? संजय ने बताया कि अभी तक जो खबर है गुरुजी को होश नहीं आया है। मेरा दिल धड़क उठा, कहीं हमेशा के लिये सो तो नहीं न गये। ऐसा विचार मेरे मन में आना स्वाभाविक था। आखिर चार वर्षों से उनके साथ मैं छूआ- छुई का खेल जो खेल रहा था। तीसरे दिन पता चला कि उनको होश आ गया है। शाम को कुछ फल लेकर उन्हे देखने गया। वहाँ मेरा मित्र भी उपस्थित था। उसने मुझे बताया कि कितनी बार इनसे कहा- पैर ठीक नहीं है ज्यादा रास्ते पर मत निकले पर ये भला कभी किसी की परवाह तो किये नहीं। मेरे मित्र कि यह सफाई ने मुझे बहुत कुछ बता दिया। खैर जब मैं उनसे मिला तो बड़े हर्षित हुये और कहने लगे- माटस्साब, आपको देखकर बड़ा सकून मिला, लगता है जैसे आधा दर्द गायब। देख रहे हैं न मेरे रिश्तेदारों को, बड़े अभागे हैं ये क्योंकि मेरी मौत नहीं हुई। इन्हे तो चिन्ता सता रही है, डॉक्टर ने दवाईयाँ लिखकर दी है और सभी लोग एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं कि दवा का पैसा कौन देगा? मेरे मित्र को संदेह हुआ कहीं मेरे सामने घर की शिकायते तो नहें न कर रहें हैं। कृत्रिम सहानुभूति दिखाते हुए कहा- चाचाजी डॉक्टर ने आपको ज्यादा बात करने से मना किया है।  चुप हो गये। मैने मित्र से कहा- लाओ यार प्रेसक्रिपश्न। मेरा मित्र भी कम चतुर न था। तुरन्त हीं प्रेसक्रिप्शन हाथ में ले मुझे साथ ले बाहर फार्मेसी की दुकान पर आया। दवा का मुल्य चुकाया गया और वापस उनके बेड के पास लौटे।दवाईयाँ टेबुल पर रख दी गई। जब मैं वापस आने को हुआ तो उन्होमे मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कहा- माटस्साब, आपका किया तो मैं वापस लौटा नहीं सकूंगा पर एक बात कहना चाहूंगा कि आप ट्यूश्न पढ़ाना छोड़कर किसी दूसरे धन्धें अपना लो। हमारा यह मानव समाज बड़ा हीं निष्ठूर है क्योंकि एक प्राईवेट ट्यूटर का मूल्यांकन एक भिखारी के साथ करते हैं।

मैं वापस आया । सांसारिक दबाव के चलते फिर उन्हे देखने नहीं जा सका और आजतक फिर उनसे मेरी मलाकात न हुई। सुनने में आया कि जिस दिन उन्हे हॉस्पिटल से छुट्टी मिली, उनके भाई ने उन्हें रिक्शे पर बिठा दिया और स्वयं सायकल से घर वापस आ रहे थे। परन्तु अस्पताल से मुक्त हुआ व्यक्ति घर वापस नहीं लौटा। लोग कहते हैं कि बीच रास्ते में हीं रिक्शा छोड़ दिए थे। तब से आज तक किसी ने उन्हे नहीं देखा।                        


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