Moumita Bagchi

Drama


4.8  

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भोलेशंकर और हेलिकप्टर !

भोलेशंकर और हेलिकप्टर !

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आप सभी सोच रहे होंगे कि भला भगवान भोलेशंकर का हेलिकप्टर से क्या संबंध ? नहीं, उनका कोई संबंध नहीं है, पर हम मनुष्यों का इन दोनो से ही गहरा संबंध है। यह लेख, कोई कथा या कहानी नहीं है, और न ही है कोई कोरी कल्पना ,बल्कि वृत्तांत है हमारी केदारनाथ-यात्रा की।

किस तरह अनेक प्रतिकूलताओं के वावजूद भगवान की कृपादृष्टि हम पर ऐसी बरसी कि हम आखिर उनके दर्शन में सक्षम हो सके---यह उसी का लेखा-जोखा मात्र है।

बात सन् 2007 के सितम्बर महीने की है। मेरे ससुरजी, जो अत्यंत धार्मिक स्वभाव के थे, पिछले साल बद्रीनाथ जी के दर्शन के पश्चात् इस वर्ष केदारनाथ जी जाना चाहते थे। मेरी मौसेरी सास सपरिवार केदारनाथ -यात्रा पर जा रही थीं-- यह समाचार पाते ही ससुरजी ने भी उनके साथ यात्रा पर जाने का मन बना लिया था। 

परंतु यह कैसे संभव था! ससुर जी दिल के मरीज़ थे और उनके डाॅक्टर ने उन्हें लगभग ग्यारह हजार फुट की चुढ़ाई के लिए इजाज़त नहीं दी थी! 

फिर तो यह तय था कि पैदल मार्ग से वे जा नहीं सकते थे। नेट सर्च करने पर पतिदेव को पता चला कि पवनहंस द्वारा अगस्तमुनी से केदारनाथ के लिए हेलीकॅटर सर्विस चलाई जाती है। पूछने पर पता चला कि मेरे ( मौसेरी) जेठ ने अपने परिवार के लिए टिकटें पहले से ही बुक करा रखी हुई है।

परंतु जब हमने बुकिंग कराने के लिए पवनहंस के दफ्तर पर फोन किया तो पता चला कि सारी टिकटें तो पहले से ही आरक्षित हो चुकीं हैं, और अब अगले पंद्रह दिनों तक एक भी टिकट मिलने की कोई संभावना न थी । 

मंदिर सर्दियों में छः महीने के लिए बंद हो जानी थी।अगस्त का महीना चल रहा था, अतः ससुरजी बड़े दुःखी हो गए थे।

पतिदेव अपने दफ्तर से आते वक्त पवनहंस के कुछ प्रिंटआउट निकालकर लाए थे जिनको मैं अपने कमरे में बैठी टटोल रही थी। अचानक मुझे आशा की एक किरण नज़र आई। उस प्रिंटआउट के नीचे मोनल रिसाॅर्ट का एक फोन नंबर भी दिया हुआ था। वहाँ काॅल करने पर पता चला कि वे लोग भी पवनहंस की बुकिंग कराते हैं। फिर क्या था, मैं तुरंत बाराखंभा रोड पर स्थित उनके कार्यालय पर पहँच गई । वहाँ पहुँचने पर पता लगा कि मोनल रिसाॅर्ट ,रुद्रप्रयाग में रूम बुकिंग कराने पर पैकेज के अंतर्गत वे हैलीकप्टर बुकिंग भी कराके देते हैं परंतु इसके लिए हजार रूपए प्रति सीट की वे कमीशन लिया करते हैं । 

यदि बुकिंग करानी हो तो बुकिंग की सारी राशी ( रिसाॅर्ट और हेलीकाॅप्टर दोनों की) उसी समय पेशगी देनी पड़ेगी। 

इतनी बड़ी रकम की बात सुनकर मैं बिलकुल मायूस हो गई और चुपचाप उल्टे पाँव वापस घर आ गई। घर में आकर सबसे कह दिया कि इस बार हमारा जाना न हो पाएगा।  

हम सब अभी इसी विषय पर बातचित कर रहे थे कि ससुर जी ,"अभी आता हूँ" कहकर घर से निकल गए। 

कोई डेढ़घंटे बाद जब हमें उनके घर न लौटने पर चिंता हो रही थी उसी समय वे वापस आते हैं और हमें खुशी के साथ यह सूचना देते हैं कि वे अभी -अभी जाकर सारी रकम भरकर आए हैं और हम सभी 30 सितम्बर को हेलीकाॅप्टर द्वारा केदारनाथ जी के दर्शन हेतु जा रहे हैं।

ससुरजी हर कीमत पर इस यात्रा पर जाना चाहते थे इसलिए पैसों की उन्होंने कोई परवाह न की। उनका कहना था कि तीर्थ-यात्रा के मौके बार-बार नहीं आते -- और जब भी आते हैं तो उस मौके को कभी गंवाना नहीं चाहिए। सच ही तो है कि ईश्वर की मर्जी के बिना उनका दर्शन भी कभी संभव नहीं हो पाता है।

केदारनाथ शिवजी के द्वादश ज्योतिर्लिंगो में से एक है जो उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह लगभग साढ़े दस हजार फुट की ऊंचाई में पर्वतों से घिरा हुआ एक प्राचीन मंदिर है जो कि महाभारत काल में निर्मित माना जाता है। यहाॅ शिवलिंग की आकृति कछुए की पीठ की तरह है। 

किंवदंती है, कि जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए जा रहे थे तब वे शिव जी से मिलना चाहते थे, परंतु शिवजी किसी कारणवश उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने कछुए की आकृति की शिला के रूप में अपने आपको छुपा लिया था। शिवजी का केवल धर यहाँ, इस मंदिर में है और भगवान शिव आज भी उसी रूप में यहाॅ पूजित होते हैं । 

केदरनाथ की यात्रा चार - धाम ( मिनि चार धाम कहते हैं --आजकल इसे--- जबकि आदि चार धाम है-- द्वारका, पूरी, बद्रिकाश्रम और रामेश्वरम) यात्रा के अंतर्गत भी आते हैं, जिसमें केदारनाथ के अलावा बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री भी शामिल हैं।

28 सितम्बर को हम दिल्ली से जनशताब्दी एक्सप्रेस द्वारा रात के नौ बजे हरिद्वार पहुँचे। वहाँ से रात को ही हम टैक्सी लेकर ॠषिकेश चले गए। हरिद्वार से ऋषीकेश की दूरी लगभग देड़- दो घंटे की दूरी है। रात को सड़के खाली मिलीं और हम जल्द ही ऋषिकेश पहुँच गए!

ऋषिकेश के गढ़वाल मंडल विकास निगम के अतिथि- निवास में हमारे ठहरने का इंतजाम पहले से हो रखा था। बड़ी-सी टीम थी हमारी, जिसमें मौसेरी सास के और हमारे परिवार के कुल मिलाकर नौ सदस्य थे। 

मुनी की रेती का अतिथि-गृह बिल्कुल गंगा के किनारे पर स्थित है जो राम झूला के समीप है। चांदनी रात में गंगा किनारे बैठकर गंगाजल में बिखेरी हुई चांदनी की छटा को देखते हुए हम सफर की सारी थकान भूल गए।

29 सितम्बर को नाश्ता करने के बाद सड़क मार्ग से रुद्रप्रयाग की ओर चल पड़े। बीच में कौडियाला नामक स्थान में हम जब पहुँचे तो हमें सड़क पर गाड़ियों की लम्बी कतार दिखाई दी।

स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम हुआ कि पत्थर गिरने की वजह से आगे सड़कें बंद है और कब खुलेगी -- यह किसी को पता नहीं। सड़कों पर पत्थर हटाने की बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ नज़र आई!

देर देखकर कुछ गाड़ियाँ वापस जाने लगी। हम सिर पकड़ के वहीं बैठ गए! अगले दिन सुबह की बुकिंग थी हमारी हेलीकप्टर की। अगर आगे नहीं जा सकें तो इतने दिनों की भागदौड़ , मेहनत और सारी योजनाएँ , सब बेकार हो जाएगी ! हम वहीं बैठे इंतजार करने लगे।

 कोई चार-पाँच घंटे बाद रास्ता खुला और हम रात तक किसी तरह रुद्रप्रयाग पहुँच पाए। रात को मोनल- रिसाॅर्ट के छत से अलकनंदा की अपूर्व शोभा देखने को मिली। चांदनी रात में अलकनंदा की छल-छल ध्वनी के साथ बहने का अत्यंत मनोहारिणी दृश्य आज भी मेरे स्मृति पटल पर अंकित है।

30 सितम्बर , सुबह अभी हम सभी सो ही रहे थे कि पवन हंस वालों का फोन आया और उन्होंने हमें जल्दी अगस्तमुनी के हेलीपैड पहुँचने को कहा। साथ में यह भी कहा कि तीन-चार दिनों के बाद आज मौसम खुला है। इसलिए भीड़ भी आज बहुत अधिक है। देर करने पर वापसी में देर होने की संभावना है। 

हम आनन फानन में अगस्तमुनी पहुँचे। सासु माँ ने लाल रंग की साड़ी पहनी थी और वे बहुत सुंदर लग रही थी! मैं पछता रही थी, कि मुझे भी एक साड़ी साथ में लाना चाहिए था!

अगस्तमुनी का हेलीपैड रुद्रप्रयाग से सड़क मार्ग से लगभग आधे घंटे की दूरी पर स्थित है। हेलीपैड पहुँचकर अतिरिक्त सामान क्लोक ( cloak)रुम में जमा करवाकर केवल कैमरै और हैंड बैग साथ लेकर हम लोग हेलीकप्टर में जा बैठे। 

हैलिकप्टर में पायलट को लेकर छह लोगों की बैठने की जगह थी। पीछे की सीटों में मैं अपनी सास , ससुरजी और डेढ़ साल के बच्चे के साथ बैठ गई । हमारे साथ एक दक्षिण भारतीय बुजुर्ग दम्पति भी जा रहे थे केदार- दर्शन को। 

पतिदेव खुशकिस्मत थे जो उन्हें पायलट के साथ काॅकपिट में बैठने का मौका मिला जिसके चलते वे वहाँ के खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ उठाने लगे और हैंडीकैम से विडीयो रिकाॅर्डिंग करने लगे। आसपास के प्राकृतिक सौन्दर्य को सिर्फ आंखों से ही ह्रदयंगम किया जा सकता था, उनका शब्दों में विवरण बड़ा ही दुष्कर है। ऐसा लग रहा था कि अगर एकबार यहाँ नहीं आए तो जीवन में कुछ ई नहीं किया!

इन बर्फीली पहाड़ों की चोटी पर छिट्की सुबह की धूप की शोभा देखने लायक थी। कई पहाड़ पूरी तरह से बर्फ से ढकी हुई थीं तो कुछ पर सिर्फ नाममात्र की बर्फ पड़ी हुई थी। आठ मिनट की उड़ान के बाद हमें हेली कप्टर से उतरना पड़ा। हमारे स्वागत के लिए मानो सामने आद्योपांत तुषारावृत्त सुमेरू पर्वत खड़ा मिला ,जो किसी चांदी के पहाड़ से कम नहीं लग रहा था! उस चांदी के पहाड़ पर खिली धूप से जो छटा छाई हुई थी, वैसा सौन्दर्य मैंने आज से पहले कभी भी नहीं प्रत्यक्ष किया था!

केदारनाथ मंदिर हेलीपैड से आधे किलोमीटर की दूरी पर है। हेली पैड पर उतरते ही पंडों ने हमें पकड़ लिया। मोल- भाव करके सासु-माँ ने एकजन को फिट कर लिया। अब आगे-आगे वही हमें राह दिखाते हुए चले। जय केदारनाथ कहते हुए हम भी उनके पीछे-पीछे चल दिए । मंदिर पहुँचकर हम सबने अच्छे से भगवान का दर्शन किया। 

हैलिकप्टर से आने वालों के लिए वी•आई•पी • दर्शन की सुविधा उपलब्ध थी। इसलिए ज्यादा समय लाईन में नहीं लगना पड़ा।

कोई पैतालींस मिनट बाद हेलीपैड से काॅल आया कि दूसरा हेलीकप्टर अगस्तमुनी से चल चुका है और आप लोग वापसी के लिए तुरंत हेलीपैड पहुँचिए। और हम सब केदारनाथजी के दर्शन से धन्य होकर खुशी-खुशी चल पड़ते हैं। वहाँ, हेलीपैड में हमें अपने मौसेरी सास के परिवार वाले मिल जाते हैं जो आने वाले हेलीकप्टर से अभी -अभी उतरे थे। वे मंदिर की ओर गए और हम हेलीकप्टर पर सवार होकर अगस्तमुनि की ओर चल पड़ें ! 

यह यात्रा कई साल पुरानी हैं। सन् 2013में आई भयंकर बाढ़ से इस स्थान को भारी क्षति पहुँची थी, परंतु भोलेशंकर की ऐसी महिमा है कि केदारनाथ का मंदिर पूरी तरह सुरक्षित खड़ा रहा !


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