बेगुनाही का राज़
बेगुनाही का राज़
अंधेरा होते ही नवीन को अक्सर एक लड़की, चौराहे पर मिलती उसकी आदत हो गयी थी अब नवीन को। बेचैनी सी होती अगर वह न दिखाई पड़ती, एक दिन उसने पड़ोस के पार्क में मिलने को कहा। उसने आज भी वही काला सूट पहन रखा था और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जिससे नवीन उसकी तरफ खींच रहा था। जी भर के अक्सर बात होती और देर रात वह घर पहुँचता। अक्सर उसका फोन घर के रिसीवर वाले फोन पर आता और कोई उठाता तो वह बात न करती थी। एक दिन नवीन ने खुद मिलाया तो नम्बर बन्द आ रहा था।
काफी रिश्ते आ रहे थे और कोई कमी भी तो नहीं थी उसमें। अपने दोस्तों पर भी जी जान छिड़कता था। पर अब उसे उस लड़की के सिवाय कुछ न सूझता। आज घर से सोच कर निकला था कि आज अपने प्यार का वास्ता दे के कम से कम नाम ही पूछ लूँगा पर वह होशियारी से टाल गयी। वह बरसते पानी में भी उसकी गोद में सिर रखे बेंच पर लेटा था, कि अचानक उसे चौकीदार ने देख कर कहा।
"पार्क ग्यारह बजे बन्द हो जाता है अगर मैं ध्यान न देता तो आज तुम यहीं बन्द हो जाते।" वह न जाने कब चली गयी।
अब उसके बिना जीना मुश्किल हो रहा था। आज वो दिखी तो मैंने उससे अपनी कसम दे कर कहा कि "मुझे जन्मदिन का उपहार दे दो, मुझे तुम्हारे अलावा कुछ नहीं चाहिए बस तीन कपड़ों में घर ले आऊँगा तुम्हें।"
वो खामोश हो गयी और मेरे से फ़ोन पर बात करने को कहकर चली गयी।
फ़ोन पर पता नोट कर के वह खुशी से उछला जा रहा था। उसकी गंभीरता और सादगी उसकी खूबसूरती बढ़ा देती थी ऐसी ही लड़की उसे चाहिये थी।
ऑफ़िस से रात दस बजे निकल कर गाड़ी उसकी गली की तरफ खुद ही मुड़ गयी अब चले बिना काम नहीं चलता तो साइड पार्क करके आगे पैदल चल दिया।
उसके गली में घुसते ही उसने पूछा कि "मुस्कान का घर कहाँ है।" लोगों ने अजीब तरीके से घूरते हुए घर बता दिया। घर के बाहर घण्टी बजाते हुए वह कुछ घबरा रहा था, कि उस पुराने हवेली जैसे मकान के दरवाज़े एक बुज़ुर्ग ने खोले और प्रश्नवाचक नजरों से देखा।
नवीन हिचकिचा कर बोला "मुझे मुस्कान से मिलना है रिश्ते की बात करने आया हूँ।"
वो घबराये लहज़े में बोले "अंदर तो आओ", आराम से बैठकर उनकी बातचीत शुरू हुई अब मौसम एकदम खराब हो चुका था। उन बुजुर्ग ने पूछा "मुस्कान को कैसे और कब से जानते हो? जी ..पिछले छः महीने से।"
"हैं ? बेटा मुस्कान मेरे बेटे की बेटी थी और उसकी मौत को एक साल हो गया है।"
"क्या?" वह घबरा कर बोला ।
"हाँ ...सही सुना तुमने उसने ख़ुदकुशी की थी इसी ग़म में उसकी माँ भी चल बसी। हमने उसका कमरा बन्द कर दिया था पर छः महीने से उसमें रोज़ हलचल होती और उसकी पसन्द के गाने बजते।"
"मैं उसकी फोटो देख सकता हूँ ध्यान से उसके कॉलेज की फ़ोटो बहुत कुछ याद दिला गयी।"
वह मुस्कान के बाबा से माफ़ी मांग कर घर लौटने को उठा तो उस घर का कुत्ता कुछ ऐसे ज़मीन पर लोट रहा था जैसे किसी को प्यार कर रहा था शायद अपनी मालकिन को पहचान रहा था।
बदहवास नवीन घर लौटा तो फिर फोन बजा आज वह ठहाके लगा रही थी। "मिस्टर नवीन तुमने दोस्त की दोस्ती निभाई और झूठी गवाही देकर मेरी बारात लौटा दी। इसकी कीमत मैंने ख़ुदकुशी और मेरी माँ ने जान देकर चुकाई। मैंने दादाजी से आखिरी लम्हों में अपनी बेगुनाही साबित करने को कहा था। आज सबूत दे दिया।"

