Pawan Gupta

Comedy

4.0  

Pawan Gupta

Comedy

बदरूदीन का डर

बदरूदीन का डर

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ये कहानी हास्य के साथ - साथ रोचक डरावनी और ज्ञान वर्धक भी है , इस कहानी में छिपे विचारो को समझे !

    डर ...जी हां... डर...

 

 आज हर इंसान को जाना अंजना डर घेरा ही रहता है , किसी को भूत प्रेत का डर, किसी को पढाई का डर , किसी को नौकरी का डर , किसी को अपने रिश्तो का डर , किसी को अपनी जिंदगी का डर !

  डर तो हर आदमी के जीवन में है !

  अलग - अलग रूपों में और हमारे डर का फ़ायदा भी हम ही में से कोई एक इंसान इसका फ़ायदा उठाता है !

  जैसे भूत प्रेत से डरने वालो का फ़ायदा तांत्रिक उठाते है , पढाई से डरने वालो का फ़ायदा टीचर टूशन के नाम पर उठाते है , नौकरी छूट न जाए नौकरी से डरने वालो का फ़ायदा कंपनी के अधिकारी उठाते है , अपनी जिंदगी और बीमारी से डरने वालो का फ़ायदा इंसोरेंस कंपनी और डॉक्टर उठाते है , जो लोग जिंदगी में कमी ढूंढते है , उनका फ़ायदा बाबा लोग उठाते है , समाज से डरने वाले लोगो का फ़ायदा खुद समाज के चंद लोग उठाते है ,अपने रिश्तो के लिए डरने वाले लोगो को उनके पार्टनर खुद फ़ायदा उठाते है !

   वास्तव में डर कुछ नहीं होता है , ये हमारे दिमाग में बैठा एक वहम मात्र है , जिस दिन डर का वहम टूट जाता है , तो वो इंसान निखर जाता है , और जिस इंसान पर ये डर हावी हो जाता है , वो इंसान बिखर जाता है ,

  अतः मेरी सभी पाठको से नम्र निवेदन है कि इस कहानी को पढ़े और ज्ञान प्राप्त करे !

   अगर आपके मन में हार का डर होगा ही नहीं तो निश्चित ही आप हर मुश्किल से जीत जायेंगे !

   जैसे हमारे इस कहानी के नायक बदरूदीन एबक सबके चहिते बन गए , चलिए कहानी की तरफ रुख करते है .....


   अजी आप जानते है ,हमारा गाँव मूर्खो और चापलूसों का गाँव कहलाता है ,जो लोग समझदार होते है , वो शहर भाग जाते है , और हमारे गांव में रह जाते हमारे वरिष्ठ और खुद की नज़र में समझदार चाणक्य !

   सब एक दूसरे से आगे !

 अगर कोई छिटपुट समझदार पढ़ा लिखा नौजवान रह गया हो गांव में तो ये चाणक्य की टोली उस भले आदमी को इस नज़र से देखेंगे जैसे की उन लोगो से ये भले लोग कुछ छीन न ले !

  इन्ही महान पुरुषो में एक महान पुरुष है !

  जी हां ... इन सबके मुखिया हमारे बदरू मियां   

   असल में तो इनका नाम बदरूदीन एबक है !  उनकी दिलेरी और समझदारी के किस्से तो पुरे गांव में फैली हुई थी , उनका ठोर ठिकाना तो गांव के बच्चो को भी पता था !

 वही ठिकाना " जहाँ चार यार मिल जाये वही रात हो गुलजार ". नहीं समझे हां..हां...हां ..

चलिए समझाता हू !

    बदरू मियां बड़े ही फेमस थे , और गांव में लोगो के पास काम भी नहीं न था जी , तो वही कभी चाय की तफरी पर , तो कभी जुम्मन मियां के हजाम की दुकान पर अपनी शेखी बघारते हुए मिल ही जाते !

  उनके बहादुरी के चर्चे भी पूरी गांव में फेमस थे , बस उन कहानियो की महानता ये थी कि हर कहानी में बदरू मियां तो थे , पर कहानी में गांव का कोई शख्स ही नहीं होता था ,और ना ही वो बहादुरी भरी कहानियो की सच्चाई से कभी किसी भी गांव के इंसान से पाला पड़ा था !

  तभी शायद बदरू मियां सिर्फ उन लोगो की गैंग के मेंबर थे , जो हां में हां मिलाये ,और क्या चाहिए था !

  टाइम पास ही तो करना था , सब खुश तो बदरू मियां खुश !

  अजी वही टाइम पास जो गैंग के मुखिया बदरू मियां के तरफ से होती थी ,फिर लोग क्यों न कहानी सुने , और मनोरंजन भी तो होता था फ्री का लोग तो एक कुल्हड़ की चाय और अठन्नी की बिस्कुट में खुश !

  जो लोग बदरू मियाँ से इत्तेफाक नहीं रखते वो बदरू मियां के दुश्मनो में शुमार हो जाते !

  हलाकि , दुश्मनी सिर्फ एक तरफ़ा होती , वो भी नज़रो से !

बदरू मियां को अपनी बहादुरी की कहानियो के साथ साथ दो और चीजे बहुत पसंद थी !

  एक बनारसी पान , और दूसरा ताश का खेल .. " ना जी ना तौबा तौबा बदरू मियां जुआरी नहीं थे , वो तो यूँही टहलते - टहलते निकल जाते जहाँ उन्हें भीड़ दिखती !

  जहाँ उनको अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने को मिले , और ताश खेलने वालो की भीड़ तो उनके कहानियो के श्रोताओ की कमी नहीं होने देती थी ! 

 एक दिन बदरू मियां लम्बी अचकन पैजामा और जालीदार टोपी पहन घर से निकले ,काम तो था नहीं पर खुद को किसी जागीरदार से कम ना समझते पेशे से वकील जो ठहरे !

  बोलने में भी तेज़ , उनके अचकन पर क्या सुहावनी इत्र लगी थी , कि अगर अप्सरा भी पास से गुजरे तो बदरू मियां पर मोहित हो जाये !

  घर से निकलते ही मुँह में एक बनारसी पान को अपने पानदान से निकल कर अपने मुँह के एक कोने में दबा लिया !

  और कोई गाना गुनगुनाते अपनी जूतियो को पैरो में समेत घर से निकल गए ! 

  आज तो बदरू मियां का दिन ही बुरा था , पहले चाय की टपरी पर गए , पर वहां कोई मिला ही नहीं !

  वहां से बदरू मियां बुदबुदाते हुए निकले ,क्या करे वो भी ... अब आदत ही ससुरी ऐसी पाल ली थी ,कि जब तक अपनी बहादुरी के किस्से किसी को ना सुना ले , उनका तो खाना गले में फसा रह जाता !

  कई बार तो उन्होने अपने पैसो से चाय पिलाकर लोगो को कहानी सुनाई है !

   चलिए खैर वो चाय की टपरी को छोड़ जुम्मन मियां के दुकान पहुंचे !

  जुम्मन मियां की दुकान बंद देख पान की पिचकारी छोड़ते हुए जुम्मन से बोले !

  अरे जुम्मन मियां क्या क़यामत ढा रिये हो !

 आज दुकान कैसे बंद कर रखी है ! 

  जुम्मन ने कहा - बदरू मियां आज मंगलवार है ,भूल गए क्या आज मेरी दुकान बंद रहती है !

  बदरू मियां - अरे मियाँ तुम्हे क्या जरुरत बंद करने की , चार पैसे कमाते हो ,उसपर से दुकान बंद कर दोगे तो बीबी बच्चो को कैसे पालोगे !

 जुम्मन - बदरू मियां एक छुट्टी तो सबको मिलती है न , इतना भी क्या काम करना एक छुट्टी में हम भी अपनी बेगम बच्चो के साथ टाइम बिता लेते है , नहीं तो फुर्सत ही कहा है !

 बदरू मियां - हम तो समझते है , जुम्मन मियां !

 तुम नहीं समझ पाओगे हमारी प्रॉब्लम ,कोई बात नहीं चलते है हम ( फिर पान थूकते हुए ) बदरू मियां आगे बढ़ गए !   

    अब तो नमाज़ का वक़्त हो चला था , तो बदरू मियां ने सोचा नमाज़ अदा करने मस्जिद चलता हु , नमाज़ अदा करने के बाद बहुत लोग मिल जायेंगे , फिर सब चाय की टपरी पर बैठ कर बाते करेंगे !

  ये सोच कर बदरू मियां मस्जिद की तरफ चल दिए , मस्जिद पहुंचे आजान हुई !

  सब लोग धीरे - धीरे वापस जाने लगे ,पर बदरू मियां तो जलाल से बात करने में कुछ ज्यादा ही मशगूल हो गए !

  जब उनको महसूस हुआ कि मस्जिद खाली हो गई तो फटाफट वो मस्जिद से बहार की तरफ भागे , की कोई भी 3-4 लोगो को पकड़ कर चाय की टपरी पर ले जाये ,और अपनी कहानी सुनाये !

 पर बदरू मियां की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था !

   बदरू मियां जैसे ही बहार आये तो उन्होंने देखा की उनकी नयी जुतिया गायब है ,और एक पुरानी चप्पल पड़ी है , अब क्या करते वो सर पकड़ कर बैठ गए ,और मन ही मन खूब गालिया दी जूती चोर को !

 अब और कर भी क्या सकते थे वो !

 अब तो ना कोई ख़ुशी थी ना अब मन था अपनी कहानिया सुनाने को दुखी हो गए थे बिचारे !

  बस यही सोच रहे थे कि घर कैसे जाये !

  बेगम से क्या कहे !

  अब तो उन्हें अपना बनारसी पान भी हराम लगने लगा था , पुरे पांच सो रुपये की नयी जुतिया थी !

   पर बदरू मियां ज्यादा देर दुखी रहने वालो में से नहीं थे , उन्होंने पुरानी बातो पर मिटटी डाल अपनी पानदान से एक पान निकालकार खा लिए , और वही पुरानी चप्पल पहन कर आगे चल दिए !

   फिर से वही ठाठ गाने गुनगुनाने की आवाज !


पर इस बार उनके कदम चल पड़े थे , ताश खेलने वाली भीड़ की तरफ !

   अब क्या करते कम से कम एक कहानी तो सुनानी थी !

     तो जनाब मियां पहुंच गए एक ताश की टोली में ...

  बदरू मियां - और भाइयो कैसे हो , कौन जीत रहा है ,आज का बादशाह कौन है !

  अशफ़ाक़ मियां ( अजी इनके नज़रो वाले दुश्मन जो इनकी कहानियो में इंटरेस्ट नहीं लेते है ,हां वही अशफ़ाक़ मियां उन्होंने कहा )

   आओ ..आओ बदरू मियां आज बहुत दिन पर नज़र आये हो ,तबियत तो खैरियत है न !

  बदरू मियां - ( झल्लाते हुए ) अजी तबियत ख़राब हो हमारे दुश्मनो की !

  हम तो इसलिए कुछ दिन नहीं आये क्युकी हजारो काम होते है !

  लोगो के पास फालतू की यहाँ वहां की चार बाते करना हमें पसंद नहीं है , हां ..नहीं तो...!

   आज कैसे आ गए " अशफ़ाक़ ने तुनकते हुए बोला"!

    बदरू मियां - अरे मियां गए थे ,मस्जिद !

वही से आ रहे है , तो सोचा सबसे मिल ले !

  मौलवी जी से तो हमारी अच्छी पहचान है , वो हमें ताबीज दे रहे थे ,कह रहे थे ,बदरू मियां तुम्हारी बहादुरी के किस्से तो सब जानते है ,फिर भी खुद की सुरक्छा के लिए एक ताबीज लेलो , तुम्हारी रक्छा होगी !

  मैंने भी मौलवी साहब को बोल दिया ,कि ये सब हम नहीं मानते ( रुकते हुए एक पान की पिचकारी सामने की दिवार पर दे मारी और फिर शुरू हो गए ) 

   अमा हम तो अकेले ही कई भूतो के दांत खट्टे किये है ,हमारे सामने कोई भूत टिका है भला !

  हां आखिरी बार वाला भूत बहुत ताकतवर था ,पर हम भी कम थोड़े ही थे , 30 मिनट्स फाइट हुई हमारी , कभी वो हमारे ऊपर भारी पड़ता तो कभी हम उसपर !

  पर हमें उसपर गुस्सा आ गया , जब उसने हमारी टोपी को हाथ लगाई !

  फिर क्या था मियां , हमने भी अपना सीना फुलाया और टूट पड़े उसपर ,तोड़ दी हमने साले की गर्दन !

  भला हमारे सामने कहा टिकता !

  हमने तो अच्छे अच्छे भूतो से अपने घर का पानी भरवाया है !

   अशफ़ाक़ मियां ने बदरू मियां को रोकते हुए बोला- अच्छा बदरू मियां आपने उस जंगल का किस्सा सुना है , जो हमारे गांव के उत्तर में एक किलोमीटर की दुरी पर है , कहते है वहां १२ बजे रात के बाद वहा कोई नहीं जाता , वहा एक लम्बे हाथ वाला भूत रहता है ,!

  आप कभी गए हो वहां ,कुछ हुआ है वहाँ !

 बदरु मियॉँ - ऐसी कोई जगह नहीं है ,जहाँ हम ना गए हो !

  अमा हम तो कई बार जा चुके है !

वो भूत तो खुद हमारा मुरीद है , जब भी हम उधर जाते है ,वो जिद पकड़ लेता है की बदरू मियां कई दिनों बाद आये हो ,कुछ सुनाओ वो तो हम है की उसको डाट देते है कि हमारे पास फालतू टाइम तो है नहीं !

  अगर हमारी कहानी सुन्नी है तो आओ हमारे गाँव हम सबके साथ तुम्हे भी अपनी कहानी सुनाएंगे !

  अशफ़ाक़ ने बदरू मियां को रोकते हुए बोला- सुनो ..सुनो .. बदरू मियां ! एक बार हमारी भी सुन लो ,कि सिर्फ अपनी ही सुनाओगे !

  बदरू मियां - अजी बोलो हमने क्या तुम्हारा मुँह बंद कर रखा है !

 अशफ़ाक़ - बदरू मिया इतने सारे लोग है यहाँ !

  हम एक शर्त लगते है , कल तुम रात के 12 बजे     

 गाँव के पास वाले जंगल में तुम जाओगे उस जंगल में एक बरगद का पुराना पेड़ है , उसमे निशानी के लिए एक कील ठोंक कर आओगे ,हम सब सुबह जंगल में देखने जायेंगे !

  अगर तुम यह कर सकोगे तो 500 रुपया मै दूंगा !

  और अगर नहीं कर पाए तो तुम मुझे 500 रुपये दोगे !

  इतने लोगो के सामने हो ! तो बताओ लगाते हो शर्त इसी बहाने तुम्हारी बहादुरी भी पता चल जाएगी !

   और वैसे भी वो भूत तुम्हारा दोस्त है न हां ..हां..हां.. हस्ते हुए बोला !

  अब तो बदरू मियां को काटो तो खून ना निकले !

  आँखे खुली की खुली रह गई , जो भी पान मुँह में था पान की पिचकारी के साथ सब गर्दन से निचे उतर गया और बदरू मियां को पता भी नहीं चला !

  बस उस पल तो बदरू मियां को ऐसा लगा कि काश उनके पास तीर धनुष होता तो अभी अशफ़ाक़ के बच्चे को छलनी कर देता , तब पता चलता अशफ़ाक़ मियां को कि बदरू कौन है !

  पर इतनी भीड़ में बस बदरू मियां अपने नज़रो के तीर ही चला सकते थे !

  इतने में अशफ़ाक़ ने फिर से टोकते हुए बोला - क्या हुआ बदरू मियां डर गए क्या ....!

  बदरू मियां - (तिलमिलाते हुए ) हम्म ..हम्म ..हम क्यू डरे !

   डरते तुम होंगे ,ये तो हमारे बाये हाथ का खेल है ,चलो लग गई शर्त !

   अब क्या करते बदरू मियां उनकी इज्जत पर जो बात आ गई थी , फिर 500 रूपए सुबह ही गवा के आये थे , अजी जूतियो के रूप में , और अब यहाँ 500 रुपये गवाना भारी था !

   फिर शर्त जितने पर 500 रुपये मिलने तो थे ही ऊपर से इज्जत अलग से !

   तो बदरू मियां ने हामी भर दी !

  प्लान बनाया गया कि रात को 11:30 बजे अशफ़ाक़ ,जुम्मन ,बदरू ,बुधुआ और रफीक हम पांच लोग गाँव के बहार मिलेंगे !

  एक कील ,टार्च और हथोड़ा के अलावा और कुछ लेकर नहीं जाना है !

   और कील बरगद के पेड़ में ठोंक कर अपने घर चले जाना है ! फिर सुबह 7 बजे चाय की टपरी पर सब मिलेंगे फिर हम सब साथ जंगल में ठुकी हुई कील देखने जायेंगे , बात तये थी !

   अगली रात पांचो गाँव के बहार मिले !

  रफ़ीक ने डरते हुए बोला - बदरू मियां एक बार और सोच लो !

   बदरू मियां - शेर इतना सोचेगा तो शिकार क्या करेगा , पर बदरू मियां का दिल तो कह रहा था कि तू शेर नहीं तू चूहा है ,भाग जा नहीं तो आज तेरी क़ुर्बानी निश्चित है !

   पर क्या कर सकते थे बदरू मियां ! अब तो इज्जत पर बात बन आई थी !

   रात का वक़्त था हल्की ठण्ड थी हवाओ में तो बदरू मियां ने एक ऊनी टोपी और शाल ओढ़ के आये थे !

   आखिर पैदल जाने की तैयारी हुई और बदरू मियां अकेले शाल ओढ़े एक हाथ में कील हथोड़ा और दूसरे हाथ में टार्च लिए निकल पड़े !

   समय लगभग 11:40 हो गया था !

   सब 10 मिनट बाद घर निकल गए , सबने आपस में ये तये किया कि अब सुबह 7 बजे इसी जगह मिलेंगे !

  इधर बदरू मिया बुदबुदाते चले जा रहे थे !

  बदरू मियां - या अल्लाह ! आज बुरा फस गया ,इस ठण्ड में गलत पन्गा ले लिया !

   बस आज की रात निकल जाये ,फिर हम अशफ़ाक़ के बच्चे को बताते है , चलो कोई बात नहीं !

    500 रुपये भी मेरे बच गए , 500 रुपये की कमाई भी होगी ,और हमारी इज़्ज़त भी बढ़ जाएगी, अच्छा ही है !

   बदरू मियाँ खुद से बात करते - करते आखिर जंगल के करीब पहुंच ही गए !

  जंगल देख के तो बदरू मियां की सिटी पीटी ग़ुम हो गई !

   चारो तरफ अंधेरा लम्बे लम्बे काले काले पेड़ डरावनी शाखाये ,अब तो बदरू मियां को अँधेरे में सारे पेड़ हाथो को फैलाये शैतान नज़र आने लगे !

   बदरू मियां अब क्या करते ...या अल्लाह मदद कर ...या खुदा रहम कर ...यही उनकी जुबान पर था !

   झींगुर की किरकिराहट की आवाज पुरे जंगल में गूंज रही थी ,जब भी कभी टार्च की रौशनी पेड़ो के झुरमुठ में जाती तो चमगादड़ उड़ने लगते ! उस डरावने मंजर को देख बदरू मियां की पतलून गीली होते होते रह जाती !

  टार्च की रौशनी में उन्हें आख़िर कार एक बहुत बड़ा और पुराना बरगद का पेड़ मिल ही गया !

  ये वही भूतिया बरगद का पेड़ था ! 

  इस पेड़ की टहनिया काफी दूर - दूर तक फैली थी , अब इसे देख कर बदरू मियां ने इबादत मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया ....

   

  "या ख्वाजा गरीब नवाज़ सरकार अल मदद"


  यही मंत्र पढ़ते पढ़ते उस बरगद के पेड़ के करीब चले गए ,और जाकर बदरू मियां ने कील आखिर कार पेड़ में ठोंक ही दिया !

  बदरू मियां पेड़ पर कील ठोकते वक़्त जोर जोर से साबर मन्त्र पढ़ते रहे...

    

    " बिस्मिल्ला हे रेहमान ए र्र्हीम

   उदम बीबी फातमा मदद शेरे खुदा ,


चड़े मोहमंद मुस्तफा मूजी कीते जेर ,वरकत हसन हुसैन की रूह असा वल फेर !

   

   कील ठोंक कर बदरू मियां ने चैन की सांस ली ,और ख़ुशी - ख़ुशी घर की तरफ चलने को तैयार हुए !

     पर....किसी ने बदरू मियां को उनके शाल से पकड़ लिया !

  अब बदरू मियां की आवाज बंद हो गई !

  बदरू मियां अब ना तो हिल पा रहे थे , ना ही कुछ बोल पा रहे थे , इतने में बदरू मियां डर से बेहोश हो गए !

  पूरी रात वो उसी पेड़ के निचे पड़े रहे !..

 इधर सुबह सुबह 7 बजे जुम्मन बुधुआ रफ़ीक और अशफ़ाक़ चारो चाय की तफरी पर मिले पर बदरू मियां वहां नहीं आये !

   अब ये चारो डर गए कि कोई अनहोनी तो नहीं हो गई , बदरू मियां आखिर आये क्यू नहीं !

  तभी जुम्मन ने डर को छिपाते हुए कहां क्या पता घर पर सो रहे हो ,आखिर कल वापसी में एक से ज्यादा ही बज गए होंगे !

  सबने जुम्मन की बात पर सहमति जताई ,और चाय पीकर पहुंच गए , बदरू मियां के घर !

  दरवाजे पर दस्तक देते हुए अशफ़ाक़ ने आवाज लगाई बदरू मियां ...ओ बदरू मियां ...

 तभी दरवाजा बदरू मियां की बेगम ने खोला    अशफ़ाक़ बोला " भाभी जान बदरू मियां कहा है अभी सो रहे है क्या !

  बदरू की बेगम ने बताया कि वो तो कल रात से आये ही नहीं वापस !

  कह गए थे कि दोस्त के घर जा रहे है , आखिर बात क्या है , बदरू मियां के बेगम ने पूछा !

  अशफ़ाक़ घबराता हुआ " कुछ नहीं ...कुछ नहीं भाभी जान !

  यूही बस पूछ रहे थे , हमें लगा सो रहे होंगे , चलिए कोई बात नहीं भाभी जान अल्लाह हाफिस 

  सभी बदरू मियां के बेगम से अलविदा ले जंगल की तरफ भागे !

  अब सब डरे हुए थे ,किसी बड़ी अनहोनी से !

  सब अशफ़ाक़ को कोसते हुए जंगल की तरफ निकल पड़े !

  सबके मन में एक अंजना सा डर था ,अशफ़ाक़ को भी खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि बदरू मियां से उसे शर्त नहीं लगाना चाहिए थी ! अगर कुछ हो गया बदरू मियां को तो सारा दोष अशफ़ाक़ पर ही आएगा ! डर से अशफ़ाक़ की साँसे तेज़ हो रही थी !

  जंगल पहुंच के देखा तो बदरू मियां बरगद के पेड़ के निचे बेहोश पड़े मिले !

  अशफ़ाक़ को तो जब पता चला कि बदरू मियां ठीक है तो जान में जान आई , बदरू मियां के चेहरे पर पानी के छींटे मारे गए कि वो होश में आ सके !

   बदरू मियां को होश आया तो वो जम्हाई लेते हुए उठे , और सबको पास देखकर कसमसाते हुए बोले !  

  तुम... तुम सब यहाँ कैसे मैंने तो कील ठोंक दिया था !

  फिर सोचा कि इतनी रात हो गई है , अब घर क्या जाना यही सो लेता हू , और यही सोचकर मैं यही सो गया , घर नहीं गया !

   तभी सबकी नज़र कील पर पड़ी , और सब हसने लगे !

  तभी बदरू मियां की नज़र भी उस पेड़ पर ठुकी कील पर गई , वो तो शर्म के मारे सर झुका लिए , बदरू मियां को भी समझ आ गया था कि कल रात उनको किसी भूत ने नहीं रोका था , गलती से रात में उन्होंने ही अपनी शाल के साथ साथ कील को पेड़ में ठोंक दिए थे !

  और जिसके कारण उनको वहम हुआ कि कोई भूत उनके शाल को खींच रहा है , और वो डर के मारे बेहोश हो गए !

   अब उनके पास कुछ बोलने को नहीं था , तो बदरू मियां ने सबको सच बता दिया ,सब हस पड़े !

   इस शर्त में तो अशफ़ाक़ को 500 रूपए देने पड़े ,क्युकी बदरू मियां ने पेड़ में कील ठोंक ही दिया था !

   साथ ही साथ बदरू मियां के संग उन चार लोगो के दिमाग से भूत का डर निकल गया था !

 और हमारे बदरू मियां सच में एक बहादुर इंसान के रूप में पुरे गाँव में फेमस हो गए !

  अब सबको समझ आ गया था कि किसी भी प्रकार का डर हमारे दिमाग में होता है , बाहर तो कुछ होता ही नहीं है ,जिससे हमें डरना चाहिए !

   

  दोस्तों यही जीवन की सच्चाई है डर जैसा कुछ भी नहीं होता है बस डर हमारे दिमाग में होता है !

 तो प्लीज आप अपने डर को खुद पर हावी ना होने दें , आप जरूर तरक्की करेंगे और मन भी शांत रहेगा .....।            

   

   

    


     

 


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