बदमाश कंपनी-5
बदमाश कंपनी-5
मस्ती इस वक़्त लॉकअप के लोहे के सरियों को पकड़ कर चरसी की ओर ही देख रहा था। चरसी भी उसे आंखे फाड़े हुए देख रहा था।मस्ती के होठो पर हल्की सी मुस्कान उभरी और उसने चरसी को इशारे से अपने पास बुलाया। चरसी उसकी ओर ही देखते हुए लोहे के उन्ही जंगलों को पकड़ कर खड़ा हो गया...जिन्हें मस्ती ने भी थाम रखा था।
" साले !तू जानता भी है तूने क्या कर डाला है...कोतवाली के सबसे बड़े साहब का ही मोबाइल उड़ा डाला...वो भी इतना महंगा मोबाइल की उस साहब को रात भर नींद भी नही आई...उस हरामी यादव को रात भर तुम्हारी तलाश में दौड़ाए है..और अब तेरा इसी लॉकअप में हवाई जहाज बनाने की तैयारी कर रहे है" मस्ती ने बातों बातों में ही चरसी का सारा नशा उतार दिया था।
" मस्ती भाई क्या करूँ...बहुत बड़ी गलती हो गया यार....मेरे पास से तो अब वो मोबाइल भी गायब हो चुका है...पता नही मेरी बेहोशी का फायदा उठाकर कौन मेरी जेब से निकाल कर ले गया है" चरसी ने मस्ती की बात सुनते ही अपने ड्रामे को तिलांजलि दे दी थी।
" तू बेहोश कैसे हुआ था...तू चरस के सुट्टे मारकर तो आज तक बेहोश नही हुआ...फिर कल कैसे हो गया" मस्ती ने उसे कुरेदा।
" अरे यार कल वो चरस की पुड़िया लेकर जैसे ही मलखान के।अड्डे से बाहर आया...वो साली फरजाना नज़र आ गई मुझे उस सिनेमा हाल के पास...बस उसी को कल रात अपने साथ सुलाने की फिराक में उसके पास गया था...लेकिन साली छिनाल ने अपनी ऐसा बेइज्जती मारा की मै उस पर झपट पड़ा...लेकिन उस साली ने मुझे ऐसा धक्का दिया कि अपन सीधा दीवार से टकराया और बेहोश हो गया" चरसी ने कल रात की पूरी बात बताई।
" कही वो फरजाना ही तो उस मोबाइल को नही ले उड़ी" मस्ती ने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए।
" हो सकता है...लेकिन मेरी बात पर ये पुलिसिये तो भरोसा करेगे नही...ये तो यही समझेंगे की मै उस मोबाइल को बेच ख़ाया..क्योकि उस मोबाइल को बेचते हुए ये यादव मुझे चांद सेठ के पास एक बार देख भी चुका है" चरसी ने मस्ती को बोला।
" जब तू मोबाइल लेकर चांद सेठ के पास पहुंच ही चुका था तो तुमने उसे उसी समय क्यो नही ठिकाने लगाया" मस्ती ने गुस्से भरे स्वर में बोला।
" भाई वो स्याना कूड़े के भाव इतने महंगे मोबाइल को लेने की फिराक में था...इसलिए मैं उसके पास से वापस आ गया था" चरसी ने अफ़सोस भरे स्वर में बोला।
" चल मै इस बारे में यादव से बात करता हूँ..हो सकता है तू पुलिस वालों की मार से बच जाए...लेकिन मुझे लगता नही की ये मोबाइल मिलने के बाद भी तुझे छोड़ेंगे...तेरे इस काम की वजह से उस काम की भी वाट लग गई है...अब पुलिस के आगे उस प्लान के बारे में कोई मुंह मत खोलना..मैं करता हूँ उस फरजाना को और उस मोबाइल को ढूंढने की कोशिश" मस्ती ने एक ही सांस में उसे समझाइश दे दी थी।
" समझ गया भाई...ये चरसी पुलिस की मार खाते खाते भले ही मर जाये...लेकिन अपनी जुबान नही खोलेगा...अपन दोस्ती में गद्दारी नही करेगा दोस्त" चरसी ने मस्ती को भरोसा दिया।
" मुझे तुझ से यही उम्मीद है...अगर हमने तेरे बिना भी उस काम को किया तो...तब भी तेरा हिस्सा उस काम मे रहेगा..जब भी यहां से बाहर आएगा....तुझे तेरा हिस्सा मिल जाएगा...ये मस्ती का वादा है..मैं यादव से मिलकर जाता हूँ अब" ये बोलकर मस्ती वहां से यादव के कमरे की ओर बढ़ गया। कमरे में घुसते ही यादव ने उम्मीद भरी नजरों से मस्ती को देखा।
" उसने ड्रामा बन्द किया या नही" यादव ने पहला सवाल उसके याददाश्त गुम हो जाने के चरसी के ड्रामे के बारे में ही किया।
" साहब वो अपने चिलगौजे को शॉर्ट मेमोरी लॉस वाला ही बीमारी है..वो जो गजनी फ़िल्म में गजनी को था...रात को चरस के नशे में उसे कुछ याद नही रहा था साहब...,अब उसने सब बताया है मुझे" मस्ती ने बात बताने की भूमिका बनाई।
" साहब के मोबाइल के बारे में बता दिया उसने" यादव के चेहरे पर एक चमक उभरी।
" साहब मोबाइल तो उसके पास नही है..उसने मोबाइल को बेचा नही था..जब वो बेहोश हुआ तब मोबाइल उसकी जेब में ही था...लेकिन रात को उस वक़्त एक फरजाना नाम की आइटम साथ में थी साहब..उस से चरसी का साथ मे सोने को लेकर झगड़ा हो गया था..उसी झगड़े में फरजाना ने उसे धक्का दिया था और चरसी का सिर दीवार में जाकर टकराया था..जिससे वो बेहोश हो गया था...मुझे लगता है वो फरजाना ही उस मोबाइल को चरसी की जेब से निकाल कर ले गई है" मस्ती ने पूरे विस्तार से ज्यो ही यादव को बताई...यादव के चेहरे पर जलने वाली एल ई डी बल्ब की चमकने वाली रोशनी अब जीरो वाट के बल्ब में बदल चुकी थी।
" साले ने खुद के बचने के लिए कहानी तो अच्छी तो बनाई है...तुम्हे क्या लगता है कि हम उसकी कहानी पर विश्वास कर लेंगे..साले के पिछवाड़े में डंडा डालकर उगलवा लेगे की उसने मोबाइल को कहां ठिकाने लगाया है" यादव मस्ती की बात सुनते ही आपे से बाहर हो चुका था।
" साहब!उसने सब मेरे सामने बोला है तो झूठ नही बोला होगा..मुझे शाम तक का समय दो साहब...मैं उस फरजाना को ढूंढ कर सारी सच्चाई मालूम कर लूँगा...साहब का मोबाइल हर हाल में ढूंढ कर ला दूंगा" मस्ती नही चाहता था कि सर्दी के इस मौसम में चरसी की पुलिसिया तुड़ाई हो।
" मस्ती तुम समझते नही हो..मेरी खुद की नौकरी इस वक़्त सूली पर टंगी हुई है...अगर आज साहब का मोबाइल नही मिला तो मुझे सस्पेंड करने का आर्डर साहब अपने हाथ मे लेकर बैठे है...इस साले चरसी की वजह से अगर मैं सड़क पर आ गया तो इसे जिंदा नही छोडूंगा" यादव की अपनी परेशानी अब उसकी जुबान से छलक आई थी।
" साहब आपकी परेशानी मेरी परेशानी...बस आज शाम तक कि मोहलत दे दीजिये...फिर जो आपका दिल करे उस चिलगौजे के साथ सलूक करना...एक फर्ज तो मुझे भी दोस्ती का निभाने दीजिये" मस्ती ने चिरोरी भरें अंदाज में बोला।
" ठीक है..मैं साहब को कुछ और कहानी सुनाऊंगा....शाम तक का वक़्त दिया तुझे...लेकिन एक बात याद रखना..अगर शाम तक मोबाइल नही मिला..तो उसी चरसी के साथ मार खाने का एक और फर्ज निभाना तुम" यादव ने जलती हुई निगाह से मस्ती को घूरा। मस्ती यादव की बात का कोई भी जवाब दिए बिना ही उसे सलाम ठोकता हुआ कमरे से रुखसत हो गया।
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मस्ती के सामने इस वक़्त सबसे बड़ा चैलेन्ज फरजाना को ढूंढ़ने का था...इसलिए उस वक़्त वो उस मन्नत नाम के सिनेमा हाल के पास पहुंच चुका था...जहाँ कल रात को चरसी की उससे मुलाकात हुई थी। उसे इस बात का तो अंदेशा था की वो दिन में उसे वहां नही मिलेगी...लेकिन उसका यहां आने का इस समय एकमात्र मकसद था कि उसे फरजाना के किसी दूसरे ठिकाने के बारे में पता लगाना।वो टहलते हुए सिनेमा हाल के बराबर में ही बनी एक पान की गुमटी पर पहुंच चुका था ।मस्ती को शौकिया तौर पर कभी कभी सिगरेट के सुट्टे लगाने से कोई परहेज नही था। उसने उस पान की गुमटी पर पहुंच कर अपनी पसंद के ब्रांड की एक सिगरेट लेकर सुलगाई और उसका एक कश खिंचने के बाद उस पान वाले से मुखातिब हुआ।
" क्यो भैया!रात को सिनेमा के आखिरी शो तक दुकान खुली रखते होंगे" मस्ती ने ऐसे ही लापरवाह स्वर में पूछा।
" हॉं भैया...आखिरी खेला छूटे तक का तो इंतजार करना ही पड़ता है..उसके बाद ही घर जाते है" पनवाड़ी ने भी उसी लहजें में मस्ती की बात का जवाब दिया।
" फिर तो भैया रात को जो सिनेमा के बाहर घूमने वाली उन तितलियों को भी रोज ही देखते होगे" मस्ती धीरे धीरे अपने मतलब की बात पर आते हुए बोला।
" अरे भैया..उन सबन से हम कोसों दूर रहत है..अपनी दुकनवा पर उनको फटकने भी नही देत है" पनवाड़ी ने मस्ती की बात का चिढ़े से स्वर में जवाब दिया।
" वो तो ठीक है...लेकिन जान पहचान तो ही ही जाती है जब रोज रोज कोई आसपास ही मंडराता रहता है" मस्ती ने बात को आगे बढ़ाया।
" हाँ थोड़ी बहुत जान पहचान तो हुई हैं जात है...लेकिन हम किसी को ज्यादा मुंह नही लगाते है कभी" पनवाड़ी ने लगे हाथो अपनी सफाई भी दी।
" कल रात को एक फरजाना नाम की धन्धे वाली औरत का यहां कोई झगड़ा देखे थे क्या" मस्ती अब मुद्दे की बात पर आया।
" अरे अइसन झगड़ा तो उस ससुरी का यहाँ रोज होत है...और उस ससुरे चरसी चिलगौजे को तो सारा शहर जानत है...ससुर उस फरजाना का एक धक्का नही सहन कर पाया और जमीन पर गिरते ही बेहोश हो गया" पनवाडी एक व्यंग्य भरी हँसी हँसते हुए बोला।
" तुम जानते हो क्या की वो फरजाना रहती कहाँ है...यहां कब आती है..दरअसल मुझें उससे एक जरुरी काम है" मस्ती ने पनवाडी की ओर देखकर बोला तो पनवाड़ी असमंजस में उसे घूरता रह गया था।
" क्या भैया...दिन में ही चसक उठ आई क्या..या हमको उस ससुरी का कोनो दल्ला समझे हो...जो हमसे उसका पता पूछत हो" पनवाड़ी एकदम से हत्थे से उखड़ गया था।मस्ती ने एक बार गौर से उसके चेहरे को देखा...फिर हाथ मे पकड़ी सिगरेट में आखिरी कश मारा...और उस गुमटी पर लगे लकड़ी के फट्टे पर ही उसे रगड़ कर बुझाया और उसे पनवाडी के कूड़ेदान के हवाले करते हुए पनवाडी से फिर से मुखातिब हुआ।
" जब चरसी को पूरा शहर जानता है तो आधा शहर तो चचा...मस्ती को भी जानता होगा" मस्ती ने सर्द स्वर में पनवाडी को बोला।
" हाँ भैया!नाम बहुत सुने है उनका मोहल्ले में...लेकिन कभी देखे नही है उनको" पनवाडी असमंजस से अभी भी मस्ती को ही देखे जा रहा था।
" नही देखे हो तो आज देख लो..हम ही मस्ती है" ये बोलकर मस्ती के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिली।
" तुम मस्ती भैया हो...गलती हो गई भैया...माफ कर दो..कुछ उल्टा सीधा बोल दिये हो तो.….माफ कर देना" पनवाड़ी हाथ जोड़ते हुए बोला।
" माफी क्यो मांग रहे हो चचा!हम कोई इलाके के कोई विधायक थोड़े ही है..जो हमे हर कोई पहचानेगा...बस अब हमें इतना बता दो की ये फरजाना रहती कहाँ है...वो क्या है कि उस औरत ने कल रात को चरसी को बहुत बड़ी सेन्धी लगा दी है...इसलिये उससे मिलना बहुत जरूरी है" मस्ती ने एक बार फिर से फरजाना का पता पूछा तो पनवाडी बिना किसी हिलहुज्जत के बताता चला गया।
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प्रेमनगर की रेलवे लाइन के पास ही एक छोटी मस्जिद के पास ही फरजाना की खोली मस्ती को मिल गई थी। अपने धन्धे की वजह से वो पूरी झुग्गी बस्ती में मशहूर थी। मस्ती ने जब उसकी खोली का दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा अलसाई सी फरजाना ने ही खोला था।
" तुम्ही फरजाना हो..तुमसे कुछ बात करनी है" मस्ती ने सीधा सपाट लहजें में बोला।
" लेकिन तुम कौन हो..और अगर दिन में ही अपनी चुल मिटाने आये हो तो साफ साफ सुन लो...मैं अपनी खोली में धन्धा नही करती हूँ" फरजाना ने सख्त स्वर में बोला।
" मस्ती नाम है मेरा...और चरसी के बारे में तुझ से बात करने आया हूँ..कल रात को तू उसी के साथ थी न...और इस वक़्त वो कोतवाली में पुलिस की पकड़ में है,..इसलिये मुझे तेरे पास आना पड़ा है" मस्ती ने सीधा सीधा बोला।
" लेकिन अपुन ने तो रात के झगड़े के बारे में कोई पुलिस कंपलेंट नही किया..ये तो अपने धन्धे में रोज का मारामारी है..फिर पुलिस ने उसको काहे को पकड़ा" फरजाना बड़ी मासुमियत से बोली।
" पुलिस ने तेरे साथ मारामारी के लिये उसे नही पकड़ा..बल्कि उस मोबाइल के लिये पकड़ा है..जो तू उसकी जेब से उड़ा कर लाई है...तू जानती है वो मोबाइल कोतवाली के नए इंस्पेक्टर साहब का है..उसने रात में ही सिनेमा हाल के बाहर लगे हुए कैमरे में तुझे चरसी की जेब से मोबाइल निकालते हुए देख लिया है...पुलिस तुझे ढूँढतें हुए यहां भी बस आती ही होगी" मस्ती ने कैमरे के बारे में बल्फ मारते हुए फरजाना के चेहरे पर नजर जमाकर उसका रिएक्शन देखना चाहा।रिएक्शन उसकी अपेक्षा के अनुरूप था। फरजाना परेशान चेहरे के साथ ही नही बल्कि परेशान निग़ाहों से भी मस्ती को देख रही थी।
" लेकिन उस मोबाइल को तो रात को ही दो लुक्खे लोगों ने मेरे पास से उड़ा डाला...मैं सुबह से चार बार उनकी खोली पर जाकर उन्हें ढूंढ आई हूं...लेकिन वो हरामखोर रात से ही अपनी खोली पर आए नही है" फरजाना की बात सुनते ही मस्ती अपने माथे पर हाथ धर कर बैठ गया।
" साला चोर के ऊपर मोर तो सुना था अब मोर के ऊपर की कहावत तो मुंशी प्रेमचंद भी नही लिख कर गए...अब ये दोनों लुक्खे कौन है" मस्ती ने परेशानी से फरजाना को देखा।
" है दो कमबख्त मारे...सालो ने कल रात को एक अंधेरी गली में मेरे साथ लूटपाट करने की कोशिश की थी...पहले मैंने सोचा कि मेरे साथ जबरदस्ती करेगे...लेकिन तभी अँधेरे में भी उन्हें पहचान लिया कि दोनो साले इसी बस्ती के फुकरे सुल्तान और नौशाद थे" फरजाना एक ही सांस में बोली।
" जब तुमने उन्हें पहचान लिया था...फिर उन्होंने तेरे पास से मोबाइल कैसे उड़ा लिया" मस्ती ने शक्की निगाहों से उसे देखा।
" उन में से एक हलकट का असल धन्धा ही पॉकेट मारी का है...जिस दिन कोई ढंग का आसामी नही फंसता है उसी दिन वे लूटमार करते है...वे दोनों ही अँधेरे में मुझ पर झपटे थे...तभी उस हलकट ने मेरी जेब साफ कर दी" फरजाना क्षुब्ध स्वर में बोली।
" लेकिन अगर वो मोबाइल आज शाम तक मुझे नही मिला तो वो पुलिसिया चरसी को इस दुनिया से साफ कर देगा...और अगर चरसी को कुछ हुआ तो मैं इस दुनिया से तुम तीनो को साफ कर दूंगा...तेरे को एक बार पहले भी अपना नाम बता चुका हूँ...अब दूसरी बार भी सुन ले...मस्ती नाम है मेरा" मस्ती ने बर्फ से भी ठंडे स्वर में बोला तो फरजाना के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
" तुम्हारा नाम बहुत सुना है अपन ने मस्ती...और कसम से मेरे पास मोबाइल होता तो मैं उसे लेकर खुद तेरे साथ कोतवाली चलती...लेकिन अब तो उन दोनो हलकट को ढूंढना ही पड़ेगा" फरजाना ने मजबूरी भरी आवाज में बोला।
" ठीक है चल मुझे उसकी खोली दिखा" मस्ती ने उसकी और देखकर बोला। मस्ती के बोलते ही फरजाना ने अपनी खोली का दरवाजा तक बन्द नही किया और उसके आगे आगे चल दी। कोई चार झुग्गियों की लाइन पार करने के बाद एक खोली के आगे ले जाकर फरजाना ने मस्ती को खड़ा कर दिया। खोली पर लगा हुआ ताला दूर से ही उनका मुंह चिढ़ा रहा था।
" किसे ढूंढ रही फरजाना" तभी एक राह चलता हुआ आदमी उन लोगो के पास रूककर फरजाना से पूछने लगा।
" इन्ही दोनो हलकट को ढूंढ रही हूँ काका" फरजाना ने उन बुजुर्गवार से बोला।
" खोली के इस दरवाजे पर तो तुम्हे हमेशा ताला ही लटका मिलेगा....अगर इस खोली में जाना है तो बराबर वाली खोली में जाओ..वहाँ से इस खोली में जाने का रास्ता मिलेगा...दोनो अंदर ही पड़े होंगे" वो आदमी ये बोलकर एक हल्की सी हँसी हँसता हुआ आगे बढ़ गया।
" ये क्या गौरखधंधा है इन लोगो का" ये बड़बड़ाते हुए फरजाना उस साथ वाली खोली में घुस गई।मस्ती ने भी उसी का अनुसरण किया।अंदर खोली की दीवार तोड़कर उस खोली में जाने का रास्ता बनाया हुआ था। फरजाना ने उस दीवार के पार जैसे ही झांका उसके माथे पर पसीना और होठों पर चीख़ एक साथ उभरी थी। उसकी चीख़ की आवाज सुनकर एकबारगी तो मस्ती भी घबरा गया था।
" क्या हुआ" मस्ती ने उसी घबराई हुई आवाज में पूछा।
" वो अंदर...वो अंदर" बस फरजाना अपने मुंह पर हाथ रखते हुए इतना ही बोल पा रही थी। मस्ती ने तेजी से फरजाना को एक तरफ धकेला और अंदर झांक कर देखा। अंदर देखते ही मस्ती की सारी मस्ती काफूर हो गई। अंदर एक बन्दा खून से लथपथ पड़ा था..और उसकी आतंडिया बाहर निकली पड़ी थी।
" कौन है ये" मस्ती ने हकलाई हुई आवाज में पूछा।
" नौशाद है ये" फरजाना की आवाज से भी घबराहट झलक रही थी।
" यहां से बाहर निकलो जल्दी" मस्ती ने अब वहां से फूटना ही सही समझा था। फरजाना को भी कुछ और नही सूझा था और वो फौरन दरवाजे की ओर बढ़ गई। दरवाजा खोलते ही इंस्पेक्टर राज मल्होत्रा और यादव उन्हें दरवाजे पर ही चार सिपाहियों के साथ खड़े हुए नजर आए।
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" कहाँ भाग रहे हो दोनो लैला मजनू" राज मल्होत्रा ने उन दोनों का रास्ता रोकते हुए कहा।
" वो अंदर...वो अंदर नौशाद का किसी ने कत्ल कर दिया है" मस्ती से पहले इस बार फरजाना बोल पड़ी थी।
" कत्ल की ख़बर तो हमे लग चुकी है...लेकिन क़ातिल भी मौके पर मौजूद मिलेंगे..ये नही पता था" इंस्पेक्टर राज ने एक कुटिल मुस्कान के साथ उन्हें देखते हुए बोला।
" ये आप क्या कह रहे हो साहब..हम तो अभी अभी आये थे यहां..ये तो पहले से ही मरा पड़ा हुआ है" इस बार मस्ती थोड़ा सा साहस बटोर कर बोला।
" चलो..यही साइड में खड़े हो जाओ..भागने का प्रयास मत करना..वरना दोनों का यही एनकाउंटर कर दूंगा" राज मल्होत्रा ने उन्हें एक हाथ से एक तरफ होने का इशारा किया।
" साहब हम क्यो भागेंगे...हमने जब कुछ किया ही नही है तो" मस्ती अब तक अपने होश सम्हाल चुका था।
" ये तो जांच के बाद पता चलेगा कि तुम लोगों ने कुछ किया है या नही...यादव दो आदमियों को इन लोगो पर नजर रखने के लिए यहां तैनात कर दो" ये बोलकर राज मल्होत्रा अंदर की तरफ बढ़ गया।
" बेटा मोबाइल ढूँढ़ने के लिए बोला था न कि किसी का कत्ल करने के लिए..बेटा इस बार हमेशा के लिए अंदर जाएगा" यादव ने अजीब से स्वर में उसे बोला।
" यादव साहब...हमने कुछ नही किया..हम तो मोबाइल की तलाश में ही यहां तक पहुंचे थे" मस्ती ने यादव को बोला।
" साहब का मोबाइल तो घन्टा भर पहले ही चांद सेठ ने लौटा दिया है..आज सुबह ही कोई उसके पास मोबाइल बेचने के लिए आया था..तभी चांद सेठ ने उसे पकड़वा दिया था" यादव ने भले ही एक मुसीबत से छुटकारे की खबर उसे सुनाई थी...लेकिन उससे भी बड़ी मुसीबत उसके सामने मुंह बाए खड़ी थी।
" यादव फोरेंसिक वालो को बुला लो...मामला संगीन है" राज मल्होत्रा ने यादव को आवाज देते हुए बोला।
" कौन हो तुम दोनो" राज अब उन दोनों से मुखातिब हो चुका था।
" जी मेरा नाम मस्ती है...वो जो आपका मोबाइल चोरी के इल्जाम में चरसी आपकी कोतवाली में बन्द है...उसका दोस्त हूँ..आपके मोबाइल की तलाश करते हुए ही हम दोनो यहां पहुंचे थे...यहां आकर देखा तो अंदर इस बन्दे की लाश पड़ी हुई थी...हम तो बाहर निकल कर पुलिस को फ़ोन करने ही वाले थे कि आप पहले ही दरवाजे पर खड़े हुए नजर आ गए" मस्ती ने अपनी सफाई पेश की।
" और तुम" अब राज फरजाना की ओर घूम चुका था।
" साहब मैं तो इसी बस्ती में रहती हूँ....फरजाना नाम है..कल रात को वो मोबाइल मै ही उस चरसी की जेब से निकाल कर लाई थी....लेकिन रास्ते मे ही एक ये जो अंदर मरा हुआ पड़ा है और एक इसका दोस्त था साहब....उसने मेरे से वो मोबाइल की पॉकेटमारी कर दी थी..अभी इस मस्ती ने बताया कि वो मोबाइल कोतवाली के सबसे बड़े साहब का है और पुलिस मुझे भी ढूंढ रही है तो मैं इस मस्ती को लेकर इधर आई थी साहब" फरजाना ने एक ही सांस में सब बोल डाला था।
" अच्छा..तो ये कत्ल उस मोबाइल के लिए हुआ है...जो हमे पहले ही मिल चुका है" राज ने आश्चर्य से बोला।
" अरे साहब हम बोली न की ये बन्दा पहले से ही इधर मरा पड़ा था" फरजाना तपे हुए स्वर में बोली।
" ये तो अभी पता चल जाएगा कि ये पहले से ही मरा पड़ा था...या तुम पहले ही इसे मारकर..अब पकड़े जानें पर ड्रामा कर रही हो" राज के स्वर में एक बार फिर से कुटिलता आ चुकी थी।
" हाँ साहब! इसने मुझें पहले बताया था कि ये पहले भी तीन चार बार या आकर जा चुकी थी" मस्ती ने भी अब शक्की निग़ाहों से उसकी ओर देखा। फरजाना ने ये सुनते ही गुस्से भरी नजरों से मस्ती की ओर देखा।
" साले हलकट..क्यो आई थी..वो भी तो बता साहब को..आधी अधूरी बात बोलकर क्यो मेरा पुलंदा बंधवा रहा है हरामी" फरजाना गुस्से में ये भी भूल चुकी थी कि उसके सामने इस वक़्त कौन खड़ा है और बो किसको गरिया रही थी।
क्रमशः
