अपनी तलाश
अपनी तलाश
"अ रे !औरतें तो रसोई संभालती ही अच्छी लगती हैं।
सारी सुख सुविधाएं घर ही मिल रही है तो क्या जरूरत है नौकरी करने की !
एक ही बच्चा है !
काम ही क्या है इसके घर में !"
ये पूरा साल इसी तरह की बेतुकी बातें सुनकर बीत रहा था।
कुछ की बातें सुनती, कुछ की नहीं।
कुछ लोगों की बातों पर प्रतिक्रिया देती; कुछ के लिए इगनोर ही उनका जवाब था।
कुछ बातों के जवाब वक्त पर छोड़ दिए।
लॉकडाउन ने सबको बता दिया ; घर रहकर हम स्त्रियां करती ही क्या है !
लॉकडॉउन में घर की सफाई भी फुर्सत से हुई और मन की भी।
सफाई करते वक्त अलमारी से पुरानी डायरी मिली।
पढ़कर मैं खुद भी हैरान हुईं, इतना कब सोचा मैंने।
यूं लगा जैसे किसी पुरानी दोस्त से मिली हो जो मेरी खोई हुई यादाश्त याद दिलाने की कोशिश कर रहा है।
एक एक कविता, छंद मेरे दिल पर दस्तक दे रहा था; जैसे कह रहा हो -" खोल दो दिल के दरवाजे, कुछ राज अनकहे अब तो कह दो !"
थोड़ी सी पंक्तियां पढ़ी इतने में बेटे की आवाज़ आई -"मम्मा भूख लगी है ! पापा के लिए भी चाय बना दो !"
डायरी ने मुझे और मैंने डायरी को ऐसे देखा; जैसे दो प्यार करने वाले जमाने से नजरें चुराकर बरसो बाद मिले हों और वो मुलाक़ात भी बस कुछ पल की।
रसोई के बर्तन भी आज कुछ अलग ही मूड में दिखे, आज मैं खुश सी थी।
लंच करते वक्त टीवी पर ख़बरें चल रही थी, आज इतनी मौत। कॉरोना का कहर !
ऐसा लगा की हम औरतें जिन खुशियों को टालती रहती हैं, आज नहीं फिर कभी ! कहीं वक्त ही ना मिले उन्हे जीने का !
यहां तक की कोई नया पर्स भी लिया हो तो सोचती है इसे रख लेते हैं;इस फंक्शन में प्रयोग करेंगे।
इस ड्रेस को उस फंक्शन में पहनेंगे।
कॉरोना ने सबको बंद कर दिया घरों मे। ऐसी ही महामारी आती रहीं तो हमारी स्थगित की हुईं छोटी छोटी खुशियां हम मनाएंगे कब !
सिर्फ़ जनगणना में शामिल होने के लिए थोड़ी जन्म लिया है !
फिर याद आया कि वक्त ही कहां है ! अब पहले की तरह बेफिक्री से खुद की खुशियां जीने का !
फिरख्याल आया क्या पता कितना वक्त बचा है ज़िन्दगी का !
मरने के बाद जो लोगों का मेला लगता था, इस बीमारी ने तो वो भी बंद कर दिया।
हम निपट भी लेंगे तो रिश्तेदारों तक भी बस खबर ही पहुंचेगी, कोई हमारा अफसोस करने नहीं आयेगा; ना दूर बैठे अफसोस करेगा।
सब बस भगवान से खुद की सलामती की दुआ करेंगे।
फिर ये सब लोगों की बातें, वक्त का झंझट ; ये सब धरा रह जाएगा।
फिर अगले दिन मैंने शुरुआत की , नई तरह से जीने की।
पुराने ढांचे को तोड़ने की !
जब सब 9 -10 बजे तक सोए रहते तो मैंने 6 बजे उठना शुरू किया।
थोड़ा सा ध्यान मुद्रा में बैठने की कोशिश कि, क्यूंकि उन दिनों मेडिटेशन वाले गुरु खूब ऑनलाइन पैसा कमा रहे थे !
पर सच कहूं तो 5 मिनट से ज्यादा ध्यान नहीं लगा पाई।
मन शायद ढूंढ रहा था किसी को ! ऐसा एहसास जैसे नव युवक युवतियों में पहले प्रेम के बाद आता है कि मुलाक़ात बेशक ना हो, बस दीदार हो जाए !
तो लेकर बैठ गई अपनी डायरी को।
कुछ नई पंक्तियां लहरें लेने लगी जैसी फिल्मों में होता है डॉक्टर सांस ढूंढने के लिए शॉक देते हैं और बेजान शरीर तड़प पड़ता है, बिल्कुल वैसे ही सोई हुई ख्वाहिशें,शिकायतें,खुशियां,एहसास फिर से जीने को तड़प रहे थे।
कुछ लिखा ! व्हटास ऐप स्टेटस पर लगाया।
पुराने दोस्तों, बहनों, सहकर्मियों ने खूब हौंसला बढ़ाया।
बस फिर फेसबुक वॉल तक पहुंची, पहले तो अकाउंट की प्राइवेसी बस फ्रेंड्स तक ही रखी।
क्यूंकि दूसरों की ज़िन्दगी में तांका झांकी वालों के लिए ये फेसबुक वो नुक्कड़ है जहां ताश खेलते पुरुष दूसरों की स्त्रियों को घूंघट में से निहार कर भी बता देते हैं कि कौन है, कैसी है !
गली में बैठी औरतों उनकी पूरी कुंडली बना देती है।
फिर सोचा इतना भी क्या घबराना सबसे। मरने के बाद ये बिचारी !अच्छी थी !
इतना कहने भी ना आयेंगे।
तो मोम्सप्रेसो पर एक आर्टिकल लिखा। थोड़े दिन बाद एक ब्लॉग बनाया, अच्छा लगा लिखना।
फिर एक दिन फेसबुक पर प्रकाशित हुई 100 शब्दों की कहानी तो और भी अच्छा लगा ।
हौसलों को रॉकेट से उड़ान मिली और फेसबुक की प्राइवेसी फ्रेंड्स से हटकर पब्लिक हो गई।
वीडियो चैलेंज बनाया , उससे तो जैसे बंजर पड़े खेत में फसल उग आई।
फिर दूसरे प्लैटफॉर्म्स पर भी लिखना शुरू किया।
अब रिश्तेदार और पुराने दोस्तों और कुछ दोस्त नाम के ढोंगियों में भी हलचल सी शुरू हो गई।
अब लोग जो भी प्रतिक्रिया देते अच्छी ,बुरी उसी पर एक और कहानी का जन्म होने लगा।
लोगों का बनाया, और अपना बनाया ढांचा जब टूटा तो यकीन मानिए मैंने वो पाया, जो मैंने सोचा भी नहीं था।
अब भी कई ढांचे तोड़ने बाकी है, लगी हुई हूं उन्हे तोड़ने में।
जो सालों से टूटने नहीं उनपर एक चोट तो रोज करनी पड़ेगी तभी टूट पाएंगे।
तो आप भी उठिए हमारे लिए वक्त निकालना हमारे ही हाथ में है।
बदल दीजिए पुराने ढांचे, वरना आप तैयार हो या ना हो; ये दुनिया, ये वक्त तैयार है; बदलने के लिए।
