अन्याय या अभिशाप
अन्याय या अभिशाप
भले ही आज दुनिया बहुत आगे जा चुकी हो अपना नाम रोशन कर रही हो लेकिन कहीं न कहीं हर अधिकार मिलने होने के बावजूद अत्याचार मौजूद है। जहां नारी स्त्री का सम्मान नहीं होता उसके साथ सही व्यवहार नहीं किया जाता और वह मजबूर होती है अपना आधिपत्य और अधिकार खोने के लिए।
जी हां आज आपको एक ऐसी ही सच्ची घटना का साक्षात्कार करवाना है जहां निर्दोष स्त्री का अपमान किया है उसे अपना घर त्याग करने को मजबूर कर दिया गया है।और उसे शापित अपशकुन नाम दिया गया है। एक बार की बात है जब एक बड़ा परिवार रहता था जिसमें एक बूढ़ी औरत और उसके बहू बेटे तथा दो पोते रहते थे। बड़े का नाम राजू और छोटे का मोनू था, राजू की पत्नी संपन्न थी क्योंकि उसकी एक संतान वो भी लड़का था। और और दादी साथ उसी को प्यार करती थी क्योंकि छोटी बहू का कोई भी बच्चा नहीं था। लेकिन वास्तव में छोटी बहू ही व्यावहारिक और सौंदर्य रूप से संपन्न थी और हर किसी के मन को जीत लेती थी। बड़ी बहू को प्यार देने के कारण सास और दादी शांत से काम नहीं करवाते थे।और सारा घर का काम अपनी नौकरी छोटी बहू से ही करवाती थी ।
दिन बीतते गए और मोनू बीमार पड़ गया कुछ पारिवारिक माहौल के तनाव से और शारीरिक रूप से भी।उसे गंभीर बीमारी लग गई और वह लंबे समय तक बिस्तर पर रहकर अंतिम में अपनी पत्नी को बेसहारा छोड़ गया जिसका एकमात्र विश्वास और उम्मीद वही था।उसकी पत्नी की मानो दुनिया जीवन सब समाप्त हो गया।मोनू के चले जाने के दूसरे दिन से ही बड़ी बहू और दादी सास ने छोटी पर अपना अधिकार और जुर्म करना शुरू कर दिया।बेचारी खुद का दुख बांटने का वक्त उनकी नोक टोक और उनकी खातिरदारी में बिताती।समय बीता और कुछ जो रिश्तेदार और अपने माता पिता थे उसके उनकी सलाह पर भी वो दूसरा विवाह नहीं करना चाहती थी।जब मोनू की मृत्यु हुई तब उसकी पत्नी सात माह की गर्भवती थी उसके पति के जाने के कुछ दिन पश्चात ही नष्ट हो गई थी जिसे दादी सास का कहना था की उसने उसका पोता मोनू छीन लिया है तो उसने भी उसी की संतान छोटी से छीन ली।हर तरफ से उसे अपमानजनक शब्दों का सामना करना पड़ता था।और देखते देखते साल बीत गए ।जब परिवार के लोग अपनी आदतों से नहीं सुधरे तब छोटी ने फैसला किया जो किसी को भी मालूम नहीं था कि वह अब घर त्याग देगी ।उसे ना तो घर की संपत्ति मिली ना ही जमीन का कोई टुकड़ा जिसे वह अपना कह सके बता सके।किंतु उसने जब त्याग करने का निर्णय लिया वह अपने हाल में ही घर के आंगन में आई और वहां से जितनी उसे ताकत हिम्मत हुई उतनी ऊंची आवाज में पूरे गांव के लिए अपना दर्द अपना अपमान को बयां कर गई। कि इतना भरा पूरा परिवार होने के बावजूद इतनी बड़ी बिरादरी मिलने के पश्चात भी उसे उसके अपने अंदर का परिवार रोज मरने को कहता है जिसकी आवाज में रूवांसपन और दर्द था वह चली गई ।
गांव क्षेत्र से दूर वह एक शहर में गई कुछ समय उसने अपने पेट के लिए नौकरी की और वहीं किसी से विवाह कर लिया जो पहले से ही दो पुत्रियों का पिता था और उस विवाह का कारण यह था कि उसे डर था खुद के रूप से और रोज बाहर अकेले काम पर जाने और रहने से। उसने नौकरी नहीं छोड़ी और उन दोनों सौतेली पुत्रियों का बहुत अच्छे से ध्यान रखने लगी उनकी हर इच्छा पूरी करने लगी और उन्हें हर वो अधिकार सम्मान दिलाना चाहती थी जो उसे नहीं मिला था।कुछ समय पश्चात उसने एक पुत्र को जन्म दिया और दोनों बहनों को एक भाई मिला जो उसके आने की बाद खुशी के हर पल को बड़ी उत्सुकता पूर्वक जी रही थी छोटी को जैसे अब उसका अपना संपूर्ण संसार अपनी आंखों के सामने मिल गया और अपना काम छोड़कर उसने पूरी लगन से अपने गृहस्थ जीवन संभाल लिया।लेकिन भगवान और भाग्य दोनो ही उससे ना जाने क्यों रूष्ट थे सब कुछ सही होने के बावजूद उसके दूसरे पति की भी दिल के दौरे से मृत्यु हो गई और छोटी को अब खुद का जीवन दूसरों के लिए श्राप लगने लगा।और उसने निश्चय कर लिया अब वह अपनी संतान को भी बड़ा करके किसी अच्छे विद्यालय में प्रवेश दिलाकर उनका भरण पोषण करेगी लेकिन कभी कभी ही उनसे मिलेगी, और बाकी का जीवन उनकी जरूरतें उनके उज्जवल भविष्य को साकार करने में बिताएगी काम करके।लेकिन किया भी अन्य व्यक्ति वो स्त्री हो या पुरुष किसी भी तरह का कोई रिश्ता नहीं बनाएगी।
