Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Inspirational


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Inspirational


अनुपमा

अनुपमा

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गाँव में सरोज को यूँ ख्याति मिलने लगी थी कि वह, औरतों-लड़कियों की भलाई की फिक्रमंद एवं सुलझे विचार रखने वाली, स्त्री है। ऐसे में ही एक दिन, एक 14-15 वर्ष की लड़की उसके पास आई।

उससे बोली- "चाची, मुझे आप से बात करनी है।"

सरोज ने कहा- "बताओ।"

वह बोली- "चाची, मेरा नाम अनुपमा है। मुझे जो कहना है वह अकेले में कहना चाहती हूँ।"

गर्मी के दिन होने से दोपहर में बच्चे सोते हैं और घर के मर्द काम काज में बाहर गए होते हैं। उस समय को उपयुक्त मानकर, सरोज बोली- "ठीक है, तुम आज दोपहर, दो बजे आओ।"

अनुपमा बोली- "ठीक है चाची, मैं दोपहर दो बजे आती हूँ। आज मेरे स्कूल की छुट्टी भी है।"


जब अनुपमा, दोपहर सरोज के घर पहुँची तब बच्चे सोये हुए थे। सरोज ने, नीलम को उनके पास लेटने के लिए कहा और खुद अनुपमा के साथ, आँगन में लगे आम के वृक्ष की छाया में, चबूतरे पर दरी बिछा कर, अनुपमा के साथ आ बैठी।

अनुपमा सकुचाते हुए कहने लगी- "चाची, आप किसी से कहना नहीं, मुझे एक परेशानी पर आप से सलाह चाहिए।"फिर दोनों के बीच का वार्तालाप यूँ हुआ-

सरोज: "अनुपमा, तुम चिंता न करो और बिना भय के, जो मन में है सब कहो।"

अनुपमा: "चाची, पिछले 15-20 दिनों से जब मैं, साइकिल से सहेलियों के साथ स्कूल जाती-आती हूँ तब रास्ते में रविंद्र नाम का एक 20 साल का युवक रास्ते में खड़ा मिलने लगा है। सहेलियों ने मुझे बताया कि वह तुझे देखा करता है तो मैं भी उसे देखने लगी। वह सुंदर और अच्छे कपड़ों में होने से, मुझे अच्छा लगने लगा। दो दिन पहले, मैं स्कूल से लौटते हुए, एक सहेली के घर टीचर का दिया, गृहकार्य को करने के लिए रुक गई थी। बाद में, मैं जब अकेली लौट रही थी, तो रविंद्र ने, वीरान रास्ते पर 1 जगह, अपनी बाइक मेरे साईकिल के सामने अड़ा कर रोकी। और मुझसे कहने लगा, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, तुम शाम के समय मेरे खेत पर आना, मैं तुम्हें मोबाइल पर, प्यार वाली अच्छी फिल्म दिखाउंगा।

उसकी इस हरकत से मैं सकपका गई। मैंने हाँ, आऊँगी कह कर पीछा छुड़ाया। फिर डर के मारे, मैं कल स्कूल भी नहीं गई। चाची, आप बताओ, मैं इस समस्या से कैसे बचूँ? (फिर कुछ रूककर, आगे बोली) चाची, सब नाराज होंगे इसलिए मैंने घर में किसी को, यह सब नहीं बताया और किसी सहेली को भी नहीं बताया है।"

तब, अनुपमा चुप हुई तो कुछ मिनट सरोज भी चुप रही। अनुपमा, सरोज की शक्ल देखते रही और सरोज इस उम्र की लड़की के मनोविज्ञान की समझने की कोशिश करते हुए सोचने लगी कि कैसे उसे समझाया और परामर्श दिया जाये। फिर सरोज ने कहना आरंभ किया-

"तुमने अच्छी समझदारी दिखाई है, अनुपमा! वास्तव में समस्या आरंभ होते ही सुलझाना आसान होता है जबकि बढ़ने पर कठिन हो जाता है। तुमने ऐसे समय उपाय खोजना शुरू किया है, जब परेशानी छोटी है। या यूँ कहें कि अभी परेशानी ही नहीं है।"

(यह अनुपमा के डर को दूर करने और उसका आत्मविश्वास बढ़ाने की दृष्टि से सरोज ने कहा, जबकि सरोज सोच रही थी कि अनुपमा ने रविंद्र से आँखे मिलाने की गलती की है, जिससे रविंद्र को यह हौंसला मिला कि उसे खेत पर बुलाने का दुस्साहस करने लगा)

अनुपमा खुश हुई, पूछने लगी कि- "फिर क्या करना चाहिए? "

सरोज: "तुम कल से स्कूल जाओ। सहेलियों को साथ रखो। और जहाँ आभास हो कि रविंद्र आसपास है या पीछे है, तुम सतर्क रहो मगर, प्रत्यक्ष में यह दिखाओ कि तुमने उसे देखा नहीं है। "

अनुपमा : "यदि वह रोकने लगे तो? "

सरोज : "मुझे नहीं लगता कि सहेलियों की उपस्थिति में वह ऐसा कुछ कर पायेगा। अगर तब भी यह दुस्साहस करे तो उसे कह देना कि मैंने, घर में तुम्हारी बात बताई है तो मुझे, डाँटा गया है और तुमसे मिलने को मना किया गया है। "

अनुपमा (चिंता से) : "मगर उसने सबके सामने, कोई जबरदस्ती की तो मेरी बदनामी हो जायेगी। "

सरोज : "नहीं, अभी बदनामी जैसा कुछ नहीं है। तुमने उसके बुलावे पर खेत नहीं जाकर ऐसे खतरे से स्वयं को बचा लिया है। (फिर प्रश्न के लहजे में) अनुपमा, तुम टीवी में, क्या देखती हो?"

अनुपमा :" जो फिल्में आतीं हैं मुझे वह देखना अच्छा लगता है।" 

सरोज :" अनुपमा, अभी फिल्में देखना बंद कर दो। फ़िल्में किशोरवय बच्चों के मन को हवा देतीं हैं और अगर खेत पर तुम चली जातीं तो रविंद्र तुम्हें वो दिखाता जो तन को हवा देती हैं। और ऐसा होता तो यह बदनामी की बात हो सकती थी। "

अनुपमा: (विचारणीय मुद्रा में) - चाची, वह क्या? 

सरोज : अनुपमा, आजकल ऐसी सामग्री बहुत है जिनसे दैहिक उत्तेजना पैदा हो जाती है। वह सब, इस उम्र के बच्चों के लिए फिल्मों से ज्यादा ख़राब है। एकांत में किसी युवक द्वारा, तुम जैसी किसी कम वय किशोरी को, बुलाने की नीयत, कोई अच्छी नहीं होती है। वह पक्का तुम्हारे शरीर से खिलवाड़ करता। फिर तुम्हारी इस गलती को, सबको बताने के नाम पर, तुम को आगे भी, अपनी मनमानी को बाध्य करता। अगर ऐसा हो गया होता तब, तुम्हारी बदनामी वाली बात हो जाती।

कोई हमारे अकारण, हम पर आ पड़े तो इसमें, हमारा कोई दोष नहीं होता है। तुम, पढ़ने के लिए ही तो घर से निकल रही हो। किसी लड़के को आमंत्रित नहीं कर रही हो, तुम निर्भय रहो। 

अनुपमा ने यूँ सिर हिलाया कि जैसे उसे सब समझ आ गया है कि, उसने बदनामी जैसा कोई काम नहीं किया है। वह बोली- चाची, आप बहुत अच्छी हैं।

(तब, एक स्टेज की वक्ता की भाव भंगिमा सहित ओजस्वी स्वर में) सरोज: बेटी, अब हम चेतना बढ़ाकर यही बदलाव लायेंगे। हमें, अर्थात स्त्रीजात को, मर्दजात जबरन अपनी ख़राब नीयत की जद में लेता है तो भी समाज में बदनामी, हमारी होती है। दोष ऐसे खराब मर्द का कम, हमारा ज्यादा बताने की, ये सामाजिक व्यवस्था पक्षपात पूर्ण है।

अगर कोई युवती ऐसे बदनीयत मर्द का प्रतिरोध करती है तो उसे सबक सिखाने के लिए हैवानियत पूर्ण एसिड अटैक की प्रवृत्ति, हम पर मानसिक दबाव और बढ़ा देती है। अगर, रूप और हमारा यौवन काल है तो इसमें, हमारा दोष कुछ नहीं होता है। फिर क्यों, हम नारी, अपने में छिपी-दुबकी रहने को बाध्य रहें?

अब हम बदलाव लाएंगे। आगे से बदनाम वह पुरुष ही होगा, जो हम पर यूँ बदनीयती से हाथ डालने की कोशिश करेगा। हम निर्दोष होते हुए अब और नहीं दबेंगे।

ऐसे सामाजिक बदलाव अब आरंभ हो चुके हैं। आशा है, जल्द ही पूरे समाज में मूर्तरूप ले लेंगे। तब तक लड़कियों को सावधान रहना है।

लड़कियों को अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना है। किसी लड़के की शक्ल एवं दौलत के प्रति आकृष्ट होने से बचना है। उसे वह मौका नहीं देना है, जिसे समाज गलत मानता है। अर्थात ख़राब लोगों के बहकावे में, खुद पर, उन्हें शारीरिक शोषण के मौके देने की गलती नहीं करना है।

ऐसी गलती से कोई लड़की उनके ब्लैकमेलिंग के जाल में फँस जाती है और अपना जीवन दुरूह कर लेती है। ऐसे जाल में उलझना, अपने पर विकट समस्या ले लेना होता है। ऐसा होने पर लड़की का प्रतिरोध, उस पर एसिड अटैक की आशंका उत्पन्न करता है तथा ख़राब उद्देश्य से बना लिए गए, अश्लील वीडियो के पब्लिश किये जाने से, लड़की को अवसादग्रस्त जीवन जीने को मजबूर करता है।

अब हम वह बदलाव लाएंगे जिनमे ऐसे वीडियो में संलिप्त पुरुष को ही दोषी माना जायेगा एवं समाज में बदनामी लड़की की नहीं, उस व्यभिचारी युवक/लड़के की होगी।

हमें, इस हेतु आरंभ अपने भाई, पति और बेटे के सही सँस्कार और न्यायप्रियता की शिक्षा/प्रेरणा से करना है ।

किसी लड़की पर बुरी नीयत रखने वाला, ऐसा कोई लड़का या पुरुष हम जैसे घर का ही भाई, बेटा या पति होता है। ऐसी बुरी नीयत रखने वाला कोई पुरुष, किसी विशिष्ट वर्ग से नहीं होता अपितु हम जैसे परिवारों में ही होता है। जो छिपे रूप में, अवैध संबंध की जद में, किसी लड़की या युवती को लेता है। 

(अब, सरोज का स्वर धीमा होता है, आगे कहती है)

बेटी, तुम जाओ और जैसा तुम्हें बताया है उस अनुसार ही तुम करो। और कोई बात होती है तो तुरंत मुझे आकर बताओ। अगर रविन्द्र कोई जबरदस्ती पर आता है, यद्यपि इसकी संभावना नहीं है, मगर वह ऐसा करता है, तो आगे क्या जरूरी है हम करेंगे।

और हाँ अब तक जो हुआ है उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। तुम अपने मम्मी-पापा को भी, यही सब आज बता दो।

वास्तव में, किसी बच्चे के मम्मी-पापा, उसके सबमें बड़े हितैषी होते हैं। बच्चे उनसे छुपा लेने की गलती करके ही, अपने पर ज्यादा बड़ी तकलीफ बुला लेते हैं। 

फिर सरोज चुप हुई।

सभी बातें तन्मयता से सुन रही, अनुपमा, अब विचारों में लीन सी दिख रही थी, बोली चाची- आपने मेरा साहस बढ़ा दिया है। मैं, व्यर्थ ही इसे अपनी भूल मान, ग्लानि बोध से भर रही थी। जबकि यह रविन्द्र की खराबी है। मैं अब, सब आपके बताये अनुसार ही करूंगी।

तब सरोज ने, ममता उसके सिर पर हाथ फेरा, फिर अनुपमा मुस्कुराते हुए चली गई थी।

सरोज सोचने लगी थी- मालूम नहीं यह छोटी सी लड़की, उसके भाषण तरह की बातें, कितनी समझ सकी है ..    

तीन दिन अनुपमा की ओर से कुछ सुनने नहीं मिला। सरोज सशंकित रही, तब चौथे दिन पड़ोस की एक भौजाई ने बताया कि अनुपमा को उसके पापा ने स्कूल छुड़ा दिया है।

सरोज ने पूछा- ऐसा क्यों?

तो उसने बताया कि- अनुपमा के साथ एक लड़के ने, पाँच छह दिन पहले छेड़खानी कर दी थी, इसलिए।

इस पर सरोज ने कुछ नहीं कहा मगर उसका मन अशांत हो गया। मन तर्क करने लगा, अपराध लड़का करे, सजा, निर्दोष लड़की को मिले? फिर सोचने लगी, नई बात क्या है? यही तो समाज की रीति नीति है।सरोज को गलती सी लगी कि अनुपमा को उसने ही तो, रविन्द्र की हरकत अपने पापा-मम्मी से बताने कहा था।फिर अपनी इस बात को आप ही, सही ठहराने लगी कि- नहीं! पापा-मम्मी को अँधेरे में रखने देना, उचित भी तो नहीं होता। वह उपाय सोचने लगी कि कैसे, निर्दोष अनुपमा की सहायता करे? कैसे, एक अच्छी बेटी की पढ़ाई, अधूरे में खत्म नहीं हो जाने दे?फिर सरोज ने जगन को राजी किया और उसी दिन संध्या के समय, जगन एवं सरोज, अनुपमा के घर जा पहुँचे।पहले जगन, अनुपमा के पापा से औपचारिक बातें करता रहा, तब अनुपमा की मम्मी, पहले और फिर अनुपमा सामने आईं।सरोज को यही अवसर चाहिए था। उसने, अनभिज्ञ बनते हुए पूछा- अनुपमा, तुम्हारी पढ़ाई, कैसी चल रही है?

उत्तर में अनुपमा नहीं, कुछ उत्तेजित स्वर में, उसके पापा बोले- हमने, अनुपमा का स्कूल जाना, बंद करवा दिया है।

प्रत्युत्तर में सरोज ने पूछ लिया - क्यों, भला?

तब अनुपमा की मम्मी ने रविन्द्र की जबरदस्ती का, अनुपमा का बताया पूरा किस्सा दोहराया।

इस पर सरोज ने कहा- मगर भाभी यह तो ठीक नहीं है। ऐसे पढ़ाई बंद होने से, अनुपमा की आशाओं का क्या होगा? खराबी किसी लड़के की है, ऐसे हम अपनी, निर्दोष बेटी पर पाबंदियाँ क्यों लगायें?

अनुपमा के पापा कहने लगे - तुम, मुंबई रहके आई हो इसलिए ऐसा कह सकती हो। यहाँ गाँव में बेटी का पापा, बेचारा होता है। अभी गाँव की छोटी सोच होने से, यहाँ, अनुपमा के बारे में इधर उधर की बात होने लगेगी। पढ़ाई के प्रयास से लाभ कुछ होगा नहीं, उसके चक्कर में उसको ब्याहने, कोई ना तैयार होगा। 

सरोज को इस बात पर गुस्सा तो आया, मगर उसने स्वर संयत रखते हुए कहा- मगर भैया जी, हम, लगभग सभी तो बेटी के माँ-बाप होते हैं।   समस्या के सामने ऐसे समर्पण से तो हमारी बेटियों के, अच्छी उपलब्धियों के अवसर, हम ही खत्म कर देंगे। कृपया आप अनुपमा को स्कूल जाने दीजिये। अपनी तसल्ली के लिए कभी आने जाने में, कुछ दिन खुद भी साथ जाइये।

सरोज की बात पर अनुपमा के पापा-मम्मी, अनमयस्क तो दिखे मगर राजी हुए कि कल से, अनुपमा को स्कूल भेजेंगे।

जगन और सरोज लौट रहे थे तब, अनुपमा के मुख पर कृतज्ञ होने का भाव झलक रहा था।

घर के रास्ते में, जगन सरोज की प्रशंसा करते हुए कह रहा था- वाह, सरोज तुम बड़ी ही तर्कसंगत बातें रखती हो। जिसे समझने में आसानी होती है।

ऐसा नहीं है कि सारी समझदारी सरोज के जिम्मे थी। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। ऐसे में रविन्द्र को, अनुपमा स्कूल जाते हुए नहीं दिख रही थी। फिर उसके कानों तक बात पहुँची कि किसी लड़के की छेड़छाड़ के कारण, अनुपमा के घर वालों ने अनुपमा की पढ़ाई छुड़ा दी है।

ऐसा होते/सुनते हुए, रविन्द्र को बहुत ग्लानि बोध हुआ। रविंद्र की स्वयं की एक बड़ी और एक छोटी बहन थी।

उसकी कल्पना में एक ऐसा दृश्य उभर आया जिसमें, उसकी दोनों बहनों के साथ, गाँव के कुछ लड़कों ने छेड़छाड़ की है। जिसके कारण हुई बदनामी में, उनके पिता न जल्दबाजी में, वर की योग्यता बिना देखे, दोनों का एक ही मंडप में विवाह कर दिया है। जबकि छोटी बहन तो अभी पूर्ण वयस्क तक नहीं हुई है।

कल्पना पटल पर उभरे इस दृश्य ने, रविन्द्र के शरीर में सिहरन उत्पन्न कर दी। उसे प्रतीत हुआ कि अनुपमा पर उसने कोई छोटा अपराध नहीं किया है, अपितु उसके जीवन सपनों की हत्या कर दी है। वह हत्यारा है। कल्पित ऐसे दृश्य ने उसका, अमन-चैन छीन लिया।

तब साहस जुटा कर, एक रात्रि वह, अनुपमा के घर गया। और जैसे ही, अनुपमा के पिता सामने आये, वे कुछ देखते समझते, उसके पूर्व ही, वह उनके चरणों को छूने झुक गया।

फिर विनतीपूर्वक स्वर में बोला कि, काका, मुझसे बड़ी भूल हुई है। अनुपमा का, कोई दोष नहीं है। आप, उस पर कृपया कोई बंदिशें नहीं लगायें। मेरी भी, घर में दो बहनें हैं। मैंने पहले क्या किया है, भूलकर अनुपमा को अबसे, अपनी छोटी बहन जैसा ही समझूँगा। आप उसे स्कूल, जाने दीजिये। मैं खुद, अब इस बात की फ़िक्र रखूँगा कि कोई उसके साथ, गलत तरह से पेश नहीं आये।

अनुपमा के पिता, सीधे-सादे, भोले से व्यक्ति थे। उन्होंने बिना कोई व्यर्थ बात किये कहा- रविंद्र, मैंने तुम्हें क्षमा किया। आगे तुम कोई गलत काम नहीं करना। तुम नहीं जानते कि लड़की का पिता, इस समाज में कितना दीन हीन सा रहता है। उसे हर समय, बेटी की कोई बदनामी न हो, यह चिंता, सताये रखती है। 

तब रविन्द्र, दीनता पूर्वक कहने लगा - काका, मैं पहले ही बहुत लज्जित हूँ। ऐसा कह कर मुझे और लज्जित न कीजिये।फिर वह लौट गया था।

अनुपमा का, पुनः स्कूल जाना शुरू हुए, दस दिन बीते होंगे। तब एक छुट्टी वाले दिन, दोपहर में वह सरोज के पास आई।

उसने यह वृतांत सुनाया, तब सरोज खुश होते हुए बोली - बहुत अच्छी बात है, अनुपमा। वास्तव में अनाज सभी खाते हैं, विवेक सभी को होता है, बस उसे जागृत नहीं रख पाते हैं। ऐसी हालत में ही कोई, अपने आनंद-ख़ुशी के लिए, दूसरों की ख़ुशी की हत्या करता है। यह बहुत अच्छा हुआ कि बिना किसी दबाव में, रविन्द्र ने अपनी खराबियों को समझा और उसका खेद किया है। मगर बेटी तुम, रविन्द्र को बहुत भाई सा, मानने की भूल न करना, भाई और 'भाई जैसा' होने में अंतर होता है। 

तब अनुपमा हँसते हुए बोली- हाँ, मेरी प्यारी चाची, मैं यह ध्यान रखूँगी। ये सब आपके आभा मंडल का प्रभाव है कि हमारे गाँव में विवेक के प्रयोग करने का, फैशन आ गया है।

फिर दोनों ही साथ, खिल खिला कर हँसने लगीं ..   

सरोज और अनुपमा में 11 वर्ष का अंतर ही था मगर गाँव के रिश्ते में सरोज, अनुपमा की चाची थी। वय में बहुत अधिक अंतर नहीं होने से और मन मिल जाने से, सरोज एवं अनुपमा, मित्रवत हो गए थे। अक्सर छुट्टी के दिन अब, अनुपमा सरोज के पास आ जाती थी।

एक दिन अनुपमा आई और उसने पूछा- चाची, भाई और 'भाई जैसा' होने में क्या अंतर होता है? 

सरोज ने तनिक सोचा फिर उत्तर दिया- कोई भी मनुष्य, हमेशा या पूरे जीवन भर, एक सा विचार और भाव नहीं रख सकता है। परिस्थिति और काल उसके चिंतन एवं भावनाओं को बदलती रहती है। खून के रिश्तों में ऐसा होते हुए भी विचार तो बदल सकते हैं मगर भाव नहीं बदलते हैं। 

ऐसे में, जो रिश्ते में नहीं, वह लड़का किसी समय भावातिरेक में, किसी लड़की के प्रति भाई सा भाव तो रख लेता है परन्तु किसी और समय, वह लड़की को लेकर 'भाई सा' भाव नहीं रख पाता है। 

इसके विपरीत सगा भाई, अपनी बहन के प्रति, सदा भाई वाला भाव ही रखता है। ऐसे, भाई और 'भाई जैसा' होने में अंतर होता है। 

अनुपमा तब बोली- समझ गई चाची कि क्यों मुझे, आपने, उस दिन रविंद्र को भाई सा मानते हुए भी, उससे सतर्क रहने को कहा था। 

सरोज बोली- हाँ अनुपमा, तुम ही रविंद्र को, खुद देख लो। किसी दिन वह तुम्हारा रास्ता रोक, खड़ा हुआ था। फिर गलती के एहसास करने के बाद, तुम्हारे पापा से, तुम्हें अपनी छोटी बहन बता कर गया। ऐसे ही, उसका भाव आगे भी पलट सकता है। 

चूँकि बहन जैसी कहने वाला, हमसे ज्यादा निकटता प्राप्त कर लेता है। हम उस पर विश्वास करने लगते हैं। जबकि कोई अन्य युवक हमारे से वह निकटता नहीं पाता है, इस कारण हम उसके तरफ से चौकन्ने रहते हैं। तब, कोई 'भाई जैसा' युवक, हमारे लिए, किसी अन्य युवक से ज्यादा खतरनाक हो सकता है।

तब अनुपमा ने पूछा- चाची इसका मतलब, रविंद्र फिर पहले जैसी हरकत पर उतर सकता है?     

तब सरोज समझाते हुए बोली- अनुपमा, उसकी दो बहनें हैं, इसलिए ऐसा शायद वह फिर कभी न भी करे। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने तुम्हारा रास्ता रोक तुमसे कहा था कि खेत में, वह तुम्हें प्यार वाली फिल्म दिखायेगा। इससे यह अंदेशा रहता है कि वह, फिर ऐसा कर सकता है।

अनुपमा ने फिर प्रश्न किया- चाची, यह 'प्यार वाली फिल्म' का मतलब क्या होता है। 

तब सरोज बोली- यह अच्छा है कि तुम्हारे पास मोबाइल नहीं है। आजकल मोबाइल पर इंटरनेट के माध्यम से ऐसी ख़राब सामग्री, बच्चों तक बहुत पहुँच जाती हैं। ऐसी ख़राब सामग्रियाँ, अनियंत्रित शारीरिक उत्तेजना उत्पन्न करतीं हैं। 

एक बार कोई इन्हें देखले तो उसके देखने/पढ़ने की लत सी हो जाती है। आजकल, लड़कियों और युवतियों पर जो यौन अपराध बढ़ रहे हैं। वह इन्हीं अश्लील सामग्रियों के कारण हो रहे हैं।

निश्चित ही 'प्यार वाली फिल्म', रविंद्र, इन्हीं अश्लील तरह की सामग्रियों के लिए प्रयोग कर रहा था। यदि रविंद्र में यह लत है तो उससे, अपनी बचत करना, अपने पर खतरा कम करना होगा।   

अनुपमा ने फिर पूछा- चाची, आप इतनी सब बातें कैसे जानती हैं?

सरोज- मैंने मुंबई में, ऐसी खराबियों को पास से देखा और अनुभव किया है। 

अनुपमा ने अगला प्रश्न किया - चाची, मेरे मम्मी, पापा यह सब जानते होंगे या नहीं?

सरोज ने सोचते हुए कहा - शायद नहीं, और यही हमारे समाज में बहुत बड़ी कमी है। वास्तव में जो पेरेंट्स, नई कंप्यूटर तकनीक एवं इंटरनेट के जानकार नहीं उन्हें मालूम नहीं कि कितनी खराबियाँ, इनके माध्यम से प्रसारित हो रही हैं। जिनकी जद में उनके बच्चे आ रहे हैं तथा अपने वर्तमान और भविष्य पर अनायास खतरा ले रहे हैं।  

अनुपमा ने बताया- जी, चाची, हमारे मम्मी-पापा तो मोबाइल पर सिर्फ बात कर पाते हैं। 

सरोज ने निष्कर्ष जैसा निकालते हुए बताया - इसलिए, सर्वाधिक हितैषी होते हुए भी अनेकों पालक, अपने बच्चों की भलाई सुनिश्चित नहीं कर पाते हैं। ऐसे में, उनके बच्चों को मार्गदर्शन के लिए अन्य पर निर्भर रहना होता है। यह समाज का दुर्भाग्य है कि स्कूल/कॉलेज में बच्चों को मिलने वाले अधिकाँश गुरु भी, आजकल मार्गदर्शक के रूप में अपनी सही भूमिका नहीं निभा रहे हैं। 

अनुपमा (खुश होते हुए) बोली- चाची, मुझे तो भाग्य से आप मिल गईं हैं।

सरोज- यह तुम से ज्यादा मेरे भाग्य की बात है, अनुपमा। पिछले वर्ष कोरोना खतरा नहीं आया होता तो, हम आज भी मुंबई की धारावी बस्ती में श्रमिक परिवार के रूप में, एक छोटी खोली में जीवन यापन कर रहे होते। उसी को अपनी नियति मानते और साधारण की तरह रह जाते। हम कोरोना के कारण, लाचारी में 1200 किमी पैदल चलके गाँव आये। उस यात्रा में मैंने बहुत सी बातें देखीं, जिनसे उस पूरी यात्रा में मेरा दिमाग अत्यंत सक्रिय रहा। उसी समय, मुझे अपनी विशिष्टताओं का ध्यान आया। 

मैं समझ सकी कि कोरोना विपदा के माध्यम से भगवान ने हम सभी को अपने तौर तरीकों पर, गौर करने का अवसर दिया और उन्हें ठीक कर लेने का संकेत दिया था। 

अनुपमा प्रसन्नता से बोली- पर चाची, सभी ने इसे समझा नहीं। आपने समझा और आज आप यहाँ गाँव में, समाज हितैषी की तरह विख्यात हो रही हैं।

सरोज ने गंभीर भाव से कहा- वास्तव में अनुपमा, भगवान हर किसी को समय समय पर कुछ बातों के संकेत दिया करते हैं। मगर, हम इन्हें समझने में चूक जाते हैं।

अनुपमा ने जिज्ञासा से पूछा - चाची, पिछले दिनों में मेरे साथ जो हुआ उसमें मेरे लिए भगवान का संकेत, क्या था? 

सरोज : तुम उम्र जनित दैहिक आकर्षण के प्रभाव में अपनी पढ़ाई के तरफ से विमुख हो रही थीं। कुछ घटनाओं के माध्यम से भगवान का संकेत, तुम्हें, अपने भविष्य के प्रति सचेत करने का था। तुम सचेत हुईं भी और भविष्य सुनिश्चित करने के उपाय के लिए, तुम्हारी अंतर्प्रेरणा तुम्हें मुझ तक ले आई। 

इसमें भगवान का संकेत यह भी है कि तुम, अपने पालकों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार होकर अपने और उनके जीवन में कठिनाई बढ़ा लेने से बचो। इसमें ही तुम जैसी किशोरियों के लिए, भगवान का एक और इशारा भी है। 

अनुपमा का प्रश्न- वह क्या, चाची?

सरोज ने सलाह देने वाले अंदाज में कहा - अनुपमा, वह यह कि किशोरियों को स्कूल/कॉलेज के दिनों में पढ़ने पर ही, ध्यान देना चाहिए। किसी के प्रति उम्र जनित सहज आकर्षण को प्यार मानने की भूल नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिये कि गाँव बस्ती के लड़कों के चक्कर में पड़ने से पढाई और भविष्य चौपट होते हैं। 

दुनिया में सिर्फ इतने ही लड़के नहीं होते, जो आसपास दिखाई देते हैं। दुनिया में बहुत और अत्यंत योग्य लड़के होते हैं, जो लड़कियों की योग्यता हासिल करने के उपरान्त, उनसे विवाह और प्यार को उत्सुक मिल जाते हैं। 

अनुपमा सिर्फ मुस्कुराई तब सरोज ने आगे कहा- अनुपमा तुम्हारे लिए, योग्य लड़का, यहाँ गाँव में नहीं है। तुम अभी पढ़ो-लिखो और योग्य बनो।समय आने पर एक योग्य लड़का, स्वतः तुमसे परिणय करने आएगा। 

ऐसा सुनते हुए, अनुपमा के गोरे मुखड़े पर, गुलाबी रंगत आ गई, जिससे वह स्वर्ग से उतरी अप्सरा सी लग रही थी। तब सरोज ने उसे गले लगाया उसके माथे पर चुंबन लिया।

दोनों हँसने लगीं फिर अनुपमा ने विदा ली और सरोज, नीलम एवं अपने, छोटे छोटे बच्चों की देखभाल में व्यस्त हो गई ।



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