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Meeta Joshi

Tragedy Inspirational


4.8  

Meeta Joshi

Tragedy Inspirational


अनसुलझी पहेली

अनसुलझी पहेली

10 mins 371 10 mins 371

पूरे मोहल्ले वाले उसकी बातें बनाते और वो..उन सब को शेरनी की तरह चीर आगे बढ़ती रहती। न कहीं आना न जाना न लोगों को उससे मतलब,न उसको किसी से। फिर भी जहाँ खड़े हो जाओ वो सबकी चर्चा का विषय होती। मैं जब नई-नई मौहल्ले में आई तो एक उत्सुकता थी,आखिर कौन है वो ?

मुझे अपनी व्यवहारकुशलता पर पूरा विश्वास था। कम दिनों में ही मोहल्ले वालों को अपना बना लिया। वो कब तक प्रभावित नहीं होंगी।

यहाँ आए पाँच महीने करीब होने को आए हैं लेकिन जो बातों का हिस्सा थीं वो बातों तक ही रह गईं।

हाँ इतना जान पाई थी सुपर्णा दुबे नाम है। अपनी बेटी के साथ रहती है। लड़की भी कोई छोटी उम्र की न थी,यहीं कोई अठारह-बीस साल की होगी। आश्चर्य का विषय ये था कि मेरे घर के सामने उसका घर होते हुए भी कभी उसको देख नहीं पाई। घर के बाहर बड़ी-बड़ी चारदीवारी शायद इसीलिए बनाई गई थी कि लोगों की नजर को बाहर ही रोक दिया जाए। ऐसा नहीं कि उस घर से आवाज़ें नहीं आती थीं। दोनों माँ-बेटियों की अच्छी दोस्ती थी। खूब हँसी-मजाक करना,गलती पर माँ का डाँटना और उसका चुप-चाप सुनना,सब समझ आता था। लड़की घर से कॉलेज और कॉलेज से घर बस इतनी दूरी ही तय करती और माँ दस बजे निकल शाम छः बजे घर आती। जब हम ऊपर की फ्लोर बना शिफ्ट हुए तो उनका कमरा दिखाई देता। न जाने कितनी बार उन्हें देखने की उत्सुकता से वहाँ झांक आती लेकिन यहाँ पर्दा दुश्मन था जो सुपर्णा जी से पूरी वफादारी निभाता।

टिंग-टोंग,टिंग टोंग।

"अरे आंटी आप!आइए ना। "

"कविता..कविता नाम है ना तुम्हारा ?"

"जी..। "

"मन लग गया कॉलोनी में ?"

"जी आंटी,बहुत अच्छे लोग है। सब चंद दिनों में ही घुलमिल गए हैं। "

"हाँ बेटा किसी चीज की जरूरत हो तो बेझिझक कह दिया करो। पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। मैं जब यहाँ आई थी तब चारों तरफ सब खाली पड़ा था। आज देखो इंच भर की जगह नहीं। "

मेरी उत्सुकता मुझे रोक न पाई,"आप इतनी पुरानी हैं आंटी!"

"हाँ बेटा। "

"आंटी एक बात पूछना चाहती हूँ। ये सामने वाला मकान..!कौन हैं ये लोग ?किसी से मिलते-जुलते नहीं,कहीं आते-जाते नहीं,बस स्कूटी पर बैठ,मुँह में स्कार्फ बांधे वो रोज जाती हैं,बड़ी करीने से साड़ी पहने दिखती हैं। क्या बात है...."

"कौन ! वो सामने वाली....। "

"जी आंटी। कॉलोनी वाले उनके लिए बहुत गलत बोलते हैं लेकिन पता नहीं क्यों मुझे कभी गलत नहीं लगी। मैंने कभी उनके घर किसी को आते-जाते भी नहीं देखा। यहाँ तक की छः महीने में उनकी,बस आँखे ही देखी है,देखकर लगता है गज़ब की खूबसूरत होंगी। "

"सुपर्णा नाम है उसका। कोई नहीं जानता मामला क्या है। होगी कोई चालीस से पैतालीस के बीच की। शुरू-शुरू में जब आई थी,सबने रखने की कोशिश की लेकिन तुम जानती हो अकेली औरत हो तो अनगिनत बातें....। मकान किसी दुबे ने खरीदा था,बहुत व्यवहारकुशल था। जब लिया तब-सब घरों में लड्डू बाँट कर गया था। पत्नी को लेकर जल्दी आऊँगा कहकर गया था फिर कुछ समय यहाँ कोई नहीं आया। सुपर्णा ही आई। पाँच छः महीने पेट से थी। गजब की खूबसूरत,एक बार जो देख ले तो नजर ही न हटे।

एक आदमी काफी समय तक आता था,कहते हैं दुबे का मित्र था,फिर बच्चा होने के कुछ समय बाद उसका भी आना बंद हो गया। अब तुम जानती हो ना लोगों के प्रश्न कभी खत्म ही नहीं होते। जब लोगों ने अनगिनत प्रश्न पूछने शुरू किए तो उसने सबसे सम्पर्क खत्म कर दिया। कोई नहीं जानता कौन है ?कहते हैं दुबे की रखैल थी,किसी ने कहा उसने भागकर इससे शादी कर ली,तो घरवालों ने संबंध खत्म कर लिए। कोई कहता बच्चे का वास्ता देकर इसने दुबे से मकान हड़प लिया। यहाँ तक भी सुनाई में आया दुबे मर गया है।

जितने मुँह उतनी बातें। कहते हैं माँ-बाप मकान देकर इससे पिंडा छुड़ाकर बेटे को साथ ले गए.....न जाने क्या असलियत है। सवालों से बचने के लिए सुपर्णा ने सबसे कन्नी काट ली। नौकरी करती है। हाँ ये सच है इतने सालों में हमने भी कभी किसी को आते-जाते नहीं देखा।

ये जरूर इसके चरित्र पर एक प्रश्न पैदा करता है कि दुबे मर गया था तो ये माँग क्यों भरती है,बिंदी किसके नाम की लगाती है......। पूछो तो कहती है हस्बैंड बाहर रहते हैं। अनसुलझी पहेली है बेटा....। "

सुपर्णा के विषय में इतना जानकर कविता की उत्सुकता उसके प्रति और बढ़ गई।

"सुनो कविता आज L I C ऑफिस से सारी LIC की डिटेल चाहिए,निकलवा लाना। स्टाफ सहयोग न करे तो वहांँ जाकर वहाँ के फोर्थ वलास से मिलना,हमारे ऑफिस अक्सर डाक लेकर आता है। उससे पूछ लेना,वो हेल्प कर देगा लेकिन कोशिश करना ये काम एक बजे से पहले हो। "

घर का काम समेटने में थोड़ी देरी हो गई। जल्दबाजी में पर्दे लगा दरवाजा बंद करने लगी तो नजर सुपर्णा की खिड़की पर गई। हवा जोरों से चल रही थी। लगा कोई बाल बना रहा है। नजर वहीं अटक गई। जब पर्दे ने उसे परेशान करना शुरू किया तो उसने पर्दा एक तरफ का सरका दिया। शीशे के आगे खड़े हो लंबे,काले-घुंघराले बाल करीने से बनाए। बिंदी लिपस्टिक सब लगा खुदको निहारने लगी। जिस सुंदरता का सिर्फ सुना था,आज छः महीने बाद दर्शन का मौका मिला। विचार सीधे यही आया,कितना बदनसीब होगा जो इस खूबसूरत सी पत्नी को छोड़ विदेश में बैठा है।

इतने में पतिदेव का फ़ोन आया। न जाने कितनी घंटियाँ बजा चुके थे।

"कविता पहुँच गई ?"

"नहीं-नहीं बस जल्द ही पहुँच जाऊँगी। "ऑफिस पहुँची तो वहाँ बहुत भीड़ थी और समय कम। तो सीधे 4th क्लास कर्मचारी से मिलने पहुँची।

"जी मैडम,चार-नंबर सीट पर जो मैडम बैठती हैं उनके पास चले जाना,काम आसानी से हो जाएगा। थोड़ा इंतजार करें,आज वो थोड़ा देर से आएँगी। "

जैसे ही कविता मैडम के पास पहुँची तो उसकी आँखों में खो गई। चिर-परिचित सी आँखें। कौन है ये!

"जी कहिये क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकती हूँ। जल्दी बताइये मुझे फिर निकलना है। "

कविता का काम मैडम ने जल्दी करवा दिया।

"धन्यवाद आपका। आप नहीं होतीं तो न जाने कब....। "

"हमारा काम है मैडम,कुर्सी में इसलिए ही बैठे हैं। चलिए फिर मुलाकात होगी,आज मैं जल्दी में हूँ। "

कविता बिना कुछ बोले उन आँखों में खोई रही।

स्कूटी लेकर जाने लगी तो दूसरी तरफ से आ रही स्कूटी से अचानक टकरा गई।

"ओह ! मुझे माफ़ कीजिएगा। अरे मैडम आप !रियली सॉरी। "

स्कूटी से गिरने की वजह से पाँव में थोड़ी मोच आ गई थी,"आप चिंता मत करिए कविता जी,मैं ठीक हूँ। गिरी हूँ तो थोड़ा झटका तो लगेगा ही। आह!"

"मैं आपके घरवालों को इन्फॉर्म कर देती हूँ। "

"नहीं नहीं प्लीज। आप स्टाफ वालों को कह दीजिए,मदद को आ जाएँगे। घर में बिटिया अकेली होगी। सुनेगी तो घबरा जाएगी।

"और कोई नहीं.. ?"

"पति बाहर रहते हैं। "

"आपका शुभ नाम....। "

"सुपर्णा दुबे। "

"ओह !"

"सारा स्टाफ सेवा में हाजिर था,लेकिन कविता....मुश्किल से मिले मौके को छोड़ना नहीं चाहती थी। देखिये मना मत कीजिएगा मैं आपको घर छोड़ दूँगी तो मन का बोझ कुछ हल्का हो जाएगा। कहाँ रहती है आप ?"

जैसे-जैसे सुपर्णा बताती गई,बिल्कुल अनजान बनी कविता उसके बताए रास्ते पर चलती गई।

बस यही है मेरा घर। गेट खोला तो प्यारी सी सुपर्णा जी की 

बिटिया,"मम्मा क्या हुआ ?"

"घबराओ नहीं। कुछ नहीं हुआ है आपकी मम्मा को,ठीक हो जाएँगी। "

घर बिलकुल माँ-बेटी की तरह व्यवस्थित।

"मुझे हाथ धोना है" कहा तो बेटी ने वाशबेसिन तक पहुँच दिया और चाय बनाने चली गई। बेड-रूम का दरवाजा खुला था वहाँ बड़ी सी फ़ोटो लगी थी जिसपर फूल माला चढ़ी थी। चुपचाप जाकर देखा तो लिखा था अविनाश दुबे।

"आइये आप चाय लीजिए आंटी। "बेटी ने आवाज़ लगाई।

"माफ करना मैंने आपको चोटिल कर दिया। यहाँ अकेली रहती हैं ?"

"जी। कुछ समय से मेरे पति विदेश रहते है। आते-जाते हैं। "

"झूठ कहती हैं आप। क्यों.. ?शर्म नहीं आती आपको,आपके पति इस दुनिया में नहीं। अभी मैं उनकी फोटो आपके कमरे में देख कर आई हूँ। क्यों सुपर्णा जी,इतनी सुलझी हुई होकर क्यों अपनी ज़िंदगी को आपने इतना उलझा रखा है। ये बिंदी,माँग क्या है ये सब....। मैं जितनी देर में आपको जान पाई हूँ आप बहुत सौम्य महिला हैं। दिखने की ही नहीं बातों में भी खूबसूरत। तो फिर ये झूठ क्यों। जानती हैं मैं कौन हूँ ?

कविता....आपके सामने वाले घर में रहती हूँ। आज छः महीने में आपको अब देखा लेकिन क्यों झूठ बोल सबको अपने आप से दूर कर रखा है। मुझे जवाब दीजिए प्लीज,सुलझा दीजिए ये पहेली देखियेगा आपको भी आराम मिलेगा। "

"क्या जानना चाहती हो। यदि तुम्हें ये सुनकर सुकून मिलेगा की मेरे पति इस दुनिया में नहीं तो यही सच है। वो इस दुनियां में नहीं। हमने प्रेम-विवाह किया था। घरवालों ने नाता तोड़ दिया। मेरे घरवाले जबरन मेरी शादी कहीं और न कर दें इस डर से हमने कोर्ट में शादी कर ली थी। अविनाश ने बड़े अरमानों से ये मकान खरीदा था। मेरी तबियत कुछ दिनों से नासाज थी। टेस्ट की रिपोर्ट लेकर घर आई,अविनाश का इंतजार कर रही थी उन्हें खुशखबरी देनी थी। हम दो से तीन होने वाले है। ठीक उनके आने के समय दरवाजे पर डोर बैल बजी,भागकर गई तो देखा उनका मित्र खड़ा था,"अभी हॉस्पिटल चलना होगा भाभीजी। अविनाश का एक्सीडेंट हो गया है। "

"निखिल मेरी पत्नी की जिम्मेदारी आज से तेरी है,तुझे इसका साथ दे अपनी दोस्ती निभानी होगी। "

"सुपर्णा ज़िन्दगी में आगे बढ़ना। मुझे माफ़ कर देना। "अपने मन की बस इतना ही कह पाए। मेरी खुशी इन्हीं के साथ चली गई। "कह अपर्णा जी रोने लगीं।

"कोई नहीं था आपके दुख में आपके साथ !"

"माता-पिता आए थे बच्चे को गिरा,साथ लेकर जाने को तैयार थे। मैंने बच्चे को अपनाया। अविनाश और मेरे साथ की एक यही निशानी थी।

बिल्कुल पापा पर गई है। हँसना-बोलना सब चीजों में।

यहाँ निखिल के साथ आई तो लोगों की पैनी निगाह कई सवाल करती इसलिए एक वक्त के बाद उससे भी कन्नी काट ली। लोग कहते थे सुन्दर हूँ इसलिए बच्चे के बिना मुझे अपनाने को तैयार थे। जब पता चला अकेली हूँ तो गंदी नजरों को महसूस करने लगी। कॉलोनी के भी एक-दो जने मदद करते थे। एक दिन मदद की उम्मीद से उनके घर के बाहर पहुँची ही थी कि मियाँ-बीवी जा झगड़ा हो रहा था,"हाँ आप तो उसकी सेवा में हाज़िर रहो। "

चली आई ये सोच की जब अपना नहीं रहा तो सब सहारे बेकार हैं। अविनाश की जगह नौकरी मिल गई। सोचा कातिर निगाहों से बचने का रास्ता यही है कि मुझे एक सम्मानित जीवन जीना होगा और फिर लोग प्रश्न न करें इसलिए बन गई मिसिज़ सुपर्णा दुबे। ये बिंदी-चूड़ी और सिंदूर जिस दिन से अपनाया अपने आप में एक विश्वास सा हो गया। लोगों का नजरिया बदल गया और प्रश्न भी अब कोई नहीं पूछता आप अकेली हैं। "

"लेकिन एक झूठा सहारा क्यों ?क्या औरत में इतना दम नहीं कि अपने बल पर आगे बढ़ सके। लोगों की निगाह को चीर सके। "

"है कविता है आज समय बहुत बदल चुका है। लोग प्रश्न नहीं करते। लेकिन आज से बाइस साल पहले समय अलग था। सच कहूँ तो अब इनके नाम और इनकी पहचान के साथ जीना अब अच्छा लगता है। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। "

जाने से पहले कविता ने हाथ पर हाथ रखकर कहा,"मुझे अपना समझियेगा जब जरूरत पड़े मुझे याद करें। विश्वास रखिये में आपकी पहचान छुपाकर रखूँगी लेकिन फिर भी यही कहूँगी इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री आगे बढ़ने का नाम है। आप वो ताकत रखती है कि अपने दम पर अपनी पहचान बनाए। अपनी बेटी को एक स्वतंत्र वातावरण दीजिए उसे सामना करना सिखाइये उन गंदी नजरों का जो उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं। "

बाहर निकली तो कॉलोनी की औरतें कविता का इंतजार करती नजर आईं।

"बहुत देर लगाई अंदर। क्या हुआ ?कुछ पता चला!"

"किस विषय में..। "

"वही उसके पति...। "

"कविता मुस्कुराहट के साथ बोली बहुत खूबसूरत हैं वो और उनके वो जहांँ भी है अपनी पत्नी की हिफाजत किये हैं। यदि औरत दूसरी औरत की दुश्मन न हो तो बहुत आसान हो जाए सामने वाले के लिए अपनी पहचान के साथ जीना। "

सुपर्णा,कविता की सब बात दूसरी तरफ से सुन रही थी।

"क्या मतलब..क्या कहना चाहती हो क्या वो...। "

आपने सही सुना है। "वो विदेश में हैं"कह कविता चली गई।

सुपर्णा दुबे सभी के लिए आज भी एक प्रश्न बनकर रह गई।

क्या इतना कठिन है एक औरत के लिए अकेले जीवन जीना। क्यों ?आज की औरत अबला नहीं सबला है,जीवन अपनी शर्तों पर जीती है और शायद वो भी जी सकती थी लेकिन उन्होंने सही कहा,बिंदी-चूड़ी कंगन शायद उन्हें उनके साथ से प्यार ही गया था। अपनी पहचान छुपाकर जीना किसे अच्छा लगता है। यदि एक औरत दूसरी औरत का साथ दे तो ये समाज उन्नति कर सकता है। औरत को किसी सहारे की जरूरत नहीं वो अपने दम पर जीना जानती है।


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