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Dr. Neetu Singh Chouhan

Romance


3  

Dr. Neetu Singh Chouhan

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"अंजाना इश्क़"

"अंजाना इश्क़"

7 mins 177 7 mins 177

दौड़ते- भागते हड़बड़ी में स्टेशन की और भागती नंदिनी टिकट खिड़की पर जाकर तत्काल रिजर्वेशन की बात कर ही रही थी की अचानक पता चला कि जयपुर जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन किसी कारण वश रद्द हो गयी है फिर समय-सारणी देखकर तसल्ली हुई कि कुछ ही देर में एक और ट्रेन आने वाली है। चैन की सांस लेते हुए नंदिनी ने बिना सोचे समझे एक लोकल टिकट ले लिया और स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करने लगी। आधा घंटा बीत चुका था, बहुत भीड़ भी थी, थकी- हारी नंदिनी ख़ाली पटरियों को देखें जा रही थी की अचानक पीछे से एक आवाज़ आयी। "मैडम ट्रेन आने वाली है, अनाउंस हो चुका है। आप पटरियों से थोड़ा पीछे हटकर खड़े हो जाइए।"

नंदिनी ने अपने क़दम पीछे करते हुए कहा- ‘आपका धन्यवाद भैया’ और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ वो चेहरा ओझल हो गया। तभी धीमे-धीमे से तेज होती आवाज़ के साथ ट्रेन के आते ही सारा स्टेशन थरथरा गया। नंदिनी ने फटाफट दौड़ते हुए सारे जनरल डिब्बे देखें पर सभी खचाखच भरे थे तभी बिना कुछ सोचे समझें नंदिनी रिजर्वेशन डिब्बे में दाख़िल हो गयी सोचा टी. टी. से बात कर लूँगी अब देखा जाएगा क्या होगा थोड़े पैसे ही तो ज़्यादा लगेंगे ना...!

रिजर्वेशन डिब्बे में दाख़िल होते ही उसने देखा की अंदर कई सीटें खाली थी पर नंदिनी बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी आखिर आज पहली बार एक नियम तोड़ा था उसने....! नंदिनी दरवाज़े से थोड़ा सा अंदर बस खड़ी रही। तभी सामने डिब्बे में एक नौजवान अपना सामान जमाते हुए कहने लगा ‘अरे आप बैठ जाइए ना’

नंदिनी ने हिचकते हुए कहा जी, मेरे पास....पर शायद उसने बिना कुछ सुनें मेरी बात समझ ली और सौम्य सी मुस्कुराहट के साथ कहा- अरे आप घबराइये नहीं हमारे साथ भी ऐसा कई बार हुआ है, स्टूडेंट लाइफ़ में ऐसा होता है अब आइए, बैठिये...।

शायद नंदिनी के गले में लटका आई कार्ड उसके स्टूडेंट लाइफ़ की गवाही दे रहा था।

नंदिनी को लगा किसी ने उसकी ग़लती पर शालीनता से पर्दा डाल दिया हो। नंदिनी कुछ कहते हुए, पर मैं...आप घबराइये नहीं टी.टी. आएंगे तो हम बात कर लेंगे आप निश्चिंत होकर बैठिये, वैसे भी इस डिब्बे में सारी बुकिंग हमारी ही है, ठीक है। उस लड़के ने कहा।

नंदिनी ने सर हिलाते हुए हामी भर दी।

चार-पाँच लड़कों का यह समूह कहीं से घूम कर आ रहा था। अब उस नौजवान ने नंदिनी से पूछा वैसे आप जा कहाँ रही है?

नंदिनी ने कहा- जी, ‘जयपुर’

ओह्ह ! अच्छी जगह है, मुझे जयपुर पसंद है !

बल्कि ग्रुप में सभी ने एक साथ खुश होकर कहा- हाँ, हमें भी ‘ बहुत सुंदर जगह है।‘ वो लास्ट टाइम कहाँ गए थे हम चोखी ढानी और नाहरगढ़, खाना मसाला चौक पर खाना खाया था। है, ना ग्रुप में से किसी ने कहा।

अब धीरे-धीरे सभी से बातें होने लगी। तभी नंदिनी की नज़र एक कोने वाली सीट पर पड़ी वहां बैठा हुआ एक छरहरा सा नौजवान अपनी किताबों में ही खोया हुआ था। अचानक हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा, मुस्कुराये और उसने कहा- क्या नाम है आपका?

जी नंदिनी

मुझे...

वो अपना नाम बताने ही वाला था कि अचानक एक ट्रेन बग़ल से गुजरी तो कुछ समय के लिए सब शांत हो गए। सारे ग्रुप से बातें करते हुए सफ़र कब बीत गया पता ही नहीं चला और किताबों में देखते पढ़ते ही उस युवक ने कहा- आपका स्टेशन आने वाला है।

नंदिनी ने कहा- जी, बहुत धन्यवाद ! आप सभी का।

सभी ने एक स्वर में कहा- अरे नहीं नहीं धन्यवाद किस बात का !

और जयपुर आते ही नंदिनी ट्रेन से उतर गई और घर जाने के लिए टेक्सी देखने लगी अपना सामान संभालते हुए नंदिनी की नज़र उस युवक पर पड़ी जो सारे रास्ते किताबें ही पढ़ रहा था।

अरे आप ! यही उतर गए।

युवक- हाँ, “ मैं” किसी काम से जयपुर आया हूँ।

नंदिनी- ओह्ह ! तो फिर आपने यह क्यूँ नहीं कहा कि हमारा स्टेशन आने वाला है।

( और दोनों ठहाके मार कर हँसने लगे )

दोनों ने एक-दूसरे को बाय कहा और अपने-अपने रास्ते चल दिये।

कुछ दिनों बाद नंदिनी बुक फेयर में गयी। किताबों से उसका गहरा नाता रहा है, हमेशा। अपनी पसंदीदा किताबें लेकर जब नंदिनी काउंटर पर गयी तो पता चला कि उसका पेमेंट हो चुका है। जैसे ही उसने कहा कि किसने..? तभी पीछे से एक आवाज़ आई ‘ मैडम एक कॉफ़ी पिला दीजिये और सारी किताबें आपकी !

नंदिनी पीछे पलटकर कहने लगी...नहीं नहीं ऐसे कैसे और नंदिनी की नज़र उस जाने-अनजाने चेहरे पर पड़ी ही थी कि उस युवक ने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा- हाय ! “मैं” आकाश, पहचाना..!

नंदिनी मुस्कुराते हुए बोली ‘अरे आप’

जी, पहचान लिया, आपको भूल सकते है, भला..? थैंक गॉड मुझे तो लगा था कि आप कहाँ हमें याद रखेंगी ?

अब चलिए मैडम, कॉफ़ी पिलाओगे, किताबें तभी मिलेंगी। न जाने क्यों नंदिनी मना नहीं कर पाई।

(दोनों कैफ़े जाते हुए)

अच्छा ! आपने हमारा पेमेंट क्यों किया ?

आकाश कहता है क्यूँ किया मतलब, देखिये थोड़ी सी जान-पहचान तो है, ना हमारी....मुझे भी पढ़ने का शौक है और ये आप पढ़ेंगी तो हमें भी अच्छा लगेगा और फिर मैं अपनी पेमेंट ले रहा हूँ, ना...कॉफ़ी (दोनों हँसने लगे) ओके….(दोनों ने एक साथ कहा और मुस्कुराये)

आज कॉफ़ी पीते हुए ढेरों बातें हुईं। अनजाने में ही सही पर आकाश और नंदिनी बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे। आकाश काफ़ी बोलने वाला और मिलनसार लड़का था नंदिनी को लगा ही नहीं की वो उसके लिए अनजान है।

बातें करते - करते वक़्त का पता ही नहीं चला नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखा तो सूरज ढलने लगा था, शाम होने वाली थी और वह आकाश से कहने लगी... बहुत देर हो गयी है आकाश, अब मैं चलती हूँ।

आकाश ने कहा- हाँ नंदिनी, फिर मिलते है, अपना ख़्याल रखना।

नंदिनी कहती है- हाँ, तुम भी अपना ध्यान रखना। अरे अब इसका पेमेंट। ( आकाश मज़ाक में कहा)

दोनों मुस्कुराये …. और एक- दूसरे को बाय किया।

नंदिनी को आज अच्छा तो लग ही रहा था पर अलग भी, जो उसने कभी महसूस नहीं किया। अनजाना ही सही पर एक अपना सा एहसास…! उसके दिल को छू रहा था।

पहली बार उसने ऐसा कुछ महसूस किया था। और नंदिनी ने हफ़्ते भर में ही सारी किताबें पढ़ डाली। पता नहीं क्यों उसे लग रहा था कि अगर आकाश से मुलाकात हुई और उसने पूछा कि क्या नया पढ़ा तो वो क्या कहेगी। अब वो उस शख्स का इंतज़ार करने लगी जिससे यूँ ही अनजाने में मुलाक़ात हुई थी।

नंदिनी हर रोज जहाँ भी जाती बिल्कुल अच्छे से तैयार होकर जाती अब उसे हर दिन यह लगने लगा कि शायद उसकी मुलाक़ात आकाश से हो जाए वैसे वो बड़ी ही सिम्पल सी लड़की थी।

“हाँ, पर अब तक उसने घड़ी भर के लिए भी आईने में इस क़दर स्वयं को निहारा न था और न ही आईने ने उसे।“

पर महीनों बीत गए आकाश से मुलाक़ात न हुई। अब वो मुलाकातें भी ओझल सी लगने लगी। दोनों ने एक-दूसरे के फ़ोन नंबर भी नहीं लिए थे। उधर आकाश भी नंदिनी को बहुत ढूंढ़ रहा था कई बार जयपुर आया भी पर नंदिनी से मुलाक़ात न हुई और अब फिर एक दिन आकाश अपने काम से जयपुर आया है। ऑफिस के काम से फ्री होकर उसने होटल जाने के लिए कैब बुक की पर शेयरिंग में….

कुछ दूर जाने पर कैब रुकी। आकाश फ़ोन पर इतना बिजी था कि उसने देखा ही नहीं कि कैब में बैठने वाला दूसरा पार्टनर कोई और नहीं बल्कि नंदिनी ही थी पर कैब नज़दीक आने पर नंदिनी उसे देखकर बहुत खुश थी। नंदिनी कैब में बैठ गयी आकाश का फ़ोन कटने पर नंदिनी ने कहा- अब इसका पेमेंट आपको डबल देना होगा। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और आकाश ने कहा...ओह ! नंदिनी मैंने तुम्हें बहुत ढूंढा, बहुत याद किया मैं नहीं जानता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो? तभी आकाश ने नंदिनी का हाथ पकड़ा और कहा- “ मुझसे शादी करोगी ना..."

शायद नंदिनी भी मन ही मन यहीं सुनना चाहती थी। अब उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। दोनों की आँखों ने वो सब क़बूल किया जो वो पिछले काफ़ी दिनों से महसूस कर रहे थे और एक-दूसरे से कहना चाहते थे।

अब नंदिनी ने बड़े ही अधिकार और चंचलता से कहा- चलो अब कॉफ़ी पिलाओ इतने दिन ना मिलने का हर्जाना दो। दोनों ने मन ही मन इसे स्वीकार किया।

इज़हार-ए-इश्क़ क़बूल हुआ !

….समाप्त……



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