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Dr. Neetu Singh Chouhan

Inspirational


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Dr. Neetu Singh Chouhan

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दबंग तारा दादी

दबंग तारा दादी

5 mins 259 5 mins 259

लंबी-चौड़ी कद काठी, गोरा रंग,अस्सी वर्ष की उम्र में भी लाल टमाटर जैसे गाल जितनी खूबसूरत उतनी ही मज़बूत आवाज़ ऐसी दमदार की दलान में खड़े होकर जोर से डांटे तो बस स्टैंड पर बैठे दो-चार आदमी तो खड़े हो ही जाते । ऐसी थी हमारी दबंग 'तारा दादी'...

पूरे गाँव में जितना दादी का ख़ौफ़ था उतना ही दादी का प्यार।दादी सबको बड़े ही लाड़ प्यार से रखती पर ग़लत काम पर उतने ही प्यार से ख़बर लेती।अपने ज़माने की बड़ी लठैत रही हमारी 'तारा दादी' ।

गांव में दादी की बिना इजाज़त पुलिस भी नही आ सकती थी।दादी के नाम का डंका सारे गांव में पूजता था सभी दादी की इज्ज़त करतें थे किसी के भी घर-परिवार में लड़ाई-झगड़ा हो जाता तो 'तारा दादी' को ही बुलाया जाता। दादी सबकी बात बराबर सुनने के बाद ही फ़ैसला करती और जो फ़ैसला तारा दादी कर देती वो अखण्ड जोत सी हो जाती।गांव के पंच-सरपंच एक तरफ और 'तारा दादी' एक तरफ।

तारा दादी के पांच पुत्र हुए बड़ा बेटा करण सिंह बिल्कुल अपनी माँ जैसा दबंग और स्वाभिमानी।छोटी उम्र में ही करण सिंह को बाहर पढ़ने लिखने भेजा गया। जल्दी ही करण सिंह की सरकारी नोकरी लग गयी।अब तारा दादी की ख़ुशी की हुँकार सारे गांव में सुनी गई। दादी ने पूरे गावं में मोतीचूर के लड्डू बंटवाए और जिसने जो माँग की पूरी की गई।

उसी गावं में एक जग्गू बाबा भी था एक दिन वो तारा दादी के पास गया बोला दादी राम राम दादी भी बड़े प्यार से बोली- राम-राम भाई राम-राम जीवन्दा रह।

दादी हरियाणा की रही बोली-के बात जग्गू आज राम राम करके बैठ क्यूकर गया।जग्गू बाबा-के बताऊ दादी, दादी समझ गयी सोचने लगी दाल में कुछ काला स बोली रहन दे मत बता फेर आ जाइये।जग्गू बाबा ने सोचा जो अब बिना बताए चला गया तो दादी फिर न मिलेगी।

जग्गू बाबा- "दादी तेरे पावँ दबा दूँ?"

तारा दादी-"रहन दे मैं के बूढ़ी थोड़ी सु पर आज मेरे पावँ दबाने का कारण के स बिना कारण तो तू किसी का गला भी न दबावे।"

जग्गू बाबा-'हँसते हुए' "ना ना दादी वो बस 'एक बोरी चीनी की चाहिए थी'।"

तारा दादी- "अच्छा! तो या बात स।दादी बड़ी मजाकियां रही भाई एक बोरी चीनी मे के ब्याह करवावेगा, ठीक स लेजा पर टेम प दे दिए अगर मैं मर गयी तो या एक बोरी चीनी की मेरे करण को दे दिये अब जा, ले जा।"

तारा दादी आटे के हलवे की बडी शौक़ीन रही।बड़ी वाली डेगची में हलवा बनाती और जब खाती तो बाबा को बहुत याद करती।कई बार अपनी पोती निम्मी से कहती निम्मी हलवा तो तेरे बाबा बनवाया करतें थे और हम साथ खाया करतें थे। तेरे बाबा तो डेगची में ही खाते थे हलवा....हँसकर कहती मुझे भी अपने साथ खिलाते थे, निम्मी तेरे बाबा बहुत अच्छे थे..!

कहते कहते दादी की आँखों से आँसू छलक गए और और मन ही मन बाबा की याद में खो गयी।

एक दिन किसी की शिकायत पर गांव में पुलिस आ गयी। दारोगा जी नए आये थे वरना दादी की बिना इजाज़त पुलिस गांव मे हो ही नही सकता। किसी ने ख़बर दी अवैध शराब छुपाने का मामला था गांव के जाने माने व्यक्ति सारा गाँव उन्हें चाचा-चाचा कहता नाम था "इंद्र सिंह"गाँव में चाचा इंद्र के नाम से जाने जाते।होने को दादी के दूर के परिवार में ही थे।अब चाचा इंद्र को पुलिस अपने साथ ले जाने लगी

इतने में ही दादी तारा हाथ में लाठी लिए मौक़े पर पहुँची। सारी कथा दादी को बताई गयी दादी ने भी सभी की बातें सुनी तमाम कहानी सुनने के पश्चात दादी बोली "दारोगा जी इंद्र ने में बरसों से जानू हूँ, ये आदमी ऐसा काम नही कर सकता 'जिससे म्हारे गांव की बदनामी होवें'।आप इसने लेके ना जाओ मैं दादी तारा आपने पूर्ण भरोसा दिलाती हूँ।" दारोगा जी ने एक ना सुनी और कहा "इंद्र सिंह गुनहगार है और मैं इसे आज साथ लेकर जाऊँगा व लॉकप में बंद करूँगा आप सुबह आकर ज़मानत दे देना।"

आज से पहले दादी की बात को इस तरह किसी ने नही नकारा था।अब दादी आग-बगुला हो गयी और बोली दारोगा जी आप थोड़ी देर ठहरो चाय-पानी पिओ इतने यो माजरा मैं फेर देख लू।

दादी ने अपने लोगों से कहा-देखो भाई इब गांव की इज्ज़त को सवाल है पता लगाओ इसके पीछे कौन है। दारोगा मन ही मन बड़ी कुटिलता से मुस्कुरा रहा था। उसे दादी के बारे में जानकारी नही थी

कुछ देर बाद मुखबिरों की दादी के पास ख़बर आयी। अब दादी की लाठी में अलग ही ताव आ गया।दादी जोर से कड़क आवाज़ में बोली "रे दारोगा जी सुनो और मेरे गांव वालों थम भी सुनो इंद्र सिंह के घर मे शराब दारोगा जी के आदमियों ने रखवाई है कुछ लोगों ने आकर इस बात की गवाही सारे गांव के सामने दी।और दरोग़ा जी को इस बात के लिए पैसे दिए गए थे।" ख़बर सुनते ही दारोगा जी के होश उड़ गए और कहने लगे दादी जी आप तो हमारी बुजुर्ग हो जाने दो मामले को यहीं रफा-दफा करते हैं।

तारा दादी ठहाके मार के हँसने लगी और बोली दारोगा जी इब तो यो मामला दादी तारा ही रफा-दफा करेंगी साथ मे तने भी।दरोग़ा जी हाथ जोड़ने लगे।

"दादी मुझे माफ़ कर दो आगे से ऐसा नहीं होगा कुछ पैसों की ख़ातिर मैं बिक गया था।"

तारा दादी बोली-"यो छोटी-मोटी बात ना है म्हारे गांव की बदनामी हुई है। जिस गांव मे आज तक पुलिस ना आयी जिस घर का शराब से दूर-दूर तक लेना-देना न था। इंद्र सिंह गांव का इज्ज़तदार आदमी है।"

ये बात माफ़ नही की जाएगी। और कहा दारोगा जी आपने चाचा इंद्र सिंह से सारे गांव के सामने माफ़ी मांगनी होगी और क़ानून की कसम खाकर कहिये की आज के बाद आप ऐसा कभी नही करेंगे और ना ही किसी को करने देंगें। अपनी वर्दी की इज्ज़त करना सीखिए दारोगा जी बस मैं इतना ही कहना चाहती हूँ।दारोगा जी ने बिल्कुल वैसा ही किया जैसा दादी तारा ने कहा, अपने ग़ुनाह की माफ़ी माँगी और दादी को प्रणाम किया।

तारा दादी जाते हुए सारे गांव को एक संदेश दे गई बोली-"अपने देश का मान बढ़ाओ,ऐसा कोई काम मत करो जो तुम्हें नज़रें झुकानी पड़े, सुखी रहो।"सारा गांव तारा दादी की जय-जयकार करने लगा।

तारा दादी हँसते-हँसते हाथ से आशीर्वाद देते हुए मुस्कुराते हुए घर को लौट गई।



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