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Dr Jogender Singh(jogi)

Comedy


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अज़ब ग़ज़ब प्रेम पत्र

अज़ब ग़ज़ब प्रेम पत्र

4 mins 216 4 mins 216

हिरणी सी चाल ? नहीं ऐसी हिरणी, उलटी आ जायेगी। 

हूँ—— हूँ - हूँ ऊँटनी सी चाल, कुछ ठीक, पर इतनी मोटी ऊँटनी।जम नहीं रहा यार, अब तू ही कुछ सोच।अशोक ने राजीव की तरफ़ देखते हुये कहा।"मज़ाक़ मत कर यार, कल वापिस जाना है, जाने से पहले उसे,एक बार दिल की बात बताना चाहता हूँ ''राजीव बोला।

अशोक और राजीव प्रेम पत्र लिखने की कोशिश में लगे हैं।

राजीव नेपाल बॉर्डर के पास सोनाली में रहता है। अपनी दीदी जीजा जी के पास छुट्टियों में गोरखपुर आया है।

मोहल्ले की एक लड़की कल्पना से प्यार हो गया, और अशोक से दोस्ती। हफ़्ते भर के लिये आया राजीव, दो महीने गुजरने पर भी जाने का नाम नहीं ले रहा है, कल्पना के प्यार में ऐसा डूबा कि घर का पता ही भूल गया।जीवन ने कई बार रितु से कह भी दिया " तुम्हारा भाई वापिस नहीं जायेगा क्या ?''रितु उसकी बात को अनसुना कर देती। पर कल रात जीवन ने राजीव से सीधे बोल दिया "साले साहब, यँही बसने का इरादा है क्या " ? " नहीं जीजा जी,मम्मी की याद आ रही है, परसों चला जाऊँगा " राजीव अटक अटक कर बोल पाया।जीवन ने रितु की तरफ़ देख आँखों ही आँखों में मानो धमकी दी " भेज देना इसको नहीं तो "। रितु की कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुयी।

कल्पना दोहरे बदन की गोरी लड़की, और राजीव के  चेहरे की हड्डियों की आराम से गिनती की जा सकती है।नदी के दो किनारों से एक दूसरे को बालकनी से ताड़ कर ख़ुश होते रहते।राजीव के न शरीर में इतना दम है, न ज़िगर इतना मज़बूत की गली में आ कर कल्पना को देखे।

कल्पना को कभी भी किसी लड़के ने घास नहीं डाली, राजीव की तरफ़ उसका आकृष्ट होना स्वभाविक है। 

एक तो दूसरे शहर में होने का डर, ऊपर से जीजा जी का ग़ुस्सा,राजीव को बुज़दिल बना देता।

फिर भी जीजा जी के जाते ही राजीव नहा धो कर बालकनी में खड़े होकर बाल बनाता रहता। सड़क के उस पार कल्पना अपनी बाल्कनी में आ खड़ी होती। कल्पना का परिवार तीसरी मंज़िल पर रहता है।राजीव के जीजा जी दूसरी मंज़िल पर।सरकारी कॉलोनी है। सरकारी कॉलोनी होने के इशकबाज़ो को कुछ फ़ायदे तो कुछ नुक़सान भी। फ़ायदे जैसे कोई बड़ा गुंडा मवाली नहीं होता, जो बात बात पर हड़का दे, नुक़सान सब एक दूसरे को जानते हैं। 

बिना नाविक की नाव सी दोनो की प्रेम कहानी हिचकोले खा रही है, तभी राजीव को अशोक रूपी मल्लाह नज़र आ गया। अशोक की दोस्ती के सहारे राजीव गली में खड़े होने की हिम्मत करने लगा।कल्पना भी तुरंत बाल्कनी में आ जाती, बाल सुखाने,कपड़े सुखाने या छोटे भाई को बुलाने के बहाने। राजीव को चारों तरफ़ हरा हरा नज़र आ रहा था,कि जीजाजी ने रुख़स्ती का फ़रमान जारी कर दिया।

अब प्रेम पत्र ही एक सहारा बचा है। दोनो मित्रों की शिक्षा आधी अधूरी। कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। क्या करें। 

"अशोक, भाई कोई रास्ता निकाल " ऐसे तो मैं मर जाऊँगा।

सोचने दे यार, दिमाग़ मत ख़राब कर। 

एक ही दिन का टाइम है। राजीव मानो रो देगा।

चरगवाँ तक चलेगा ? मेरा भाई, बुआ का लड़का रहता है, उसकी हिंदी बहुत अच्छी है। उस से लिखवा लेते हैं चिट्ठी। अशोक जोश में बोला।

" पर भैया की राइटिंग होगी, वो न फँस जायें" राजीव सोचते हुये बोला।

देख ! चिट्ठी उनसे लिखवाएँगे, बाद में तू अपनी राइटिंग में लिख, मेरे पते पर पोस्ट कर देना। मैं किसी तरह से कल्पना तक पंहुचा दूँगा। अशोक ने सुझाया।

यह ठीक रहेगा ! राजीव जोश से बोला। चल, चलते हैं।

विकास तैयार नहीं हो रहा,चिट्ठी लिखने को, तू जानता है ना मामाजी को, पता चल गया तो क्या हालत करेंगे। उसने अशोक को समझाया।

" भैया राजीव मेरा पक्का दोस्त है, प्लीज़ लिख दो ना, यह अपनी राइटिंग में नक़ल कर लेगा "। अशोक गिड़गिड़ाया।

मेरा नाम नहीं आना चाहिये। चिट्ठी को देते हुये विकास बोला।

थैंकयू भैया। 

अशोक भाई तू सच्चा दोस्त है मेरा, राजीव ने अशोक को गले लगाते हुये बोला।

घर पंहुचते ही चिट्ठी भेजूँगा, बस तू कल्पना को दे देना, किसी तरह से।

निश्चिंत रह ! बस तू नक़ल कर भेज तो। फिर कब आयेगा ? अशोक उदास हो गया।

सर्दियों में आऊँगा।बाई भाई।

राजीव ने विकास के लिखे प्रेम पत्र की नक़ल अशोक के पते पर भेज दी,

गलती से पोस्टमैन वो चिट्ठी दूसरे पते पर दे गया।

पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया वो प्रेम पत्र, लड़की का नाम कँही भी नहीं लिखा गया था, इसलिये कल्पना, अशोक या विकास के ऊपर कोई उँगली नहीं उठी। परंतु भेजने वाले का पता साफ़ साफ़ लिखा था।राजीव फ़्राम सोनाली।

राजीव का अपनी बहन के यँहा आना जाना बंद हो गया।

अशोक भी किसी दलबदलु नेता की तरह राजीव के सीमित भाषा ज्ञान का चटखारे ले,मज़ाक़ बनाता।

दरअसल राजीव ने विकास की लिखवाई चिट्ठी में कुछ अपने स्पेशल इफ़ेक्ट्स डाल दिये।

जैसे दिल धाड़ धाड़ की जगह साड़ धाड़, तुमसे मिल कर मर जाऊँगा इत्यादि। लोग चटखारे ले ले चिट्ठी का ज़िक्र जीवन और रितु के सामने महीनों करते रहे। छोटी जान पहचान से भरे लोगों की कॉलोनी में रहने के साइड इफ़ेक्टस।

"इशकबाज़ी करने चले, क ख ग आता नहीं, पूरे मोहल्ले में नाक कटवा दी " जीवन बड़बड़ाता। कम से कम चिट्ठी तो सही लिख सकता था। न शक्ल, न अक़्ल चले मज़नू बनने।रितु धीमे से मुस्कुरा कर रह जाती। पर जीवन को सुनाने के लिये बोलती "नालायक है"।


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