Kumar Vikrant

Comedy


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Kumar Vikrant

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अग्नि-शामक

अग्नि-शामक

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लॉक डाउन में थोड़ी सी छूट मिलते ही गुलफाम नगर के सारे दीवाने किसी न किसी बहाने अपने घरों से निकल कर अपनी-अपनी महबूबा की गली की और दौड़ पड़े। घंटों महबूब की गली के चक्कर लगाने से भी कुछ हासिल न हुआ, किसी के सिर पर मैसेज की मिट्टी पड़ी कि-

कोई सूरत नहीं चौबारे पर आने की इसलिए फूट लो गली से।

किसी को महबूबा के पहलवान छाप भाइयों ने घूर कर देखा तो वो सिर पैर रख कर भाग निकले। एकाध को महबूब के मास्क पहने चेहरे का दीदार भी हुआ और ख़ुशी से पागल हो बौराये से दौड़ पड़े शराब के ठेकों की और।

कुछ मुफ्तखोर आशिक लपक लिए गुलफाम नगर की घुड़साल के मालिक छक्कन दादा के अड्डे की तरफ। छक्कन दादा पूरे गुलफाम नगर के आशिकों का सरपरस्त तो था ही लेकिन उसकी घुड़साल में मिलने वाली मुफ्त की चाय का लोभ अक्सर इन आशिकों को घुड़साल की तरफ खींच लेता था।

"अबे, झब्बू, नब्बू, मोहन, मैक इधर किधर? अबे ये तो रूंणा, झुना और मक्खन सब इधर ही आ रहे है.....अच्छा आ जाओ बेटे और सोशल डिस्टेंस के हिसाब से बैठ जाओ।" छक्कन दादा ने आशिकों की फौज को घुड़साल में आते देख कर कहा और कड़वा सा मुंह कर चारपाई से उठ बैठा।

"दादा आ गए लेकिन चाय पीनी है पहले........" मक्खन घुड़साल के विशाल बरामदे में पड़े अनेकों मोढो में से एक में धंसता हुआ बोला।

"बिलकुल पी बेटा चाय, लेकिन जरा सी तकलीफ़ कर, जरा भाग कर जालिम सिंह डेरी से पाँच लीटर दूध ले आ, और जालिम सिंह को कह देना अभी लॉक डाउन की वजह से गत्ता फैक्टरी से घोड़ों की लीद का दाम नहीं मिला है, मिलते ही दे देंगे दूध का दाम।" छक्कन दादा ने मक्खन को बड़े प्यार से कहा।

मक्खन के जाते ही छक्कन दादा ने बाकी के आशिकों पर निगाह डाली और बोला, "बेटा मोहन जरा भागकर भुककन की दुकान पर चला जा और पाँच किलो चीनी, एक किलो की पत्ती और पाँच-दस रस्क के पैकेट पकड़ ला, पैसा माँगे तो वही घोड़े की लीद वाली घुट्टी पिला देना।"

मोहन के निकलते ही छक्कन दादा ने पुचकार कर कहा, "बेटा रूंणा, झुन्ना तुम चाय के बर्तन और प्याले माँझ के साफ कर लो..... अरे बेटा शर्माओ मत सब तुम्हारे भाई-बंधू ही पीएंगे चाय । बेटा मैक तू जरा भट्टी स्टार्ट कर लेकिन ध्यान से वहाँ गैस के दो पुराने सिलेंडर पड़े है...... कहीं लीक न कर रहे हो?"

मैक, रूंणा और झुन्ना के काम पर लगते ही छक्कन दादा की निगाह नब्बू और झब्बू पर पड़ी। कुछ सोचकर वो बड़े प्यार से बोला, "बेटा नब्बू, झब्बू जरा घुड़साल के अंदर चले जाओ और किसी घोड़े ने लीद कर दी हो तो उसे हटा देना, सूखी लीद को बोरो में भरकर गोदाम में रख देना, अबे घबराओ मत, लॉक डाउन में तुम थोड़े कमजोर हो गए हो, थोड़ा काम करो फिर से मजबूत हो जाओ।"

सारे आशिकों को काम पर लगाकर छक्कन दादा अपनी चारपाई पर लेट गया और रेडियो बजा दिया और रेडियो पर बजते गाने- 'राजा दिल मांगे चवन्नी उछाल के,' में खो गया।

अबे उस्ताद सुबह-सुबह गालियाँ दिलवा दी...

-कोई कर्कश आवाज़ में बोला। 

छक्कन दादा ने आँख खोलकर देखा तो मक्खन और मोहन दूध, चीनी आदि बरामदे में रख रहे और बड़बड़ा भी रहे थे।

"क्या हुआ बे, क्यों बड़बड़ा रहे हो?" छक्कन दादा ने प्यार से पूछा।

दोनों ने बड़ी तफ्सील से बताया कि उधारी के नाम पर दोनों दुकानदार उसे गालियाँ दे रहे थे और कह रहे थे कि घोड़ों की लीद की बिक्री के नाम पर छक्कन उन्हें कई सालों से चूना लगा रहा है।

"अबे छोड़ो, अपने लंगोटियां यार है वो दोनों..... भौकने दो उन्हें, तुम ये सामान मैक को दे दो चाय बनाने के लिए।

कुछ देर बाद ज्यादातर आशिक अपने काम से फ्री होकर फिर से छक्कन दादा के सामने सोशल डिस्टेंस के हिसाब से बैठ कर गप्पें मारने लगे तभी एक भयानक हिस्स की आवाज़ हुई और मैक की आवाज़ आई, "आग लग गई उस्ताद!"

सारे आशिकों ने छक्कन दादा की और देखा और भड़कती आग को बुझाने के लिए घुड़साल में जा घुसे।

नजारा भयंकर था दोनों पुराने सिलेंडर लीक कर रहे थे और उनसे आग की लपटे निकल रही थी। मोहन, नब्बू और झब्बू भड़कती आग को काबू करने के लिए कभी मिट्टी कभी पानी डाल रहे थे लेकिन आग काबू में नहीं आ रही थी।

मक्खन दूर खड़ा उन तीनों को सीख दे रहा था, "अबे मिट्टी नहीं रेत डालो, अबे गर्म नहीं ठंडा पानी डालो।"

काफी मशक्कत के बाद भी आग न बुझी तो छक्कन दादा लाल-पीला होता आया और दहाड़ कर बोला, "अबे फटीचर आशिकों तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है क्या? अबे ये पुराने सिलेंडर है इनकी आग ऐसे नहीं बुझेगी....... जाओ घोड़ों की लीद के दो-तीन बोरे पानी में भिगा कर इन सिलेंडरों के मुँह यानी नोजिल में ठूस दो और अच्छे से ढक दो आग बंद हो जाएगी।"

तरकीब काम कर गई और आग बुझ गई लेकिन इस सारी मशक्कत में मोहन, नब्बू और झब्बू काफी झुलस गए थे और बरामदे में चारपाइयों पर पड़े हाय-तौबा कर रहे थे।

"अबे बिना विचारे कूद पड़े आग में, अबे वो पुराने सिलेंडर मेरे है और उनका इलाज मुझे पता है, मुझसे तो कुछ पूछ लेते....अबे उस्ताद हूँ तुम्हारा लेकिन ये फालतू की चापलूसी पसंद नहीं मुझे....."

"सही कह रहे उस्ताद, आज तो महंगी पड़ी फालतू की चापलूसी, लेकिन अब कुछ इलाज तो करो....." मोहन, नब्बू और झब्बू तड़फ कर बोले।

"बेटे अस्पताल में तो तुम्हें कोई लेगा नहीं.... इसलिए यहीं इलाज होगा तुम्हारा।" छक्कन दादा चिंता से उनकी तरफ देखा और रूंणा, झुन्ना की तरफ देख कर बोला, "बेटे रूंणा, झुन्ना तुम जरा सुक्खन मेडिकल स्टोर तक चले जाओ और एक बाल्टी बरनौल ले आओ खुले वाला। सुक्खन पैसा माँगे तो घोड़ों की लीद का पेमेंट आने की बात कह देना.......अरे मान जायेगा पुराना लँगोटियाँ है वो अपना।"

रूंणा, झुन्ना के जाते ही छक्कन दादा बोला, “बेटे मैक जो हुआ सो हुआ, अब मस्त चाय बना कर ला।"

मैक चाय बनाने चला गया और बाकी आशिक मोहन, नब्बू और झब्बू की हाय-तौबा के बीच अपने गप्पों में उलझ गए।

छक्कन उस्ताद फिर चारपाई पर जा लेटा और रेडियो के रेट्रो सांग्स में खो गया ।


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