अधूरी ज़िन्दगी
अधूरी ज़िन्दगी
उस दिन स्टाफ रूम में जब मैं थक कर बैठी कुछ सोच रही थी तभी एहसास हुआ की पास में रूपा आकर गुमसुम सी बैठी अपने में कुछ खोई खोई सी थी। जब मेरी नजर उसकी तरफ गई तो फीकी सी हंसी उसके चेहरे पर फैल गई। मैंने सोचा शायद ज्यादा थक गई है इसलिए चेहरा उतरा सा लग रहा है या फिर दो दिन पहले वायरल फीवर की वजह से ऐसी दिख रही है पर उदासी के पीछे की वजह तो कुछ और ही थी मैं उससे ज्यादा बातें ना कर पाई क्योंकि मुझे क्लास लेने जाना था।
छुट्टी होने के बाद जब हम आधे घंटे अपने पेंडिंग काम खत्म करने के लिए बैठते हैं तब मुझे महसूस हुआ की रूपा आज बड़ी अनमनी सी लग रही है। मैंने काम छोड़कर उससे बात करना चाहा पर वह बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी मैंने पूछा क्या बात है रूपा ,आज तुम्हें क्या हुआ है, क्यों तुम्हारा मूड ठीक नहीं है। उसने कहा दीदी रक्षाबंधन की दो दिन की छुट्टी आ रही है सब अपने भाई को बुलाएंगे राखी बांधेंगे पर मेरे लिए तो अब इस दिन का मायने ही खत्म हो गया है।
मैंने कहा ऐसी क्या बात है। उसने बताया कि मेरा भाई मुझसे मिलनेचौबीस साल से नहीं आया है मैंने इतने सालों में उसकी शक्ल भी नहीं देखी है। मैं बड़े आश्चर्य से उसकी तरफ देखती रह गई ,ऐसा भी कहीं होता है कि भाई अपनी बहन को देखने तक ना आए। अपनी कुर्सी को मेरी तरफ खिसकाते हुए उसने बताया कि दीदी मैं यह बात आपको बहुत पहले बताना चाहती थी पर काम की व्यस्तता के कारण इस विषय पर हमारी कभी बात ना हो पाई। जब मुझे प्यार से वो दीदी कहती थी तो इस पराए शहर में मुझे वही अकेले अपनी छोटी बहन जैसी जान पड़ती थी। उसने बताया की मैंने अपने माता पिता के विरुद्ध जाकर प्रेम विवाह किया है। जब हम दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे तभी नरेश मुझे बहुत पसंद आने लगे।उनकी सादगी और गंभीर स्वभाव ने मुझे आकर्षित किया। हम दोनों ने पढ़ाई के बाद शादी करने का निर्णय लिया पर मैं गुजराती थी और वह बंगाली। मेरे माता-पिता के पास जाकर जब मैंने अपनी बात बताई तो वह बहुत नाराज हुए उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया। मुझे धमकी भी दी की अगर मैं शादी कर लेती हूं तो वह मुझसे सारे संबंध तोड़ देंगे। मैंने कई फिल्मों में देखा था की लव मैरिज के बाद माता पिता अपने बच्चों से ज्यादा दिन तक नाराज नहीं रह सकते शादी के बाद वे उन्हें अपना लेते हैं।मैंने सोचा शादी के बाद सब ठीक हो जायेगा। मैं नरेश के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं की थी जब नरेश के माता पिता ने मुझे देखा तो शादी के लिए तैयार हो गए।
बड़े धूमधाम से हमारी शादी हुई पर मेरे माता पिता शादी में ना आए। मैं चाहती थी कि मेरी शादी उनके आशीर्वाद के साथ पूरी हो ,पर शादी खत्म होने तक मेरा इंतजार इंतजार ही रह गया। वे नआए। शादी के बाद मैंने कई बार फोन किया पर वे मेरी आवाज सुनकर फोन बंद कर देते थे। मैंने बहुत कोशिश की पर उन्होंने मुझे और नरेश को नहीं अपनाया। शादी के दो साल बाद मेरा बेटा राहुल पैदा हुआ। घर में जैसे खुशियां छा गई। मेरे ससुराल वालों ने मेरी ख़ुशी के लिए बिना किसी की परवाह किए मेरे माता-पिता को घर बुलाया। उस दिन मैं बहुत खुश थी मुझे लगा राहुल को देख कर मां इतनी खुश हो जाएगी कि मुझे गले लगा लेगी। पापा का गुस्सा भी शांत हो जाएगा ,उन्हें राहुल के चेहरे में शायद मैं ही नजर आऊंगी पर इतने प्यार से बुलाने के बाद भी वे लोग नहीं आए। मेरे ससुराल में किसी भी चीज की कमी नहीं थी सब कुछ होने के बावजूद भी मैं कहीं ना कहीं अधूरापन महसूस करती थी।
मुझे अंदर कुछ खाली ख़ाली सा लगता था। जब कोई त्यौहार आता तो मेरी सहेलियां मायके की बातें करती और वहां जाती थी स्कूल में भी दीदी आप सब जब अपने मैके की बातें करते हो तो मुझे अपनी जिंदगी का अधूरापन महसूस होता है ,पर मैं किसी के सामने इसे बताना नहीं चाहती। मुझे एहसास होने लगा कि शायद मैंने नरेश के साथ शादी करके कोई गलती की है। मेरी मां भी तो यही चाहती थी कि मेरी शादी एक ऐसे घर में हो जहां सब सुख सुविधाएं हो और मेरा पति मुझे खुशियां ही खुशियां दे।
मुझे जीवन में सब कुछ मिल गया था ,।पर मां को ऐसा लगता कि मेरी शादी अपनी बिरादरी में होती तो उनका रुतबा समाज में बना रहता अब उन्हें ऐसा लगता है कि उनकी बिरादरी वालों ने उन्हें समाज से बाहर कर दिया है और उसकी वजह मैं हूं। मैंने देखा कहते कहते रूपा का गला भर आया बड़ी मुश्किल से वह बातें कर रही थी।मेरी आँखें कब भर आयी मुझे भी पता न चला।मैंने उसे गले से लगा लिया। वो मुझे पकड़ कर रोने लगी आगे उसने बताया आज मेरी शादी को चौबीस साल हो गए मैं हर रक्षाबंधन पर थाली सजाकर अपने भाई का इंतजार करती हूं। अब वो बड़ा हो गया है और मुझे लगता है कि शायद वो मुझे समझ सकेगा और मुझसे मिलने आ जायेगा काश ,मेरी मां को मुझसे नहीं तो मेरे बेटे को देखने की इच्छा हो जाये और वह मुझसे मिलने आ जाये। मैं उसकी तरफ देखते हुए यह सोचने लगी यह समाज तो हम सब से ही बना है। आज हम सब ,औरतों की आजादी और आत्म सम्मान की बात करते हैं पर जब अपने परिवार की बात आती है तो हमारी मानसिकता बदल जाती है। आज रूपा जैसी ना जाने कितनी लड़कियां अपनी पसंद के जीवनसाथी को चुनने के बाद अधूरेपन के अहसास के साथ जी रही है।
