Chhabiram YADAV

Abstract


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Chhabiram YADAV

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अधूरे सपने गूँगा प्यार

अधूरे सपने गूँगा प्यार

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क्लासरूम में पहुँच कर मीना मन गिराये अपनी सीट पर बैठ गयी ।मन को कल्पना का सहारा देकर उड़ान भर अपने अतीत के सुनहरे पलो में खो जाती है ।पूरे बिद्यालय में ओम ही ऐसा लड़का था जो बिल्कुल मीना के दिलो दिमाक में रहता था।मन ही मन ओम बहुत तेज कदमो से क्लास की ओर अपने पैरों की गति बढ़ाता हुआ चला आ रहा था, उसे जो मीना को रोज की तरह देखने, बाते करने की बैचनी बनी रहती थी, जिस दिन वो मीना से बाते नहीं करता था उसका खाना नहीं पचता था।ओम मीना से बेपनाह मुहब्बत करता था, अपने से कई गुना ज्यादा मीना की इज्जत करता था।कभी जबी मीना की आँखों में आँसू देख लेता मानो पूरी कायनात को जला देगा ।कई बार दोपहर तक बात न होने पर शाम होते होते चाहे, किताब के बहाने, या नोटबुक, या पेन पेन्सिल का बहाना कर बोलना चाहता था, जेब में पेन होते हुए भी उसने मीना से कई बार पेन माँगा था, जब मीना उसे इसका बोध कराकर हँसती, मीना के मोती जैसे दाँत, व् मुस्कुराते चेहरे को देख ओम को मानो दुनिया की

जन्नत मिल जाती, दोनों बहुत खुश रहते थे ।ओम मीना का इतना रिस्पेक्ट करता था कभी उसे बोला तक नहीं, और मीना को भी इसका एहसास कम ही था की

ओम मुझसे प्यार करने लगा है।

  लेकिन आज तो कुछ और ही देखा ओम ने, क्लास में मीना आज ऐसे बैठी थी, मानो उसे साँप सूँघ गया हो ।

कल तक जिसके चंचल स्वभाव से पूरा क्लास कोलाहल से गुंजित होता आज वही मीना मौन होकर वेसुध, पड़ी है है।मन ही मन में ओम मीना से पूछने की कई बार कोशिश किया, किन्तु उसने सोचा की हो सकता हो मीना कुछ बोले, हद तो तब हो गयी जब लंच में मीना रूम से निकली ही नहीं ।टिफिन बैग में पड़े रहे।ओम बाहर जाकर टिफिन जैसे ही खोला मीना का चेहरा याद आया,तो ओम क्लास में आकर मीना से बोलने का प्रयास किया ।क्या बात है मीना आज बहुत उदास हो, मम्मी पापा कुछ कहे क्या, मीना कुछ बोलना नहीं चाहती थी 

फिर भी ओम से अपना सर हिलाकर जवाब दिया ।

ओम को पास व् अकेले देखकर मीना के आँखों में आंसू बह चले, ओम ने मीना से समझाते हुए बोला क्या बात है बताओ भी मीना ने सारी दास्ताँ सुनाई 

फिर ओम ने हँस कर बोला हे पगली तू इस छोटी सी बात पर रो रही है, अरे !आज नहींं तो कल तुझे क्या, सब को शादी करना है।कोई कुँवारा जीवन भर रहेगा क्या ।चलो लंच करो फिर हम बताते है उपाय ।ओम अंदर से बिल्कुल टूट चूका था, लेकिन चेहरे पर बनावटी मुस्कान ओम को

हिम्मत दे रहे थे, मीना और उदास न हो जाये।

दोनों लंच करके फिर क्लास में चले जाते है ओम ने मीना को हँसाने का प्रयास करता रहा और सफल भी हुआ, छुट्टी होते होते मीना बिलकुल सामान्य हो चुकी थी ।घंटी बजने पर दोनों साईकिल स्टैंड तक पैदल चल कर आते है ।मीना अपनी साईकिल लेकर बाहर आकर देखी तो साईकिल पंचर, अब क्या होगा ओम, मीना ने संसय भरे शब्दों में ओम से पूछा ।ओम बोला मीना तुम साईकिल लाओ नै बनवाकर ले आता हूँ। ओम साईकिल लेकर पैदल जाता है ,मीना मन ही मन में बैठ कर सोचने लगती है ओम कितना महान है।

कभी ये एहसास नहीं होने दिया की एक राजघराने का लड़का है। मीना के मन में उसके जीवन से सम्बंधित कई सवाल उठने लगे, फिर तो सवालो की बोछार से मीना मानो घायल हो कर कराहने लगी थी, कि तभी ओम आ गया मीना ने ओम को पास बुलाया, और बोली ओम तुम 

मेरे जीवन के बारे में जितना जानते हो कोई नहीं, जनता, जी, बोलकर ओम ने सहमति जताई।

मम्मी की हालत देखकर तुम्हारी क्या राय है, मुझे मम्मी की बात मान लेनी चाहिए। दबे मन से ओम ने मीना से बोला, इसके आलावा कुछ रास्ता भी नहीं है मीना 

आंटी की हालत देख कर अभी कल ही तो आया था ।मीना भी लाचार होकर बोली ! ओम लेकिन मैं भी अपने कैरियर से खिलवाड़ नहीं होने देंगे, मैं भी मम्मी के सामने एक शर्त रखूंगी, मुझे होस्टल में ही पढ़ना है, शादी के बाद भी, ओम बोला सही है।फिर दोनों बातें करते हँसते कब घर पहुँच गए पता ही नहीं चला।

मीना की हर शर्त मानकर उसकी शादी हो जाती है, उस दिन ओम अपने आँसुओ को ऐसे रोक रहा था जैसे बाढ़ से बचाने के लिए कही उसके आँखों के पलो पर ही बाँध बन गया हो। मीना सज सवर कर जब मण्डप में आती है ती ओम की आँखों के सामने पूरी अतीत की बाते, यादे उसे रुहासी कर रही थी।सहन न कर पाने के कारण ओम बारात विदाई से पहले ही घर जाकर, अपने कमरे में मीना की सारी यादों को निकालकर देखने लगा।

फिर उन्हें सहेज कर रख लिया। इधार मीना भी दुल्हन बन अपने साजन के संग अपने ससुराल को विदा हो गयी। शादी के 01 महीने बाद ही मीना की माँ का देहांत हो गया था।ओम आगे की पढ़ाई करने पटना चला गया था ।फिर ओम अपने ही संग पढ़ने वाली लड़की, छबि से विवाह कर लन्दन में शिप्ट हो गए थे। दोनों में प्यार बहुत है यह जानकार मीना को बहुत ख़ुशी मिलती थी।लेकिन

आज भी ओम के दिल में मीना ही बसी हुई है। एक दिन ओम का एक एक जरूरी कागज ढूंढ़ते ही छबि के हाथों बहुत से गिप्ट, फोटो, कैसेट, आदि लग जाता है 

फिर ओम..।


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