Chhabiram YADAV

Drama


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Chhabiram YADAV

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अधूरे सपने गूँगा प्यार- भाग-1

अधूरे सपने गूँगा प्यार- भाग-1

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उन दिनों रामसिंह जी का पदोन्नति निरीक्षक पद से होकर, स्थानांतरण पटना से मुज्जफरपुर में होगया था

मुज्जफरपुर में वो पुलिस उपाधीक्षक के पद पर ज्वाइन किये। मुजफ्फरपुर के शहर के बीचोबीच प्राइम लोकेशन पर उनका निवास, बगल में ही तहसीलदार साहब, ADO साहब वर्मा जी का निवास था, एक बड़ी गाड़ी में पूरे परिवार के साथ रामसिंह अपना सारा सामान एक ट्रक में लेकर अपने सरकारी आवास मुजफ्फरपुर में आकर शिप्ट

हो गए। रामसिंह जी के परिवार में तीन बेटिया और दो बेटे थे, रामसिह जी ने अपने बच्चों की पढाई लिखाई में 

बहुत ध्यान देते थे। सभी बच्चों को कॉन्वेंट से पढ़ा रहे थे। जिनमे दोनो बेटे होस्टल में रहकर अपनी 12वी परीक्षा उत्तीर्ण कर एक इंजीनियर और दूसरा उच्चन्यायालय में वकील हो गया थाई। बेटियो में मीना सबसे छोटी थी। उनदिनों जब की बेटियो को लोग घर से बहार नहींं निकलने देते थे तब रामसिंह ने बड़ी बेटी को परास्नातक व् शिक्षास्नातक कराया, व् बड़ी धूमधाम से 

विवाह किया। बड़ी बेटी मधु, के साथ सुषमा और मीना भी अपने कालेज में मेधावी क्षात्रों में अब्बल थी।

मुजफ्फरपुर में रामसिंहअक्सर क्षेत्र में दौरा करने जाते थे अक्शर दयाशंकर के यहाँ रुकते थे। समय बीतता गया दोनों में गहरी दोस्ती हो गयी, दयाशंकर उस क्षेत्र के बहुत ही रहीश ब्यक्तियों में से थे। और संस्कृत कॉलेज में प्राध्यापक थे। इधर रामसिंह जी की पत्नी भी मधुमेह से पीड़ित थी, चूँकि रामसिंह भी पैसे से कमजोर नहीं थे इसलिए काफी दिनों तक इलाज कराये लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। चिकित्सक द्वारा बताया गया की अब मुश्किल स्थिति में है। इधर रामसिह को बेटियो की शादी की चिंता भी घेर रखी थी, फिर एक दिन रामसिंह 

अपने दिन ड्यूटी पर निकले तो एकाएक चोराहे पर

दयाशंकर जी से मुलाकात हो गयी। तो रामसिह ने दयाशंकर से बोले भाई !आपने जो बचन दिया है भूलेंगे तो नहीं । यह सुनकर दयाशंकर मुस्कराते हुए बोले क्या बात है साहब आज आप बहुत परेशान नजर आ रहे हो। रामसिंह ने अपने दबी आवाज में अपने घर की सारी समस्या बतलाई और अंत में कहे की चलो ये ठीक हुआ, आप यही मिल गए नहीं तो घर आता जरूर। दयाशंकर बोले की, क्या मुझे समाज में नहीं रहना है। सुधा की शादी भी अभी पिछले साल किये है। लेकिन मीना की माँ की जिद है की मीना की शादी भी वो देखले। मीना की उम्र अभी केवल सत्रह साल हि थी। अपने घर में सब से दुलारी थी, मम्मी पापा भाई बहन सब ने बहुत लाड़ प्यार दिया था।

रामसिंह् का मानो आज बहुत बड़ा बोझ हल्का हुआ।

रामसिंह अपनी गाड़ी से आवास पर बहुत तेजी से आ रहे थे, मन मन ही मगन थे, बगले पर पहूँचकर आवाज लगाये मीना की माँ, ओ मीना की माँ सुनती हो, अंदर किचन से आवाज आयी, हा आती हूँ, मीना की माँ अपने पल्लू को सम्हालते हुए आ पहुची, बोली क्या है, रामसिह ने बोला की 

आज तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो गयी। मीना की शादी की बात हो गई ओ भी एकदम पक्की। अरे !कहाँ !अपने जो मित्र है दयाशंकर उनका बेटा राजीव से। मीना की माँ बहुत खुश हुई। यह बात घर में जब मीना भाइयो तक पहुची तो दोनी भाई शाम को, पापा आप क्या कर रहे हो मीना की शादी !वो भी अभी जब की मात्र सत्रह साल की उम्र है, मीना की परीक्षा उसके सर पर है। बेटा !आखिर क्या करता, तुम्हारी मम्मी को दो बार दिल का दौरा पड़ चूका, और किसी तरह से अब तक जीवित है। उनकी इच्छा भी यही है की मीना की शादी हो जाये, बस,फिर अंतिम साँस लूँ घर की सारी समस्याओ को देखकर सब मान गए। मीना को अभी तक कुछ पता नहीं है, की घर में क्या चल रहा है। सुबह माँ ने नाश्ता तैयार कर बोली, चलो सबलोग नाश्ता करो, मीना बोली माँ मुझे ट्यूशन को देर होगी मैं नहीं करुँगी। माँ बोली बेटा मेरे हाथ से कुछ दिन और कर ले, पता नहीं ससुराल में कोई पूछेगा की नहीं।

यह सुनकर मीना अपनी माँ से लिपट गयी बोली नहीं माँ,

अभी मुझे पढ़ने दी, जब मैं जॉब में आ जायेंगे तब देखा जायेगा। ब्रेड को खड़े खड़े खाते हुए मीना ने बोली, अच्छा माँ चली मैं मुझे देर हो रही है, अरे ! बेटा टिफिन लेती जा, मैं इस लड़की से हार गयी। कुछ न कुछ भूल जाती है। टिफिन लेकर मीना जल्दी ही घर से निकल जाती है।  रास्ते भर मीना सोचती रहती की लगता है 

मम्मी पापा नहीं मानेंगे, इस साल मेरे हाथ पिले कर देंगे। फिर मीना अपने मन को मनाती है नहीं, मेरे सपनो का क्या होगा, अभी तो उनमे जान भी नहीं डाल पायी। कही अधूरे तो नहीं रह जायेंगे, मुझे पापा बोले थे की अगले साल हॉस्टल में डालेंगे। मीना इसी ऊहापोह में कब स्कूल पहुँच गयी उसे पता ही न चल सका। अधूरे मन से अपनी साईकिल को स्टैंड में ले जाकर, बिना मन से खड़ी कर क्लास की ओर तेज कदमो से चल देती है, अपने अधूरे सपनो को पूरा करने के लिए, बरामदे में दूर तक अपने दोनों हाथों में किताब को दबाये।


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