shivendra mishra 'आकाश'

Romance


4.0  

shivendra mishra 'आकाश'

Romance


अधूरा प्यार

अधूरा प्यार

8 mins 143 8 mins 143

१)

आज सुबह सुबह अनिमेष के पास उसकी पुराने स्कूल की दोस्त सुरभी का कॉल आया। जैसे ही उसने कॉल रिसीव किया तो उस ओर से हेलो! की आवाज सुनकर अनिमेष तो थोड़ी देर के लिए शांत एवम आश्चर्यचकित हो गया। वह आवाज को पहचान गया था। वह दोनों पहले एक ही स्कूल में गाजियाबाद में पढ़ते थे। फिर अनिमेष कक्षा आठवीं पास करके बरेली के एक नामी स्कूल में दाखिला ले लिया था क्योंकि उसके पिता जी कोई सरकारी विभाग में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। फोन को हाथ में पकड़े हुए अनिमेष तो पुराने ख्यालों में खो गया था ...

कैसे वे एक दूसरे के सम्पर्क में आए, जब स्कूल में एक बार विंटर वेकेशन का टूर सात दिनों के लिए अमृतसर (पंजाब )को गया था। पहले दोनों अलग अलग सेक्शन में थे तो ज्यादा उन दोनों में पहचान नहीं थी, पर वेकेशन में साथ होने के कारण उन दोनों में ओर ज्यादा पहचान एवं बातचीत होने लगी। उन दोनों की यह दोस्ती न जाने कब प्यार मोहब्बत में परिवर्तित हो गई थी इसका किसी को कोई मालूम न चला। एक दूसरे से न जाने जीवन भर के साथ रहने के कसमे- वादे कर लिये। एक दूसरे के बिना न जी पाने की बातें आपस में की। उनका ये प्यार की बातें कितनी सच्ची थी कितनी झूठी ये किसी को नहीं पता....परन्तु दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिक लगाव था। अचानक से सुरभि ने दोबारा से हेलो बोला तो अनिमेष ने अपने अतीत के सपनों से बाहर निकलकर घबराए स्वर में ह ह ह,,,हेलो बोला! सुरभि बोली कि पहचान गये अनिमेष की नहीं ? अनिमेष ने अनजान बनते हुए कहा कि "कौन"??? सुरभि ने बोला कि मैं सुरभि तुम्हारे पुराने स्कूल वाली दोस्त। अच्छा अच्छा...सुरभि! पर कौन सुरभि!! अनिमेष बोला...। वह सुरभि को उत्तर न दे सका और झट से फोन काट दिया। खैर अब पुरानी यादों में क्या रखा है, जब प्राण तन से निकल जाये तो मुर्दो को क्या ग़म होता है।।

२)        

समर बाहर से दौड़ता हुआ अनिमेष के कमरे में आया, ऐसा लग रहा था मानो मास्टर जी का कुत्ता उसके पीछे पड़ा हो हाँफते हाँफते ...लम्बी साँस लेकर बोला की साला मास्टर जी का कुत्ता तो बड़ा खड़ूस है मुझे देखकर न जाने कौन सा भूत सवार हो जाता है? मेरी उससे कौन सी दुश्मनी है ?....हाँ शायद उस दिन का बदला आज भी ले रहा हो जब तूने खिड़की पर चढ़कर मास्टर जी की बेटी रश्मि को पत्र दिया था, तब उसने वह दृश्य देखा था हो सकता है उसकी आँखों में मैं चोर नजर आता हूँगा। और सुना है जानवर अपने शत्रु को भूलता नहीं ।


अनिमेष रश्मि का नाम सुनकर थोड़ा मुस्कुरा दिया। उसका नाम सुनकर वह तो ऐसा गदगद हो गया जैसे जेठ की तपती मिट्टी आषाढ़ की प्रथम बारिश में सुगन्धित हो जाती है। पतझड़ के बाद जैसे पेड़ो में हरियाली आती है।

अनिमेष अब कॉलेज में द्वितीय वर्ष में था जो कि मास्टर जी की बेटी का दीवाना था। कुछ-एकदिन तक तो रश्मि ने भी उससे प्रेम न किया क्योंकि वो पड़ी मास्टर जी की बेटी भला पिता की इज़्ज़त का क्या? परन्तु कब तक बिल्ली दूध को देखकर उसके मालिक से डरेगी!

एक दिन रश्मि ने भी समर के हाथों प्रेम पत्र भिजवा दिया। अनिमेष तो यह खबर सुन ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे स्वर्ग पा लिया हो। अब दोनों की मुलाक़ातें फोन पर बातें, चैटिंग -बैटिंग होने लगी।


अपनी बेटी को फोन में इतना व्यस्त देख मस्टर जी को जरा भी देर न लगी की समझ गये।कुछ तो खिचड़ी पक रही है, और समझे भी क्यों नही भई,

अनुभव के मारे, और ऐसे ही थोड़े मस्टर बन गये, बालों को ऐसे ही थोड़े सफेद किया है।

अब उन्होंने मन में निश्चय किया की मालूम तो कर के रहूँगा आखिर बात क्या है??


वे बहुत दिनों से ऐसा ही मौका ढूँढ रहे थे कि आखिर फोन किसका आता हैं वह मौका उनके सामने अब आ गया था। (फोन उठाते हुए)

अनिमेष:::हाय, स्वीटहार्ट।

मास्टर जी : कुछ न बोले शान्त होकर सुनते रहे।

अनिमेष की आदत थी कि वह रश्मि को हाय स्वीटहार्ट के बाद दो पंक्तियाँ कहता था,


अनिमेष:::" चाँद को भी अपने पर शर्म आ जाती है,

        जब तू मेरे सामने जैसे ही आ जाती हैं।।"

मास्टर जी: गुस्से में...तेरे चाँद का बाप बोल रहा हूँ।

जब दूसरी ओर से इस प्रकार का जवाब मिला तो अनिमेष के पैरों तले जमीन खिसक ली। अब न कुछ बोला और फोन काट दिया।


मास्टरजी लाल-पीले होकर रश्मि को चिल्लाने लगे,

रश्मि...रश्मि....रश्मि। कौन है जो तुम्हें चाँद कह रहा?

रश्मि दौड़ती हुई आई और बोली' --क्या हुआ पिता जी' ! मास्टर जी ने दोबारा वही प्रश्न किया कौन है जो तुम्हें चाँद कह रहा ? किस्से तुम बातें करती हो?

रश्मि -पिता जी मैं नही जानती कौन है होगा कोई रॉन्ग नम्बर।

झल्लकर मास्टर जी --झूठ मत बोलो बताओ कौन है?,

रश्मि कुछ न बोल पाई और सिर झुका कर रोने लगी अभी उसने चुप रहना ही मुनासिब समझा।

परन्तु मास्टर जी ने तो आज कसम खाई थी कि वे शाम को रश्मि की खबर लेंगे।

परन्तु उनके मन में विचार आया कि कुछ दिन पहले रामसिंह ने एक बार किसी लड़के की बात की थी तब उन्होंने उसकी बात नही सुनी थी। अब वे अधीर होकर रामसिंह के घर की ओर चल पड़े।

रामसिंह ने मास्टर जी को घर की ओर आते देख बोला--अरे! मास्टर जी आप इस गरीब की कुटिया में।

मास्टर जी-- मास्टर जी ने दूसरे वाक्य का उत्तर दिया कहा कुटिया है, अटारी तो खड़ी हुई है और क्या?

रामसिंह- - सब आपकी कृपा है।

रामसिंह ने अपनी पत्नी को पुकारते हुये,

अरि !सुनती हो जरा मास्टर जी के लिये पानी -वानी लाओ और अच्छा सा शर्बत बनाओ। धूप बड़ी तेज़ है, पारा चढ़ा हुआ है।

मास्टर जी ने मनाही के संकेत में, अरे रहने दो।

मस्टर जी --रामसिंह कुछ दिनों पहले तुम मेरी लड़की के लिये लड़का बता रहे थे। जरा बताओ तो उसके बारे में।

रामसिंह--अरे साहब!आप तो उस दिन सुनने को तैयार ही नहीं हो रहे थे, ऐसे डींगे मार रहे थे जैसे बेटी का ब्याह करना ही नहीं। पर अब क्या हो गया इतने उत्सुक क्यो हो?

मास्टर जी--भई क्षमा करो हमे उस दिन थोड़ा दिमाग का पारा चढ़ा हुआ था। तो कुछ सूझ नहीं रहा था।

रामसिंह--वो सुहागपुर वालो का लड़का है सुना है इंजीनियर हैं। कमाता -धमता तो अच्छा है। नेक व्यक्ति है वे। अब राम जाने कितना साँच-झूठ हैं।


(३)

घर में धूम धाम से शादी की तैयारियाँ होने लगी। सभी को लड़का पसंद था, परन्तु रश्मि मन में सोच रही है की यह विवाह करना उचित नहीं है, क्योंकि वह तो कसमे वादे कर चुकी थी अनिमेष से। सात जन्मों तक के बंधन में बंधने की सोच ली थी। उसे ऐसा लगता कि अनिमेष के साथ भाग जाऊँ परन्तु पिता की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएंगी। बदनामी होगी और शायद पिता ये अपमान सहन भी न कर पाये। इन्ही विचारो में वह डूबती हुई तड़पते हुई रो रही थी, किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी। पिता जी सुनने वाले नहीं और उसकी जबान उनको देखकर बन्द हो जाती है, शब्द नहीं निकलता।

माता जी पिता के फैसले को चुनौती देने में असमर्थ थीं। और घर मे छोटी बहन रानी भी थी परन्तु वह भी पिता से कुछ नहीं बोल पाती है। और रश्मि को उसके भविष्य की भी चिंता है कि उसका ये कदम उसकी बहन के लिये मुसीबत न बन जाये।


रानी रश्मि के कमरे में आती है और देखती है कि रश्मि रो रही है, वह पूछती है, क्या हुआ जीजी। घर छोड़ने की याद में अभी से रोने लगी। परन्तु उसे आभास हुआ कि यहाँ बात और कोई है। रश्मि उसे सारी बातें बता देती है, रश्मि कहती है कि तुम एक बार अनिमेष से मेरी बात करा दो।


अनिमेष को जब इस बात की भनक पड़ती है तो वह बौखला जाता है , उसे कुछ समझ नही आता कि क्या करूँ। रश्मि की शादी रोक तो नहीं सकता था।न ही रश्मि को शादी न करने के लिये बोल सकता था। परन्तु उसके मन में एक सुई चुभ रही थी वो है उसका प्रेम, उसका प्यार, जिसके साथ जीवन जीने का उद्देश्य था, वह कहता कि रश्मि ने मेरे साथ धोखा किया है, अगर प्यार किया होता तो जरूर अपने पिता से भिड़ती। शादी के लिये राजी होती ही नहीं।

कहा उसके साथ खुआबो में ताजमहल बनाने के सपने देखे मानो आज वह ताज उसकी आँखों में गलकर बह रहा हो। पागलो की भांति हरकते करता। और फिर दो पंक्तियों को बोलता है, क्योंकि प्यार में टूटे आशिक के दिल मे केवल गजलों का साथ होता है।

"तेरी इस जवानी को मैं पिया करता हूँ।

तेरी आँखों की कहानी को मैं पढ़ा करता हूँ।।"


"नज़्म लिखूं या शायरी न मैं समझ पाता हूँ,

तेरे जाने से सिर्फ ग़ज़लों को ही मैं पढ़ पता हूँ।"


रश्मि समर से कहकर अनिमेष को मिलने के लिये बुलाती है, परन्तु अनिमेष न आते हुए भी आ जाता है, जब अनिमेष को आता रश्मि देखती है तो रो कर उसके गले से लिपट जाती है और कहती है कि मुझे अपने से दूर मत करो। परन्तु अनिमेष जो पहले था वह अब रश्मि के लिये बेगाना हो गया था, रश्मि को अपने से दूर करते हुए, बोला देखो रश्मि मुझे भूल जाओ और जहाँ तुम्हारे पिता ने शादी करने का बोला है वही करो।और अनिमेष की आँखों में आँसू आ जाते हैं।

ज़ख्म पर थोड़ा ही हाथ लगने से उसमे दर्द फिर से उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार रश्मि अनिमेष की इन बातों से और खिन्नता से रोती है।

मानो ये दोनों को समझ आ गया था कि ये उनकी अंतिम मुलाकात है, रश्मि अनिमेष को आखिरी बार देखना चाहती थी परन्तु अनिमेष ने बिना कुछ बोले मुड़कर फिर न देखा। जैसे ही वह आगे चला जाता रश्मि को अहसास होने लगता कि उसका प्यार अब उसकी आँखों से बहुत दूर कहीं खोता जा रहा है, शायद वह अब अपने आप को कभी माफ़ न कर पाये। 


कुछ दिनों के बाद अनिमेष को पुनः सुरभि की याद आती है सोचता है कि उसके जीवन में प्यार को पाने का संयोग नहीं है, नहीं तो सुरभि का प्यार भी उसे अधूरा छोड़ना पड़ा, और अब जिसको वो (रश्मि) जी जान से प्यार करता है उसको तो आँखो के सामने ही खोना पड़ा।



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