shivendra mishra 'आकाश'

Inspirational


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shivendra mishra 'आकाश'

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बेबस नारी का सफर

बेबस नारी का सफर

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जीवन भी इंसान को कितना क्रलिष्ठ बना देता है, ये कहानी की शुरुआत होती है भोपाल की सशक्तनारी और वर्तमान में कुछ नामदारो की लिस्ट में भी उसका नाम गिना जाता हैं।उनका नाम श्रीमति शारदा मिश्रा! वैसे लोग उसे किसी भी नाम से संबोधित कर सकते थे, परज्यादातर मोहल्ले के तथा जान पहचान वाले कुछ बुआ जी बोलकर संबोधित किया करते थे,तो कुछ हट्टे खट्टे लोग दीदीजी भी बोलकर संबोधित करते थे। वह स्वभाव से कठोर,आँखों में तेजता,पहनावा एकदम मर्दानी स्टाइल,कुर्था और जीन्स,आवाज में वजनदारी। पर मन की अच्छी थी।


आज शारदा इस मुकाम पर पहुँच गई थी कि किसी भी एक परिवार का वह पालन पोषण अपने दम पर कर सकती है, इसलिये वह हर वर्ष दीवाली पर अनाथालय में बच्चों के लिए खिलौने तथा मिष्ठान आदी लेकर जाती हैं। वह आज घर में अकेली थी, तो उसने घर की थोड़ी सी साफ सफाई करने का मन बना लिया। उसे सफाई करते हुए एक पुराना अख़बार की कटिंग मिली जिस पर उसका स्वयं भास्कर वालों ने साक्षातकार लिया था। वह अपने पुराने भूतकाल के जीवन के खयालो में खो जाती हैं.....औऱ उस इंटरव्यू को याद करने लगती हैं जो उसने जब दिया था।

जीवन की परिस्थितियों ने उसे किस प्रकार की महिला बना दिया था।शारदा कहती है जिस लड़की को छोटे से ही न तो मां ने प्यार दिया,न बहनों ने अपना माना, हमेशा अपमानित किया,तीनो भाईयो बहनो में सबसे अलग रखा।


अगर गलतियां ओर कोई करे पर सजा शारदा को मिलती थी। पिता की प्यारी थी सिर्फ पिता ने उसे अपना समझा।शारदा हमेशा घर का कार्य अकेले करती थी,न कभी माताजी(शारदा अपनी माँ को माताजी सम्बोधित करती थी) ने उसका हाथ बटाया,न ही किसी भाई बहन ने उसका साथ दिया। पिता जी ही थोड़ा बहुत चोरी छुपे उसका हाथ बटा दिया करते थे, ज्यादा समय नही रहता था पिता के पास क्योंकि वो थाने में हवालदार थे।परन्तु खुदा को भी शायद यह मंजूर नही था कि उसके पापा भी उसे प्यार करें। एक दिन पापा की सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी। माता जी ने सभी भाई बहनों की शादी अच्छे घराने एवं परिवार में करा दी। परन्तु शारदा की शादी ही एक ऐसे व्यक्ति से कराई जो पहले ही एक शादी कर उसे छोड़ चुका था। फिर भी शारदा ने अपने साहस और रिश्तों की बागडोर को समालते हुए उसे अपना पति मान लिया था।

जब शारदा शादी के बाद पहली बार उसके मायके गई तो उसकी अपनी अम्मा ने उसे ताने देते हुए कहा - ""शर्म नही आती तुझे ,कैसा पति मिला है ? न तो कुछ कमाता है,और साथ ही द्विजवर हैं।""

शारदा उस दिन अंदर से पूरी तरह टूट गई थी, वह सोच रही थी कि बाकई कोई सगी माँ इतनी कठोर होती है? 


उसने भी अपने आप को सम्हाला और कठोर स्वर में बोली,,

"ऐ माताजी ! अब ये मेरे पति है चाहे जैसे भी हो मेरे हैं।"आपको उनकी बेज्जती करने का कोई अधिकार नही हैं।और आज के बाद मेरा कोई मायका नही और न ही कोई अम्मा।"वह अपने पति को लेकर बापस अपने घर भोपाल ही आ गई थी। परन्तु पति तो बदमाश, कामचोर और लोडियाबाज था।साथ ही साथ पिययकड़ भी था, तो शारदा को मारना पीटना और न जाने कितने लांछन लगाता था। पर वह फिर भी चुप रही ।लेकिन जब पानी सर के ऊपर हो गया तो उसने अपने आप को बचाने के लिये तथा पति से छुप कर अपने रुपयों से जो उसे अपने पापा की मृत्यु के बाद बीमा मिला था।उन रुपयों से उसने एक प्लॉट खरीदा,,,।


पति की बुरी हरकतों तथा रोज की मार पीट से तंग आकर उसने एक दिन अपने पति से तलाक ले लिया।परन्तु रहने और खाने की कोई जगह न होने के कारण उसने एक सरकारी अस्पताल में बुखार के बहाने जैसे तैसे पंद्रह दिन के लिये भर्ती हो गई। वहऔर उसकी छोटी सी बच्ची को लेकर रोज रात को अस्पताल में सोने को चली जाती थी और सुबह अस्पताल में मरीजों के लिये ब्रेड और चाय आती थी तो उसे पी कर वह काम ढूढ़ने को चली जाती , पर थोड़ा बहुत काम मिल जाता। लेकिन एक दिन वह इतनी परेशान और जिंदगी से बहुत ही हैरान हो गई थी,उसे जिंदगी जीने का कोई मकसत नही दिखाई दे रहा था। न कोई उसके पास रास्ता था। उसके पास मात्र एक ही रास्ता था,वो भी :-" मौत"! उसने खुदखुशी करने का सोचा।

उसने भोपाल की ही बड़ी झील में छलांग लगा कर जिंदगी से मुक्त होना चाहा।

लेकिन यह क्या हुआ,,,इश्वर भी उसे इस जीवन से मुक्त नही होने देना चाहता था।वह भी सोच रहा था कि इतने जल्दी हार नही मानने दूँगा।उसने न जाने कहा से किसी मानव को रक्षक के रूप में पहुँचा दिया,उसने भी छलांग लगा कर उस देवी को सही सलामत बचा लिया।


शारदा की जब आँख खुली तो अपने आप को अस्पताल में पाया ,,,और लोगो ने उसे समझाया, फिर उसने ईशवर को धन्यवाद दिया तथा संकल्प किया कि वह इस जीवन की लड़ाई को अपने आत्मविश्वास् से ही लडूंगी।फिर ईश्वर का आशीर्वाद ऐसा हुआ कि उसे पशुपालन विभाग में नोकरी लग गई।कुछ ही महीनों में उसने अपने मन का छोटा सा आशयना बनाया। साथ ही साथ उसने अपनी मेहनत से दिन में नोकरी और शाम को थोड़ा समय निकाल कर खुद मजदूर के साथ मिलकर अपने घर का निर्माण किया। जींदगी इतनी आसान नही होती वह भली प्रकार जानती थी।धीरे धीरे आर्थिक स्थिति बदली तो एक और मकान बना कर खड़ा कर दिया। अब वह अपने सपनो को साकार करते हुए,बिना उन दिनों को भूले हुए अपने जीवन को व्यतीत कर रही हैं। 

एकदम से वह कपकपाती हुई खयालो से बाहर निकली ,,,

परन्तु उसके मन में अभी भी एक प्रश्न बार बार हिलोरें ले रहा था कि उसे बचाने वाला फरिश्ता कौन था ??उसने उस बचने वाले व्यक्ति के लिये अखबार और साक्षत्कार के माध्यम से धन्यवाद दिया।लोगो ने उसके इस अद्म्य साहस का साक्षत्कार किये। 


लेकिन वह अब अपनी नोकरी से रिटायर हो गई और अब आराम से भैसों का पालन कर अपने जीवन को खुशी खुशी निर्बाह कर रही हैं। साथ ही साथ अन्य गरीब एवं जरूरतमंदो की भी अपनी क्षमता के अनुसार सेवा कर रही हैं।

       


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