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Aditya Neerav

Romance Tragedy


4.8  

Aditya Neerav

Romance Tragedy


अधूरा-मिलन

अधूरा-मिलन

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बहुत दिनों से बीमार होने के कारण साक्षी अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी अपने भविष्य के बारे में सोच रही थी । न जाने आगे क्या होगा ? अब तक तो सब सामान्य रहा ! लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है उसे काटना मुश्किल हो रहा है क्योंकि उसे आज भी अच्छी तरह से याद है कि जब उसके प्रेम को लेकर उसके चरित्र पर शक्ति के परिवार वालों ने उंगली उठाई थी। तूफान-सा मच गया था उसके दिलो-दिमाग में । अपने सच्चे प्रेम के खातिर उसने इस अपमान को भी चुपचाप सह लिया । यहां तक कि उसके पिता को भी जान से मारने की धमकी मिली । साक्षी का मानना था कि प्रेम त्याग व समर्पण का दूसरा नाम है । उसके लिए प्यार वासना नहीं उपासना है इसलिए इन सब बातों पर ध्यान न देकर उसने सिर्फ अपने सच्चे प्यार को ही महत्व दी । साधारण परिवार से संबंध रखने वाली साक्षी जहां पूर्वजों की संपत्ति और बैंक बैलेंस न के बराबर होते हैं । उसके पिताजी प्राइवेट नौकरी करते थे लेकिन उस कमाई से भी घर का खर्चा नहीं चल पाता था। तब उसने सोचा कि अपने पिताजी की सहयोग की जाए दसवीं में पढ़ाई के दौरान ही ट्यूशन पढ़ाने लगी जिससे आर्थिक स्थिति थोड़ी संभली । कुछ सालों बाद दसवीं पास करने के उपरांत जिस विद्यालय में वह पढ़ती थी उसी विद्यालय में शिक्षिका के रूप में नियुक्त हो गई । इस तरह से घर खर्च सुचारू रूप से चलने लगा । समस्या अभी खत्म नहीं हुई हां उसका स्वरूप बदल गया ।


समय का चक्र तो चलता ही रहता है वह किसी के रोकने से भला रुका हैं क्या... इस तरह से साक्षी भी शादी करने के लायक हो गई । उसके पिताजी को भी उसकी शादी की चिंता सताने लगी जैसा कि हर बाप को होती है । उसके पिताजी ने उसकी शादी एक सरकारी नौकरी करने वाले लड़के से तय कर दी । समय पर सगाई भी हो गई लेकिन असलियत का पता तब चला जब वे लोग दहेज की मांग करने लगे । सभी लोगों को लगा कि यह तो गलत है अगर ऐसी बात थी तो पहले ही बता देना चाहिए था। सगाई के बाद ऐसी बात कर रहे हैं यह तो लालच वाली बात हो गई । अभी ये हाल है तो शादी के बाद न जाने क्या करेंगे यह सोचकर यह रिश्ता तोड़ दिया गया । एक लड़की की सगाई टूट जाने का दुख सभी लोग जानते हैं । उसके पिताजी को भी बहुत दुख हुआ और बदनामी हुई सो अलग लेकिन साक्षी को खुशी इस बात की थी वह बर्बाद होने से बच गई। जिसकी नियत में खोट था वो क्या कभी खुश रख पाता । उसे तो उसको और उसके परिवार को जो संभाले ऐसा जीवन साथी चाहिए था और हुआ भी वही भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं भगवान ने उसकी सुन ली । अचानक उसके जीवन में एक फ़रिश्ते का आगमन हुआ जिसका शक्ति नाम था।


शक्ति उसके ममेरे भाई रौशन का सहपाठी निकला वे दोनों बचपन के साथी थे और घर पर भी एक दूसरे के आया जाया करते थे लेकिन साक्षी से कभी मुलाकात और बात नहीं हुई यह भी एक संयोग ही कहा जाएगा । कब और कहां किसको मिलना है यह ईश्वर ही जानता है । सब कुछ एक तय समय के साथ ही पूरा होता है । इस तरह कुछ वर्षों बाद लगभग सन 2016 के जनवरी महीने में सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें जुड़ने का मौका मिला । शक्ति ने पहला संदेश भेजा और पूछा कि तुम साक्षी श्रीवास्तव हो ना...? संत पॉल में जो पढ़ती थी । तब साक्षी ने जवाब दिया मैं वो नहीं हूं जो तुम समझ रहे हो । वो पूछी कौन साक्षी तुम कैसे जानते हो उसे तब उसने बताया कि वे दोनों एक ही वर्ग में पढ़ते थे इसलिए लगा कि तुम वही हो । और मेरे बचपन का दोस्त भी तुम्हारे फ्रेंड लिस्ट में दिख रहा है । उसके बाद फिर दोनों में कोई बात नहीं हुई । फरवरी में पुनः संदेश आया कि तुम रौशन को कैसे जानती हो तो साक्षी ने सत्य नही बतलाया कि वह उसका ममेरा भाई है वह बोली कि वह केवल दोस्त है सोशल मीडिया पर। फिर उसने अपने ममेरे भाई रोशन से शक्ति के बारे में जानना चाहा क्योंकि यह दूसरी बार उसकी तरफ से संदेश आया था । सााक्षी ने मन में सोचा कि कहीं वो ऐसे ही टाइम पास तो नहीं करता है सबको संदेश भेजकर । लेकिन जब ममेरे भाई ने ठीक इसके विपरीत उसके गुणों के बारे में बताया तो सुनकर उसे अच्छा लगा । उसने सोचा सोशल मीडिया पर दोस्त तो बना ही सकती है उसमें कोई समस्या नहीं है । इस प्रकार दोनों की दोस्ती हो गई । धीरे-धीरे बातों का सिलसिला आगे बढ़ने लगा और बातों ही बातों में मालूम हुआ कि वह भी उसी कोचिंग संस्थान में पड़ता है जिसमें वह पढ़ती थी । अब मिलने की इच्छा हुई तो दोनो ने एक-दूसरे के कोचिंग जाने के समय के बारे में पूछा,शक्ति ने समय के बारे में बता दिया । वो तो आराम से पहचान गयी लेकिन वह पहचान नहीं पाया क्योंकि उसने कभी उसे पहले देखा नहीं था और सोशल मीडिया पर तस्वीर भी नहीं थी । साक्षी ने उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर पहले ही देख ली थी ।


पहली बार जब उसने शक्ति को देखा तो वह अपने दोस्तों के साथ बाते कर रहा था उस दिन वह सफेद टी-शर्ट और ब्लू रंग के जींस पहने हुए था । शक्ति काफी देर तक उसका इंतजार करता रहा कि आज मुलाकात होगी लेकिन अभी तो दोस्ती की शुरुआत थी । विद्यालय से घर आकर उसने संदेश भेजा कि तुम कहीं दिखी नहीं मैं तुम्हारा कब से इंतजार कर रहा था तब उसने जवाब दिया कि इतनी जल्दी नहीं लेकिन मुलाकात अवश्य होगी । इस तरह दोनों रात में घंटों बातें किया करते थे और पता भी नहीं चलता कि कब सुबह हो जाती । साक्षी को तो सुबह-सुबह घर के सारे काम करने पड़ते व विद्यालय के लिए जाना पड़ता था । उसके लिए उसे थोड़ी परेशानी जरूर होती थी लेकिन इसके ठीक विपरीत शक्ति को केवल पढ़ाई करना या फिर अपने दोस्तों के साथ घूमना यही उसकी दिनचर्या थी । संदेश के माध्यम से काफी कुछ जानने वह समझने को मिला तब तय हुआ कि क्यों ना आमने -सामने से मुलाकात की जाए । पहली मुलाकात का वक्त व दिन आज भी उसे अच्छे से याद है हां 23 अप्रैल 2016 यही तारीख थी उस दिन की और इस तारीख की एक खास वजह और भी थी की उस दिन उसका जन्म हुआ था। अब तो यह दिन और भी विशेष हो गया क्योंकि वे दोनों एक दूजे से आज के ही दिन रूबरू हुए। पहली नज़र में जब शक्ति ने साक्षी को देखा तो मन के भाव जो उमड़े वो कुछ इस तरह से थे की -

इश्क में न जाने क्या गुनाह कर बैठा

जिंदगी को जैसे तबाह कर बैठा 

अंजाम जो भी हो सब मंजूर है मुझे

तुझसे मैं बेपनाह प्यार कर बैठा

तीनो एक रेस्टोरेंट में मिले जी हां एक उसकी दोस्त जिसका नाम था जिज्ञासा तीनों ने खाया-पिया और ढेर सारी बातें की । शक्ति को पता था कि आज साक्षी का जन्मदिन है इसलिए उसने साक्षी को जन्मदिन की बधाई भी दी और फिर वे सभी वापस घर लौट आए इस दौरान साक्षी के छोटे भाई ने इन तीनों को मिलते हुए देख लिया था । जिस वजह से घर वाले नाराज हो गए और साक्षी को बहुत डांट भी पड़ी और उसका कोचिंग जाना भी बंद हो गया । उससे उसका मोबाइल फोन भी छीन लिया गया और सख्त हिदायत दी गई कि केवल विद्यालय पढ़ाने जाना है और सीधे घर आना है । अब तो बातों का सिलसिला भी थम सा गया । उन दिनों साक्षीअपने दोस्त के घर भी नहीं जा सकती थी और ना ही मार्केट इस वजह से बात करने का कोई भी मौका नहीं मिल पा रहा था । 


उन दिनों साक्षी को ऐसा लगता था जैसे वे एक-दूजे से बात किए बेगैर पल भर भी नहीं रह सकते एक कशिश थी या जो भी कह लिजीए उन दोनों के दरम्यान जो उसे ऐसा करने को विवश कर रही थी । उसकी उदासी को देख कर उसकी दोस्त उदास रहने लगी फिर उसने उसे अपना सेलफोन दिया बात करने के लिए। साक्षी को जब भी फुर्सत मिलती स्कूल पढ़ाने के दौरान लंच, ब्रेक या छुटटी के समय वह शक्ति से बात कर लेती थी। कुछ दिनों तक तो ऐसा ही चला जब घर में महौल कुछ शांत हुआ तो घर से भी कॉल करके बात कर लेती थी । इस तरह एहसास हुआ की उन दोनो को एक-दूसरे से प्यार हो गया है । अचानक साक्षी के घर फिर से की शादी की बात होने लगी सब लोग लड़का ढूढंने में लग गए । लेकिन कहते है ना कि अगर प्यार सच्चा हो तो पूरी कायनात आपको मिलाने कि कोशिश करने लगती है । ईश्वर की कृपा से हुआ भी कुछ ऐसा ही एक दिन साक्षी के घर मे कुछ पैसो की जरूरत पड़ी क्योंकि उसके भाई को नामांकन करवाना था बी.सी.ए में। तब साक्षी ने स्कूल से एडवांस ली 25000 रुपये और घर पर कहा की ये पैसे उसे शक्ति ने दिए है, उस समय उसके भाई का एडमिशन लेना जरुरी था इसलिये किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि पैसा किसने दिया। यही सही मौका था जब शक्ति एक सच्चा मददगार साबित हुआ उसके घर के लिए । इस तरह से शक्ति का प्रवेश साक्षी के घर मे हो पाया बेशक काम साक्षी का था इन सब कार्य के पीछे पर नाम शक्ति का हुआ फिर उसने सोचा वो तो कार्यों में व्यस्त रहती है क्यों न शक्ति को कुछ कार्य करने को दिया जाए जिससे की ये इधर- उधर घूमना बंद कर दे साथ ही साथ कुछ आमदनी भी हो जाया करेगी । उसने अपने एक से भैया बात करके शक्ति को एक स्कूल में रखवा दिया लेकिन वो उस समय पढ़ाने से डरता बहुत था कि कैसे पढ़ा पायेगा उसने कभी पढाया नहीं । लेकिन साक्षी को विश्वास था कि वो पढ़ा लेगा और धीरे-धीरे वह बहुत बेहतरीन तरीके से पढ़ाने लगा । वहाँ पर वह गणित का अच्छा शिक्षक बन गया फिर साक्षी के एक दोस्त ने बताया की एक जगह समाज-शास्त्र के शिक्षक की जरूरत है तो दूसरे विद्यालय में भी उसे इंटरव्यू के लिए भेजे, वह इतना डर गया था की पढ़ाना था एसएसटी तो गणित पढ़ा कर चला आया । घर आकर बोला की मुझसे नहीं होगा साक्षी मैं नहीं पढ़ा पाऊँगा लेकिन काफी बोलने पर की ये विषय आईएएस की तैयारी मे भी कारगर साबित होगा। तब शक्ति पढ़ाने को राजी हुआ और धीरे-धीरे दोनों विषयों में माहिर हो गया ।


एक दिन साक्षी ने शक्ति को अपने पिताजी से मिलवाया उसके पापा को उससे मिलने में कोई आपत्ति नहीं हुई लेकिन माँ को वो पसंद नहीं आया उस वक्त। पापा के साथ की वजह से सब मुमकिन हुआ क्योंकि वह एक दोस्त की तरह हरदम साथ देते थे। उनको विश्वास था कि उनका यह बेटा कोई गलती नहीं कर सकता जिससे उन्हें कभी शर्मिंदा होना पड़ेगा। आप लोगों को अजीब लग रहा होगा लेकिन यह सत्य है कि उन्होंने हमेशा उसे बेटा का दर्जा दिया और कभी इस बात का एहसास भी नहीं होने दिया कि वह एक बेटी है। इस बात का उसे भी गर्व है कि वह बेटी होते हुए भी अपने पापा के नजरों में बेटे से कम नहीं जैसे-जैसे समय बीतता गया शक्ति की अच्छाइयां उसके घरवालों के सामने आती चली गई । इस तरह सब के दिलों में उसकी एक खास जगह बन गई । इस तरह साक्षी के दिल से जो आवाज़ निकली - 

पसंद नापसंद की अब कोई बात ही न रही

    जब से मैं और तुम हम हो गए


उसके परिवार वाले तो राजी हो गए लेकिन शक्ति के परिवार वालों की तरफ से अभी तक हरी झंडी नहीं मिली क्योंकि सिर्फ जाति एक होने से भी ऐसा संभव नहीं होता लोगों की मानसिकता व समाज के नियम अभी भी पूरी तरह से नहीं बदले। आज भी प्रेम-विवाह को हेय दृष्टि से देखते हैं आखिर क्यों ? क्या प्यार करना गुनाह है या जिससे प्यार करें उससे शादी करना । माना कि काल्पनिक जीवन से वास्तविक जीवन अलग होता है लेकिन अगर इरादा नेक हो तो ऐसा कर ही सकते है । समाज समझे या न समझे परिवार वालों को यह बात समझनी चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि हमारे बड़े-बुजुर्ग गलत कहाँ करते थे। माता-पिता अपने बच्चों का सदा भला ही चाहते हैं क्योंकि टाईम पास करना व इस चक्कर में पड़ कर अपने कैरियर को तबाह कर लेना कहाँ का न्याय है। अपने परिवार वालों के साथ व खुद के साथ भी । सच्चा प्यार ज़िंदगी सँवार देता है। इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि इसे खोने न दें । अपने ही ख्यालों में डूबी साक्षी को समय का कतई ध्यान न रहा जब उसकी छोटी बहन ने पीछे से आवाज़ दी तब जाकर कही वो भूत व भविष्य में हो रहे द्वंद से पुनः वर्तमान में लौटी और मन ही मन बोली ना जाने ये अधूरा-मिलन कब पूरा होगा.....

                


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