Yashwant Rathore

Tragedy


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Yashwant Rathore

Tragedy


अडिमाली

अडिमाली

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सन 1977 "अडिमाली " पहाड़ियों के बीच बसा हराभरा एक छोटा सा गांव।आप अडिमाली गांव को नही जानते, आप इसे 1977 में आदिवासियों का गांव कह सकते थे। आप शायद मुन्नार को जानते हैं, केरला का प्रशिद्ध हिल स्टेशन। आप भी गर्मियों की छुट्टियों मनाने कभी गये होंगे वहां। मुन्नार जैसा ही सुंदर ये गांव मुन्नार से 27 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।


तब यहां हम " मुथुवन" कबीले के लोग ही रहा करते थे, आज जितनी भीड़ न थी।हां ,साल भर बारिश होती ही रहती है और मानसून आने पर जून से सितंबर तक भारी बारिश। यहां सड़क सुविधाएं भी न थीं, ना ही आज की तरह पास से गुजरते हाईवे थे।


पहाड़ों को चूमते बादल, उनसे अटठखेलियाँ करते, दिनभर छाये रहते हैं। केले ओर कोकोनट के पक्तिबद्ध एकसार पेड़ इस गांव को एक तस्वीर सा सुंदर रूप देते हैं। आम के पेड़ भी अपनी खुशबू और हरियाली बिखेरते हैं।तब यहां हम ज्यादातर चावल की खेती किया करते थे। मसालों में काली मिर्च भी यहां काफी होती हैं।बारिश से सालभर यहां झरने और पहाड़ी नदिया बहती हैं, यहां से 15 किलोमीटर दूर पोनमुडी बांध भी हैं जो पनीयर नदी पे बना हुआ हैं। यहां के झरने बहुत मशहूर हैं, सैलानी इन्हें दूर दूर से देखने आते हैं।


पहाड़ियों और वादीयों का ये गांव स्वर्ग से कम नही हैं। यहां सालभर मौसम सुहाना और हल्का ठंडा रहता हैं बस सर्दियों में ठंड बढ़ जाती हैं। बारिश और सर्दी किसी मे भी प्रेम जगा देने को उतारू हैं।आप भी इसकी खूबसूरती महसूस कर रहे होंगे और अपना जीवन यहां गुजारना चाह रहे होंगे।"बालन" इसी गांव में रहता था ,स्वर्ग में रहते हुवे भी जिंदगी आसान न थी।बालन के परिवार की कहानी कुछ खास नही हैं, बहुत आम हैं।खास कहानियां अक्सर आप मे उम्मीद जगाती हैं, सपने दिखाती हैं।बालन की कहानी बस सच्ची हैं और इसमें कुछ भी नहीं


छह भाई बहनों में बालन सब से छोटा था। खेती ही सयुंक्त परिवार का रोजगार था।खेती पेट भरने के लिए भी पर्याप्त न थी। जब बालन छोटा था तब गांव में सरकारी स्कूल भी न थी, अब तो एक प्राथमिक स्कूल भी है। दो बड़े भाई कुवांरे रह गए। मां बाप को बच्चे पालने की ज्यादा फिक्र थी,वैसे भी गांव के काफी बच्चे और बुजुर्ग कुवांरे ही थे.कुछ का भाग्य से रिश्ता हो जाता था और कुछ खुद ही ढूंढ लाते थे।बालन 18 का हो गया था और तोड़ी (शराब) भी पीने लगा था।वो अपने गांव वालों की तरह नही रहना चाहता था,कुछ करना चाहता था ये सोच वो शहर को निकल गया।


कुछ दिन इधर उधर भटकने के बाद एक कारपेंटर के यहां नौकरी मिल गयी।जल्द ही बालन लकड़ी का काम सीख गया। कुछ लोग दोस्त भी बन गए।"आधिरा " अच्छा दोस्त बन गया, वो पुराना आदमी था कारखाने में सो उससे सीखने को भी काफी मिला।बालन छह सात महीनों में एक बार गांव भी जा आता था, पेट काट काट कर जो भी पैसे बचाता घर दे आता। पैसे पाकर एक बार मां बाप , भाई सब खुश तो होते लेकिन अगले दिन से उसे लगता जैसे उससे कोई जुड़ा हुआ ही नही हैं।


कुछ गांव के दोस्त और मेरे साथ समय बिताता ,पर धीरे धीरे उसपे अकेलापन हावी होने लगा। जिनके लिए कमा रहा था वो, उनका जुड़ाव ही उसके साथ न था। पहले तो सब बहुत अपने लगते थे, वो बहुत कुछ करना चाहता था उनके लिए पर शहर जाके उसकी नज़र साफ हो गयी थी और उसे सब कुछ दिखने लगा था।मैंने ही एक बार सुझाव दिया कि अब इक्कीस के हो गए हो शादी करलो।बालन जवान हो चुका था, उसमे संभोग के सुख की तीव्र कामना हिलोरे ले रही थी।पर मां बाप को फिक्र नही , उसका खुद का कोई घर नही, ना वो पैसे वाला, ना कोई बड़े राजनीतिक रुतबे वाला उसका समाज। उसे कोन अपनी बेटी देगा, ये सब सोच के वो परेशान भी रहने लगा।आधिरा शादीशुदा था , उससे बालन अक्सर बात किया करता था। आधिरा ने कहा वो बालन के लिए अच्छी लड़की जरूर ढ़ूंढ़ेगा.


एक बार आधिरा बालन के पास देर रात को आया। बालन को बताया कि एक लड़की है"आभा" उससे कोई प्यार करता था,वो उसे धोखा देकर भाग गया।आभा को आज ही लड़का हुआ हैं, वो जान देने वाली हैं। वो बालन को शादी के लिए बोलता है। बालन को पहले तो सही नहीं लगता पर उसकी परिस्तथि और जवानी की गर्मी उसे मजबूर कर देती हैं, वो हां कर देता है।


दोनों की शादी हो जाती हैं, बच्चे का नाम वो "एकचक्र" रखते हैं।कुछ ही समय मे बालन जवानी का सुख लेने लग जाता हैं। आभा का कोमल शरीर हर रात बालन में आग भर देता था। दोनों का जीवन सुख शांति से चल रहा था।


बालन लकड़ी का अच्छा कारीगर बन गया था,उसकी तनख्वाह भी बढ़ गयी थी। ऐसा लग रहा था जैसे खुशियों का कोई बन्द दरवाजा खुल गया हो और सुख की लहरें उससे टकरा रही हो। बालन एकचक्र को भी बहुत प्यार करने लगा।बालन अक्सर सुबह का निकला शाम को ही घर आता था । वो अब बहुत कमाना चाहता था ताकि परिवार को खुशियां दे सके।


एक दिन बालन किसी काम से दोपहर में घर आया तो देखा आभा ,आधिरा को चूम रही थी। दोनों निवस्त्र एक दूसरे से सापों की तरह लिपटे पड़े थे।आभा कह रही थी कि आधिरा हमारे बच्चे को ,बालन का बच्चा बनाना पड़ा।आधिरा कह रहा था कि तुम्हारी बदनामी तो ना हुई, में तो वैसे भी शादी नही कर सकता था.


बालन के सिर में जैसे किसी ने हथौड़े से वार किया,ऐसा महसूस हुआ। वो बिना प्राण के जैसे खड़ा था।तभी आधिरा और आभा की नज़र बालन पर पड़ी। आधिरा बालन के पास आता है पर उसकी हालत देख, बिना बोले चुप चाप निकल जाता है।बालन उलटे पैर कारखाने चला जाता है।घर मे अब रोज झगड़े होने लगे। आभा दूसरी बार माँ भी बनने वाली थी।रोज के झगड़े उसे पागल करने लगे, आभा अक्सर पागल सी हरकते करने लगती थी।


समय गुजरा और आभा ने दूसरे बच्चे को जन्म दिया। बच्चे का नाम " मतंग " रखा गया।आभा बेटे मतंग को ले, मायके चली गयी। वैसे उसके मां बाप की दशा भी दयनीय थी पर बेटी की हालत को देख वो मना न कर सके।बालन काम के साथ साथ बड़े बेटे एकचक्र की देखभाल भी करता रहता। बालन अब बहुत बदला सा इंसान हो गया। वो सबसे कम बात करने लगा और बहुत गुस्सेल भी हो गया।दोनों बच्चे अलग अलग पलने लगे।


कुछ साल बाद बालन ,अपने मोहल्ले में रहने वाली बाहर गांव की औरत  "चारु" से शादी कर लेता हैं। चारु काफी मिलनसार और हँसमुख औरत थी। उसी मोहल्ले की थी तो लोग उसे जानते थे, आस पड़ोस के काफी लोग घर पर और खाने पे आते थे।बालन को ये सब पसंद न था, उसका पुराना अनुभव उसपे हावी हो जाता। वो हर आने जाने वाले मर्द को शक की नज़र से देखता।

काफी साल जिंदगी के गुजर गये, बालन का अब खुद का काम था। बेटा एकचक्र भी कॉलेज जाने लगा था।


अब सालो बाद चारु मां बनी, पर बालन बच्चे को अपना न मान सका। पड़ोस में रहने वाले एक युवक पे उसको शक था जिससे चारु अक्सर हँस बोल लेती थी। बालन पे पागलपन सवार हुआ ,वो चारु को बच्चे समेत घर से निकाल देता है। चारु लाख मनाती ,गिड़गिड़ाती है पर बालन का गुस्सा उसे सब करने पर मजबूर कर देता हैं। जब वो चारु के चरित्र पर उंगली उठाता हैं तो फिर चारु चली जाती हैं और लौट के वापस नही आती।


बालन को चारु के जाने का दुःख तो होता हैं पर एक अजीब सी खुशी भी होती हैं जैसे कि उसने किसी से बदला ले लिया हो।कुछ साल बाद आभा अपने बच्चे मतंग के साथ बालन के पास चली आती हैं। पता नही क्यूं बालन उसको ना नही कह पाता। शायद उसकी उम्र ढलने लगी थी और मतंग उसे अपना बच्चा लगता था।आभा का पागलपन उम्र के साथ बढ़ गया था,उसे अब बार बार दौरे पड़ते थे।बालन का दिल कमजोर पड़ गया ,जब उसे पता लगा, मां का पागलपन मतंग में भी हैं। उसे भी कभी कभार दौरे पड़ते हैं।


बालन एक परिवार,घर बसाना चाहता था पर वक़्त ने उसे कुछ और ही रंग दिखायें। बालन का शरीर उसका साथ छोड़ देता हैं।अब एकचक्र ही घर मे बड़ा था, उसे ही अपने छोटे भाई मतंग और मां को संभालना था।लकड़ी का काम एकचक्र को न आता था,वो काम बंद हो गया। जैसे तैसे उसने पढ़ाई पूरी की और घर संभालने के लिए छोटा मोटा काम करने लगा।आभा की मां भी अब आभा के साथ ही रहने लगी। एकचक्र को बड़ा परिवार अच्छा लगता था पर उसकी नानी और मां को उससे लगाव न था, छोटा भाई मतंग भी उसे पसंद नही करता था।पर एकचक्र इस परिवार को चलाना चाहता था। नानी की मुँहफट जबान और गालियां वो सहन कर जाता था।


क्योंकि माँ और नानी दोनों ही बूढ़ी और अनपढ़ थी और मतंग को दौरा आने के बाद संभालना मुश्किल था सो एकचक्र ने शादी का निर्णय किया।किस्मत ने साथ दिया और पढ़ी लिखी समझदार "छाया" उसे पत्नी रूप में मिली। सब घरवाले इस शादी के खिलाफ थे पर एकचक्र ने ये फैसला घर के लिए ही किया था।छाया उसके ही समाज की थी पर वो मध्यप्रदेश में पली बढ़ी। छाया ने भी अपने जीवन मे काफी परेशानियां और गरीबी झेली थी। सो मुश्किल से ही सही धीरे धीरे वो घर को संभालने लगी।शादी के बाद घरवाले उससे और भी नाराज़ रहने लग गए थे ,वो छाया को भी परेशान करने लगे।काफी कोशिशों के बाद भी छाया मतंग के पागलपन को न सम्भाल सकी और घरवालो का रवैया भी साथ देने वाला न था।एकचक्र ने आखिरकार नौकरी छोड़ने का फैसला लिया और घर व इलाज ख़र्च के लिए छाया को नौकरी की इजाज़त दी।


छाया ने जल्द ही काम मे पकड़ बना ली। उसकी लगन और इमानदारी ने उसे जल्द ही अच्छी तनख्वाह का हकदार बना दिया। अब घर में पैसो की तंगी न थी।एकचक्र मतंग , मां और नानी का खयाल रखने लगा। पर वो तीनो ही उसे न चाहते थे, उसके लिए बुरा बोलते थे ,बुरा चाहते थे।

छाया अक्सर एकचक्र की हालत देख रो पड़ती। वो सब छोड़ कहीं और जाने के लिए एकचक्र को कहती।अभी एकचक्र की हालत भी बालन सी हो रही है। उसका परिवार होते हुए भी वो अकेला है, छाया भी उससे अक्सर नाराज़ हो जाती है।


एकचक्र, एकचक्र से बालन बनता जा रहा हैं। काफी सालों से वो इसी बीच झूल रहा है।कितने एकचक्र जल्द ही बालन बन जायेंगे।कुछ की जिंदगी स्वर्ग में भी आसान नही होती।


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